दैनिक संध्या विषय पर जानकारी देते राजेश सेठी
मेरठ। आर्य समाज थापर नगर में रविवार को आयोजित साप्ताहिक सत्संग में वैदिक जीवनशैली, ईश्वर उपासना और दैनिक संध्या के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला गया। “दैनिक संध्या आवश्यक क्यों?” विषय पर आयोजित विशेष प्रवचन में वक्ताओं ने कहा कि मनुष्य यदि प्रतिदिन प्रातः एवं सायंकाल संध्या, प्रार्थना और ईश्वर का ध्यान करता है तो उसके जीवन में सद्गुणों का विकास होता है, मानसिक शांति प्राप्त होती है तथा वह पाप कर्मों से दूर रहकर आदर्श जीवन जीने में सक्षम बनता है।
सत्संग के मुख्य वक्ता राजेश सेठी ने कहा कि भारतीय वैदिक परंपरा में दैनिक संध्या का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। महर्षि मनु ने प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रातःकाल और सायंकाल संधि वेला में संध्या करने का निर्देश दिया है। संध्या का वास्तविक अर्थ ईश्वर का सम्यक रूप से ध्यान, स्तुति, प्रार्थना और उपासना करना है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति नियमित रूप से संध्या नहीं करता, वह अपने आध्यात्मिक कर्तव्यों की उपेक्षा करता है और अपने जीवन में अनेक प्रकार की नकारात्मक प्रवृत्तियों को स्थान देता है।
उन्होंने कहा कि जैसे मनुष्य प्रतिदिन अपने घर और आसपास के वातावरण की सफाई करता है, उसी प्रकार आत्मा और अंतःकरण की शुद्धि भी आवश्यक है। यह शुद्धि केवल ईश्वर के गुणों के चिंतन, प्रार्थना और उपासना से ही संभव है। नियमित संध्या करने से मनुष्य के भीतर मौजूद अहंकार, ईर्ष्या, क्रोध, लोभ और अन्य कुवासनाएं धीरे-धीरे समाप्त होने लगती हैं तथा सत्य, दया, करुणा, सेवा, संयम और सहनशीलता जैसे श्रेष्ठ गुणों का विकास होता है।
राजेश सेठी ने कहा कि वर्तमान समय में अधिकांश लोग ईश्वर की भक्ति केवल अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति, धन-संपत्ति की प्राप्ति या अपने पापों के दंड से बचने के उद्देश्य से करते हैं। जबकि वैदिक दर्शन के अनुसार सच्ची भक्ति का उद्देश्य व्यक्ति के चरित्र का निर्माण, आत्मिक उन्नति और ईश्वर के दिव्य गुणों को अपने जीवन में धारण करना है। जब मनुष्य अपने जीवन में अच्छे कर्म करता है, तो उसे उसी के अनुरूप श्रेष्ठ परिणाम भी प्राप्त होते हैं।
उन्होंने कहा कि ईश्वर की उपासना मनुष्य को आत्मबल प्रदान करती है। यही आत्मबल जीवन की कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी उसे धैर्य, साहस और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे प्रतिदिन प्रातः एवं सायंकाल श्रद्धा और विनम्रता के साथ संध्या करें तथा अपने जीवन में ईश्वर के गुणों को अपनाने का प्रयास करें। उन्होंने यह भी कहा कि मनुष्य को पहले अपने संपूर्ण पुरुषार्थ का प्रयोग करना चाहिए और उसके पश्चात ही ईश्वर से सहायता की प्रार्थना करनी चाहिए।
इस अवसर पर आचार्य नीरज ने भी अपने प्रेरक उद्बोधन में कहा कि वैदिक संस्कृति केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक आदर्श जीवन पद्धति है। उन्होंने कहा कि नियमित संध्या, यज्ञ और स्वाध्याय व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारते हैं तथा उसे समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी नागरिक बनने की प्रेरणा देते हैं। उन्होंने युवाओं से नशा, कुरीतियों और नकारात्मक प्रवृत्तियों से दूर रहकर वैदिक मूल्यों को अपनाने का आह्वान किया।
कार्यक्रम के दौरान भक्ति संगीत का भी आयोजन किया गया। प्रीति सेठी, चांद ग्रोवर, सुमन आनंद, अमित कांत, नेत्रपाल आर्य, धर्मवीर तथा कमलेश चांदना ने मधुर एवं प्रेरणादायक भजनों की प्रस्तुति देकर पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया। भजनों के माध्यम से श्रद्धालुओं को ईश्वर भक्ति, सत्य, सेवा और मानव कल्याण का संदेश दिया गया।
सत्संग के अंतर्गत आचार्य सत्य प्रकाश शास्त्री के ब्रह्मत्व में वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ देवयज्ञ सम्पन्न हुआ। यज्ञ में श्रद्धालुओं ने विश्व शांति, पर्यावरण संरक्षण, समाज में सद्भाव, परिवारों की सुख-समृद्धि तथा राष्ट्र की उन्नति की कामना करते हुए आहुति अर्पित की। यज्ञ में विभिन्न परिवारों ने यजमान के रूप में भाग लेकर वैदिक परंपरा का निर्वहन किया।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। इनमें विजय कुमार बंसल, विदिशा जिंदल, लोकेंद्र सिंह, करुणा सागर बाली, विक्रम सोंधी, शिवकुमार भसीन, राजीव सोनी, श्रेय बत्रा, कृष्ण कुमार वर्मा, श्रवण कुमार अग्रवाल, अपर्णा, धर्मवीर, सुनीता-मुकेश कन्नौजिया, राकेश ओबराय सहित अनेक गणमान्य नागरिकों ने सहभागिता कर वैदिक सत्संग का लाभ उठाया।
कार्यक्रम के समापन पर आर्य समाज थापर नगर के पदाधिकारियों ने कहा कि आज के भौतिकवादी युग में मानसिक तनाव, सामाजिक विकृतियों और नैतिक पतन को रोकने के लिए वैदिक जीवनशैली को अपनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यदि प्रत्येक व्यक्ति नियमित रूप से संध्या, यज्ञ, स्वाध्याय और सदाचार को अपने जीवन का हिस्सा बनाए, तो एक संस्कारित परिवार, सशक्त समाज और विकसित राष्ट्र का निर्माण संभव है। उन्होंने सभी नागरिकों से दैनिक संध्या को अपने जीवन की दिनचर्या में शामिल करने तथा आने वाली पीढ़ी को भी वैदिक संस्कारों से जोड़ने का आह्वान किया।