कथा व्यास पूनम लखनपाल ने तीसरे दिन अध्यात्म एवं धार्मिक ज्ञान स्त्रोत का किया वर्णन
मेरठ। शास्त्रीनगर स्थित निजनिवास पर प्रो. सुधाकराचार्य त्रिपाठी जी की प्रेरणा से आयोजित सामवेद की नवमी कथा के तृतीय दिवस कथा का आयोजन किया गया। कथाव्यास प्रो. पूनम लखनपाल ने सामवेद के सप्तम प्रपाठक के तृतीयार्ध की कथा का विस्तारपूर्वक वर्णन किया। कथा के दौरान वैदिक मंत्रों के माध्यम से सूर्य के विभिन्न स्वरूपों, मानव जीवन की दिनचर्या तथा कर्मशीलता के महत्व को सरल और व्यावहारिक संदर्भों में समझाया गया।
कथा के तीसरे दिन का प्रमुख भाव “मा भेम मा श्रमिष्मोग्रस्य सख्ये तव” रहा। कथा में बताया गया कि सामवेद केवल आध्यात्मिक एवं धार्मिक ज्ञान का स्रोत ही नहीं है, बल्कि उसके मंत्र मानव जीवन की दिनचर्या, कर्म, अनुशासन और जीवन मूल्यों को भी गहराई से समझने का मार्ग प्रदान करते हैं।
इन्द्र और विवस्वान् आदित्य के स्वरूपों का परिचय
कथा के दौरान डॉ. पूनम लखनपाल ने 12 आदित्यों में से इन्द्र और विवस्वान् से संबंधित दिनचर्या के कालखंड का विस्तार से परिचय कराया। उन्होंने बताया कि सूर्य के विभिन्न स्वरूपों की गति को मानव जीवन की दैनिक गतिविधियों से जोड़कर सामवेद के मंत्रों में जीवन के विभिन्न चरणों और कर्मों का सुंदर निरूपण मिलता है।
उन्होंने इन्द्र के काल को दिनचर्या में सक्रियता और कर्मशीलता से जोड़ते हुए कहा कि यह वह समय है जब व्यक्ति अपने-अपने कार्यक्षेत्र में पूरी ऊर्जा के साथ सक्रिय रहता है। इन्द्र को आत्मा का प्रतीक बताते हुए उन्होंने समझाया कि आत्मा रूपी इन्द्र व्यक्ति के भीतर विस्तार, प्रकाश और निर्माण की चेतना को जागृत करता है।
सुबह 6 से 9 बजे के कालखंड को कर्मशीलता से जोड़ा
कथा में 12 आदित्यों की दिनचर्या के संदर्भ में इन्द्र के काल को लगभग 6 बजे से 7 बजे तथा विवस्वान् के काल को 7 बजे से 9 बजे तक के सूर्यकाल के रूप में समझाया गया। इस दौरान इन दोनों आदित्यों के स्वरूप और उनसे संबंधित गणों—ऋषि, यक्ष, गंधर्व, नाग, राक्षस और अप्सरा—के विषय में भी विस्तार से बताया गया।
कथाव्यास ने समझाया कि सूर्य के इन कालखंडों के साथ मानव जीवन की गतिविधियों को जोड़कर देखने पर दिनचर्या में कर्म, अर्जन, क्षमता, ऊर्जा और आत्मविकास के महत्वपूर्ण संदेश सामने आते हैं।
अन्न के लिए प्रार्थना में छिपा है कर्म और अर्जन का संदेश
कथा के दौरान ऋषियों द्वारा इन्द्राग्नि से की गई प्रार्थना का उल्लेख करते हुए बताया गया कि अन्न की प्राप्ति के लिए देवताओं की स्तुति का भाव केवल भोजन प्राप्त करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें रोटी कमाने, परिश्रम करने और जीवन के लिए आवश्यक संसाधनों का अर्जन करने का व्यापक संदेश भी निहित है।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति के जीवन में संपदा, कीर्ति और सौभाग्य की प्राप्ति के लिए कर्मशील होना आवश्यक है। इसी संदर्भ में उन्होंने जीवन के लिए संदेश दिया—“श्रम करो श्रमिक की भांति, जीवन यापन करो राजा की भांति।” अर्थात व्यक्ति को अपने कर्म और परिश्रम में पूरी निष्ठा रखनी चाहिए तथा अपने जीवन को गरिमा और आत्मसम्मान के साथ जीना चाहिए।
युवावस्था की तरह ऊर्जा के साथ अर्जन करने का संदेश
कथा में बताया गया कि आदित्य इन्द्र के काल को जीवन की युवावस्था जैसी ऊर्जा और सक्रियता के साथ जोड़ा जा सकता है। इस काल में व्यक्ति को अपनी क्षमताओं का उपयोग करते हुए कर्म, अर्जन और निर्माण की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
वहीं विवस्वान् के काल में व्यक्ति को अपनी क्षमताओं को पहचानकर उन्हें प्रकाशमान करने का संदेश मिलता है। बुद्धि और विवेक के साथ किया गया श्रम व्यक्ति के ओज, सफलता, प्रशंसा, कीर्ति और समृद्धि को बढ़ाने में सहायक होता है।
‘अञ्जते व्यञ्जते’ मंत्र से सूर्य की गति और दिनचर्या का संबंध
कथा के दौरान “अञ्जते, व्यञ्जते, समञ्जते…” मंत्र की भी व्याख्या की गई। डॉ. पूनम लखनपाल ने इस मंत्र के भाव को दिन में सूर्य के बारह स्वरूपों की गति से जोड़ते हुए समझाया कि सूर्य की गति के साथ मानव जीवन की गतिविधियों और दिनचर्या का भी एक स्वाभाविक संबंध है।
उन्होंने सामवेद के मंत्रों के माध्यम से बताया कि वैदिक चिंतन में दिन का प्रत्येक काल केवल समय का बीतना नहीं है, बल्कि वह व्यक्ति के कर्म, विचार, ऊर्जा और जीवन-व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। इस दृष्टि से दिनचर्या को व्यवस्थित करना व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
कथा में अनेक वैदिक देवताओं का हुआ उल्लेख
आज की कथा में इन्द्र, इन्द्राग्नि, वरुण, विश्वकर्मा, सोम, पूषा, विश्वदेवा, द्यावापृथिवी और अग्नि आदि देवताओं से संबंधित वैदिक संदर्भों का वर्णन किया गया। इनके माध्यम से वैदिक मंत्रों में निहित विभिन्न जीवन मूल्यों और आध्यात्मिक संदेशों को समझाया गया।
कथा के दौरान यह भी बताया गया कि सामवेद के मंत्रों में प्रकृति, सूर्य, अग्नि, देवशक्तियों और मानव जीवन के बीच गहरा संबंध स्थापित किया गया है। इन मंत्रों को केवल धार्मिक अनुष्ठान के संदर्भ में देखने के बजाय उनके जीवनोपयोगी संदेशों को समझना भी आवश्यक है।
सामवेद के मंत्रों के साथ आगे बढ़ी कथा
कथा के दौरान सप्तम प्रपाठक के तृतीयार्ध से संबंधित मंत्रों का भी पाठ एवं भावार्थ प्रस्तुत किया गया। इनमें इन्द्राग्नि, इन्द्र, मित्र तथा अन्य वैदिक शक्तियों का स्मरण करते हुए कर्म, स्तुति, यज्ञ, समृद्धि और प्रकाश जैसे विषयों को अभिव्यक्त किया गया।
विशेष रूप से प्रस्तुत मंत्रों में—
“इन्द्राग्नी नवतिं पुरो दासपत्नीरधूनुतम्…”
“त्वं पुरू हि सहस्राणि यूथा दानाय मंहसे…”
“मही मित्रस्य साधथस्तरन्ती पिप्रती ऋतम्…”
“गाव उप वदावटे मही यस्य नु रप्सुदा…”
“इमा उ त्वा पुरूवसो गिरो वर्धन्तु या मम…”
और
“अञ्जते व्यञ्जते समञ्जते क्रतुं रिहन्ति मध्वाभ्यञ्जते। पशुमप्सु च गृभ्णते॥”
का पाठ किया गया तथा इनके भावों को दिनचर्या, सूर्य की गति और मानव जीवन की सक्रियता के संदर्भ में समझाया गया।
कर्म, आत्मविश्वास और आत्मविकास का संदेश
सामवेद की नवमी कथा के तृतीय दिवस का मूल संदेश कर्मशीलता, आत्मविश्वास और अपनी क्षमताओं को पहचानकर उनका सदुपयोग करने से जुड़ा रहा। कथा में समझाया गया कि व्यक्ति को अपने जीवन में परिश्रम को प्राथमिकता देनी चाहिए। कर्म के माध्यम से ही व्यक्ति अपनी प्रतिभा को विकसित करता है और सफलता तथा समृद्धि की दिशा में आगे बढ़ता है।
कथा का समापन सामवेद के मंत्रों के आध्यात्मिक एवं व्यावहारिक संदेशों को आत्मसात करने के आह्वान के साथ हुआ। उपस्थित श्रद्धालुओं ने वैदिक मंत्रों, उनके भावार्थ और दिनचर्या से जुड़े संदेशों को ध्यानपूर्वक सुना।