संस्कृत सभागार के समक्ष सहपाठियों को राखी बांधती छात्राएं
संस्कृत सप्ताह महोत्सव के अंतर्गत आयोजित कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने बांधा रक्षासूत्र, ऋषि परंपरा एवं शास्त्र संरक्षण का लिया संकल्प
मेरठ । चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय परिसर स्थित संस्कृतप्राच्यभाषा विभाग में संस्कृत सप्ताह महोत्सव के अंतर्गत श्रावणी उपाकर्म एवं रक्षाबंधन पर्व के निमित्त कार्यक्रम का आयोजन किया गया। रक्षाबंधन पर्व से एक दिन पूर्व आयोजित कार्यक्रम को वैदिक स्वरूप प्रदान किया गया। कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने मंत्रपाठ के साथ विभागीय अध्यापकों एवं एक-दूसरे को तिलक लगाकर रक्षासूत्र बांधा तथा ऋषि परंपरा एवं शास्त्रों के संरक्षण का संकल्प लिया।
शंखध्वनि एवं मंगलाचरण से हुआ कार्यक्रम का शुभारंभ
भारतीय परंपरा के अनुरूप कार्यक्रम का शुभारंभ शंखध्वनि एवं मंगलाचरण के साथ हुआ। इसके पश्चात विद्यार्थियों द्वारा ऋग्वेद के वागाम्भृणी सूक्त का पाठ किया गया और उसके अर्थ एवं भाव पर चर्चा की गई। वैदिक मंत्रों के उच्चारण और उनके अर्थ की चर्चा ने कार्यक्रम को आध्यात्मिक एवं अकादमिक स्वरूप प्रदान किया।
रक्षाबंधन के वैदिक स्वरूप पर डॉ. प्रशान्त शर्मा ने डाला प्रकाश
संस्कृतप्राच्यभाषा विभाग के सहविभागाध्यक्ष डॉ. प्रशान्त शर्मा ने उपस्थित प्राध्यापकों एवं विद्यार्थियों के साथ संवाद करते हुए रक्षाबंधन के वैदिक स्वरूप और श्रावणी उपाकर्म की परंपरा पर विस्तार से प्रकाश डाला। डॉ. शर्मा ने कहा कि वर्तमान समय में रक्षाबंधन पर्व अधिकांशतः भाई-बहन के त्योहार के रूप में जाना जाता है, जबकि इसकी प्राचीन परंपरा ज्ञान, अध्ययन-अध्यापन और शास्त्रों के संरक्षण से भी जुड़ी रही है। उन्होंने विद्यार्थियों को पर्व के व्यापक सांस्कृतिक एवं वैदिक संदर्भ से परिचित कराया।
श्रावणी पूर्णिमा से जुड़ी रही अध्ययन-अध्यापन की परंपरा
डॉ. शर्मा ने बताया कि प्राचीन भारतीय परंपरा में ज्ञान के माध्यम से समाज में व्याप्त अज्ञान को दूर करने के उद्देश्य से श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के अवसर पर यज्ञ आदि अनुष्ठानों के साथ शास्त्रों के अध्ययन एवं अध्यापन की परंपरा रही है। गुरुकुल शिक्षा पद्धति में विद्यारंभ एवं वेदारंभ संस्कारों के साथ नया शिक्षण सत्र प्रारंभ करने की परंपरा भी इस अवसर से जुड़ी रही। उन्होंने बताया कि नवप्रवेशित विद्यार्थियों को यज्ञोपवीत धारण कराने के साथ शिक्षा प्राप्त करने का अधिकारी माना जाता था। वहीं गुरुकुल के पुराने विद्यार्थी अपना पुराना यज्ञोपवीत त्यागकर नया यज्ञोपवीत धारण करते थे।
यज्ञोपवीत के प्रतीकात्मक महत्व की दी जानकारी
कार्यक्रम के दौरान यज्ञोपवीत के पारंपरिक एवं प्रतीकात्मक महत्व पर भी चर्चा की गई। बताया गया कि यज्ञोपवीत के तीन धागों को क्रमशः मातृऋण, पितृऋण और देवऋण अथवा ऋषिऋण का प्रतीक माना गया है। प्राचीन परंपरा में यजमान एवं पुरोहित तथा गुरुकुल के आचार्य एवं विद्यार्थी एक-दूसरे की रक्षा करने के संकल्प के साथ रक्षासूत्र का बंधन करते थे। इस प्रकार रक्षासूत्र केवल व्यक्तिगत संबंध का प्रतीक न होकर पारस्परिक दायित्व, संरक्षण और संकल्प की भावना से भी जुड़ा रहा है।
रक्षासूत्र की परंपरा से जुड़ा पौराणिक संदर्भ
कार्यक्रम में रक्षासूत्र की परंपरा से जुड़े पौराणिक संदर्भ का भी उल्लेख किया गया। डॉ. शर्मा ने बताया कि पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार इंद्र की पत्नी द्वारा युद्ध के लिए तत्पर इंद्र की विजय की कामना से उन्हें रक्षासूत्र बांधे जाने का उल्लेख मिलता है। उन्होंने कहा कि इसी व्यापक भाव के साथ आज भी कोई भी व्यक्ति दूसरे के प्रति रक्षा और संरक्षण का संकल्प लेते हुए रक्षासूत्र बांध सकता है। इस प्रकार रक्षाबंधन को केवल भाई-बहन के संबंध तक सीमित न मानकर रक्षा, जिम्मेदारी और परस्पर सहयोग की व्यापक भावना से भी देखा जा सकता है।
विद्यार्थियों ने लिया ऋषि परंपरा एवं शास्त्र संरक्षण का संकल्प
कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने अध्यापकों एवं परस्पर रक्षासूत्र बांधते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा, ऋषि परंपरा और शास्त्रों के संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की। इस अवसर पर विद्यार्थियों ने वैदिक परंपराओं को समझने तथा उन्हें अध्ययन और आचरण के माध्यम से आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। कार्यक्रम के दौरान वैदिक मंत्रों के पाठ, अर्थचर्चा और संवाद के माध्यम से विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा के विभिन्न पहलुओं से परिचित कराया गया।
विभागीय शिक्षक एवं विद्यार्थी रहे उपस्थित
कार्यक्रम में विभागीय शिक्षक डॉ. नरेन्द्र कुमार, डॉ. ओमपाल सिंह, डॉ. विजय बहादुर, डॉ. रक्षिता, श्री तुषार गोयल, डॉ. आभा एवं श्री मनीष स्वामी सहित विद्यार्थी रिया, शिवानी, तनु, अक्षय एवं निष्कर्ष उपस्थित रहे। कार्यक्रम के सफल आयोजन में सुमित शर्मा एवं बबलू का विशेष सहयोग रहा।
संस्कृत सप्ताह महोत्सव के तहत सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक पहल
संस्कृत सप्ताह महोत्सव के अंतर्गत आयोजित इस कार्यक्रम ने रक्षाबंधन पर्व को भारतीय ज्ञान परंपरा, वैदिक अध्ययन और शास्त्र संरक्षण से जोड़ने का प्रयास किया। कार्यक्रम के माध्यम से विद्यार्थियों को पर्व के सांस्कृतिक एवं वैदिक संदर्भों को समझने का अवसर मिला। वैदिक मंत्रपाठ, रक्षासूत्र बंधन, अर्थचर्चा और संकल्प के साथ आयोजित कार्यक्रम ने विद्यार्थियों एवं शिक्षकों को भारतीय परंपराओं की मूल भावना से जोड़ने का संदेश दिया।