खेती में ड्रिप सिंचाई तकनीक बहुउपयोगी
मेरठ। जल की बढ़ती कमी, भूजल स्तर में गिरावट और कृषि में सिंचाई की बढ़ती आवश्यकता के बीच गन्ने की खेती में जल संरक्षण और जल उपयोग दक्षता बढ़ाना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता बन गया है। गन्ना लंबे समय तक खेत में रहने वाली फसल है और इसकी जल आवश्यकता भी अन्य कई फसलों की तुलना में अधिक होती है। ऐसे में पारंपरिक सतही सिंचाई की तुलना में आधुनिक एवं वैज्ञानिक सिंचाई तकनीकों को अपनाकर कम पानी में बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। इसी दिशा में उपसतह ड्रिप सिंचाई (Subsurface Drip Irrigation-SSDI) एक प्रभावी एवं आधुनिक तकनीक के रूप में सामने आई है।
यह तकनीक गन्ने के जड़ क्षेत्र तक सीधे और नियंत्रित मात्रा में पानी पहुंचाती है। ड्रिप लाइन को मिट्टी की सतह के नीचे स्थापित किए जाने के कारण पानी का वाष्पीकरण, सतही बहाव और अनावश्यक जल हानि कम होती है। इसके साथ ही उर्वरकों का अधिक प्रभावी उपयोग, खरपतवार नियंत्रण, श्रम की बचत और फसल की उत्पादकता बढ़ाने में भी सहायता मिलती है।
तकनीकी सामग्री के लेखक: बृजेश कुमार, गरिमा शर्मा, तन्मय, प्रिंस कुशवाहा, डी.वाई. तथागत एवं आर.एस. सेंगर, कॉलेज ऑफ बायोटेक्नोलॉजी, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।
भारत में गन्ने की खेती की स्थिति
भारत विश्व में ब्राजील के बाद गन्ना उत्पादन करने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश है। भारत के अलावा ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया, रूस, क्यूबा, चीन, थाईलैंड, संयुक्त राज्य अमेरिका और पाकिस्तान सहित कई देशों में गन्ने की व्यावसायिक खेती की जाती है।
भारत में लगभग 57.4 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गन्ने की खेती की जाती है, जिससे करीब 4756.1 लाख टन उत्पादन प्राप्त होता है। देश में गन्ने की औसत उत्पादकता लगभग 82.86 टन प्रति हेक्टेयर बताई गई है। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, बिहार और उत्तराखंड प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में शामिल हैं। इनमें उत्तर प्रदेश गन्ने के क्षेत्रफल और उत्पादन दोनों की दृष्टि से अग्रणी राज्य है।
लंबे समय तक खेत में रहने वाली फसल है गन्ना
गन्ना एक दीर्घावधि फसल है, जिसकी फसल अवधि सामान्यतः 12 से 18 माह तक होती है। उत्तर भारत में मुख्य रूप से जनवरी-फरवरी में गन्ने की बुवाई की जाती है और फसल लगभग 12 माह में तैयार हो जाती है। वहीं दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों, जैसे आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु में जुलाई-अगस्त में बुवाई की जाती है, जहां फसल अवधि लगभग 16 से 18 माह तक हो सकती है।

अक्टूबर-नवंबर में की जाने वाली बुवाई को पूर्व-मौसमी या लगभग 15 माह की फसल के रूप में जाना जाता है। गन्ना लंबे समय तक खेत में रहने वाली फसल होने के कारण इसकी जल आवश्यकता भी अधिक होती है। सामान्यतः एक हेक्टेयर गन्ने की सफल खेती के लिए लगभग 125 से 250 सेंटीमीटर जल की आवश्यकता बताई गई है।
पारंपरिक सिंचाई में होती है पानी की काफी बर्बादी
भारत में आज भी अनेक क्षेत्रों में गन्ने की सिंचाई के लिए पारंपरिक सतही सिंचाई प्रणाली का उपयोग किया जाता है। इस पद्धति में पानी का एक हिस्सा वाष्पीकरण, सतही बहाव और गहरी रिसाव प्रक्रिया के कारण नष्ट हो जाता है। इससे सिंचाई जल उपयोग दक्षता कम रहती है और उपलब्ध जल संसाधनों का पूरा लाभ नहीं मिल पाता।
गन्ने की वृद्धि एवं विकास के दौरान प्रत्येक अवस्था में पानी की आवश्यकता बनी रहती है, लेकिन कुछ अवस्थाएं पानी की कमी के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील होती हैं। यदि इन अवस्थाओं में पर्याप्त सिंचाई उपलब्ध नहीं होती तो पौधों की वृद्धि प्रभावित होती है और अंततः गन्ने की उपज तथा चीनी की रिकवरी में कमी आ सकती है।
गन्ने की वृद्धि की प्रमुख अवस्थाएं
गन्ने की वृद्धि को मुख्य रूप से चार चरणों में विभाजित किया जा सकता है—
- अंकुरण अवस्था – बुवाई से लगभग 60 दिन तक।
- कल्ले बनने अथवा प्रारंभिक वृद्धि अवस्था – लगभग 60 से 120 दिन।
- तीव्र वृद्धि या ग्रैंड ग्रोथ अवस्था – लगभग 120 से 280 दिन।
- परिपक्वता एवं पकने की अवस्था।
कल्ले बनने और तीव्र वृद्धि के समय पर्याप्त सिंचाई उपलब्ध होना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। पानी की कमी इन अवस्थाओं में फसल की वृद्धि और उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।
क्यों जरूरी है उपसतह ड्रिप सिंचाई?
बढ़ती जल कमी और जलवायु परिवर्तन की परिस्थितियों को देखते हुए ऐसी सिंचाई तकनीक की आवश्यकता है, जिससे कम पानी में अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सके। उपसतह ड्रिप सिंचाई इसी उद्देश्य को पूरा करने वाली आधुनिक तकनीक है।
इस प्रणाली में ड्रिप लाइन को मिट्टी की सतह के नीचे स्थापित किया जाता है। ड्रिपर से निकलने वाला पानी सीधे फसल के जड़ क्षेत्र तक पहुंचता है। इससे पानी की आपूर्ति अधिक नियंत्रित तरीके से होती है और वाष्पीकरण तथा सतही बहाव से होने वाली जल हानि कम की जा सकती है।
इसके अलावा जड़ क्षेत्र के आसपास आवश्यक नमी बनाए रखने में मदद मिलती है और उर्वरकों को भी सिंचाई के पानी के साथ सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जा सकता है।
उपसतह ड्रिप सिंचाई की कार्यप्रणाली
उपसतह ड्रिप सिंचाई एक उच्च दक्षता वाली सिंचाई प्रणाली है। इसमें पानी मिट्टी की सतह के नीचे पहुंचाया जाता है। इससे सतही सिंचाई में दिखाई देने वाली पपड़ी बनने, जलभराव और सतही बहाव जैसी समस्याओं को कम करने में मदद मिलती है।
उचित डिजाइन और सही स्थापना के साथ इस प्रणाली में पानी का वितरण अपेक्षाकृत समान रहता है। पानी सीधे पौधों के जड़ क्षेत्र के आसपास पहुंचता है और मिट्टी में विभिन्न दिशाओं में फैलता है।
इसका एक महत्वपूर्ण लाभ खरपतवार नियंत्रण भी है। चूंकि पानी मुख्य रूप से मिट्टी के अंदर फसल के जड़ क्षेत्र में पहुंचता है, इसलिए सतह पर मौजूद खरपतवारों के बीजों को पर्याप्त नमी नहीं मिल पाती। इससे खरपतवारों की वृद्धि को नियंत्रित करने और उनके कारण होने वाले नुकसान को कम करने में सहायता मिलती है।
उपसतह ड्रिप प्रणाली स्थापित होने के बाद खेत में कई अंतर-सस्य क्रियाएं करना भी अपेक्षाकृत आसान हो जाता है। फावड़ा चलाने, निराई-गुड़ाई, मिट्टी चढ़ाने तथा कुछ यांत्रिक कृषि कार्यों में भी सुविधा मिल सकती है।

प्रणाली का डिजाइन और स्थापना
उपसतह ड्रिप प्रणाली की सफलता काफी हद तक उसके सही डिजाइन और स्थापना पर निर्भर करती है।
ड्रिप लाइन की गहराई
तकनीकी सामग्री के अनुसार ड्रिप लाइन को सामान्यतः मिट्टी की सतह से लगभग 10 से 20 सेंटीमीटर नीचे स्थापित किया जा सकता है, ताकि पानी सीधे जड़ क्षेत्र तक पहुंच सके।
पंक्तियों के बीच दूरी
एकल पंक्ति प्रणाली में ड्रिप लेटरल के बीच लगभग 120 से 150 सेंटीमीटर की दूरी रखी जा सकती है।
ड्रिपर की डिस्चार्ज दर
ड्रिपर का प्रवाह सामान्यतः 2 से 4 लीटर प्रति घंटा (LPH) रखा जा सकता है। वास्तविक डिजाइन मिट्टी, फसल की आवश्यकता और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार निर्धारित किया जाना चाहिए।
मिट्टी के अनुसार ड्रिपर का चयन
मिट्टी के प्रकार के अनुसार ड्रिपर की दूरी और प्रवाह दर में बदलाव किया जा सकता है।
हल्की मिट्टी: ड्रिपर की दूरी लगभग 30 सेंटीमीटर और प्रवाह दर लगभग 1 लीटर प्रति घंटा।
मध्यम मिट्टी: ड्रिपर की दूरी लगभग 40 सेंटीमीटर और प्रवाह दर लगभग 2 लीटर प्रति घंटा।
भारी मिट्टी: ड्रिपर की दूरी लगभग 50 सेंटीमीटर और प्रवाह दर लगभग 2 से 3 लीटर प्रति घंटा।
हालांकि खेत की वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार अंतिम डिजाइन कृषि विशेषज्ञ की सलाह से तय किया जाना उचित है।
गन्ने की बुवाई की प्रमुख पद्धतियां
उपसतह ड्रिप प्रणाली स्थापित करने के बाद गन्ने की बुवाई अलग-अलग पद्धतियों से की जा सकती है। इनमें प्रमुख रूप से जोड़ी पंक्ति पद्धति और एकल पंक्ति पद्धति शामिल हैं।
जोड़ी पंक्ति पद्धति
जोड़ी पंक्ति पद्धति में दो गन्ने की पंक्तियों को एक साथ लगाया जाता है और अगली जोड़ी के बीच अपेक्षाकृत अधिक दूरी रखी जाती है। इसमें जोड़ी की दोनों पंक्तियों के बीच लगभग 60 से 75 सेंटीमीटर और दो जोड़ी पंक्तियों के बीच लगभग 210 से 240 सेंटीमीटर की दूरी रखी जा सकती है।
इस प्रणाली में एक ड्रिप लेटरल को दोनों पंक्तियों के बीच स्थापित किया जाता है। इस प्रकार एक ही लेटरल से दोनों पंक्तियों के गन्ने के जड़ क्षेत्र में पानी पहुंचाया जा सकता है। तकनीकी सामग्री के अनुसार इस पद्धति से सिंचाई जल की लगभग 50 प्रतिशत तक बचत संभव बताई गई है।
एकल पंक्ति पद्धति
एकल पंक्ति पद्धति में ड्रिप लेटरल को लगभग 120 से 150 सेंटीमीटर की दूरी पर मिट्टी की सतह के नीचे स्थापित किया जाता है। इसके बाद लगभग 25 से 30 दिन की पौध को लेटरल के ऊपर मिट्टी में हल्का गड्ढा बनाकर लगभग 50 से 60 सेंटीमीटर के अंतर पर लगाया जा सकता है।
पौध रोपाई से पहले उपसतह ड्रिप के माध्यम से खेत में पर्याप्त नमी बनाना आवश्यक है, ताकि पौधों की स्थापना अच्छी तरह हो सके और शुरुआती अवस्था में पौधों के सूखने या मरने की संभावना कम हो।
गन्ने में उपसतह ड्रिप से कब और कितनी सिंचाई करें?
गन्ने में सिंचाई का समय और मात्रा क्षेत्र, बुवाई का समय, मिट्टी के प्रकार और मौसम की स्थिति पर निर्भर करती है। रोपण के बाद शुरुआती 20 से 30 दिनों तक मिट्टी में पर्याप्त नमी बनाए रखना विशेष रूप से जरूरी है, ताकि पौधे अच्छी तरह स्थापित हो सकें।
इसके बाद सिंचाई का कार्यक्रम स्थानीय मौसम और फसल की आवश्यकता के अनुसार निर्धारित किया जाना चाहिए। तकनीकी सामग्री में प्रतिदिन लगभग एक घंटे या एक दिन के अंतराल पर लगभग दो घंटे तक उपसतह ड्रिप से सिंचाई करने का उल्लेख है। हालांकि वास्तविक सिंचाई अवधि खेत की मिट्टी, मौसम, वाष्पीकरण और फसल की अवस्था के आधार पर कृषि विशेषज्ञ द्वारा निर्धारित की जानी चाहिए।
ड्रिप के माध्यम से उर्वरक देना यानी फर्टिगेशन
गन्ना एक लंबी अवधि की फसल है और बेहतर उत्पादन के लिए इसे पर्याप्त पोषण की आवश्यकता होती है। नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटैशियम जैसे प्रमुख पोषक तत्व गन्ने की वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उपसतह ड्रिप सिंचाई के साथ फर्टिगेशन यानी सिंचाई के पानी के माध्यम से उर्वरक देने की सुविधा मिलती है। इसमें उर्वरक को पानी के साथ नियंत्रित मात्रा में फसल के जड़ क्षेत्र तक पहुंचाया जाता है।
तकनीकी सामग्री में एक वर्षीय गन्ने के लिए लगभग 250-300:115-140:115-140 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर एनपीके, पूर्व-मौसमी फसल के लिए 350:140:140 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तथा अर्धवार्षिकी फसल के लिए 450:170:170 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर एनपीके का उल्लेख किया गया है।
उर्वरक की वास्तविक मात्रा मिट्टी की जांच, किस्म, फसल अवधि और स्थानीय कृषि अनुशंसाओं के आधार पर तय की जानी चाहिए।
फर्टिगेशन के लिए फर्टिगेशन टैंक, इंजेक्शन पंप या वेंचुरी उपकरण का उपयोग किया जा सकता है। इससे उर्वरक को सिंचाई प्रणाली के माध्यम से नियंत्रित तरीके से पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जा सकता है।
तकनीकी सामग्री के अनुसार बेहतर गन्ना उत्पादन और चीनी रिकवरी के लिए उर्वरकों को एक साथ देने के बजाय लगभग 15 दिन के अंतराल पर या अधिक समान विभाजनों में देना उपयोगी हो सकता है।
उपसतह ड्रिप सिंचाई के प्रमुख लाभ
- फसल की उपज और गुणवत्ता में सुधार
उपसतह ड्रिप प्रणाली में पानी और पोषक तत्व सीधे जड़ क्षेत्र तक पहुंचाए जाते हैं। इससे फसल को आवश्यक नमी और पोषण अपेक्षाकृत समान रूप से उपलब्ध कराया जा सकता है। परिणामस्वरूप पौधों की वृद्धि, फसल उत्पादन और गुणवत्ता में सुधार की संभावना रहती है।
- जल उपयोग दक्षता में वृद्धि
पानी को सीधे जड़ क्षेत्र में पहुंचाने से वाष्पीकरण और सतही बहाव से होने वाली जल हानि को कम करने में मदद मिलती है। तकनीकी सामग्री के अनुसार गन्ने की खेती में सिंचाई के लिए आवश्यक पानी की मात्रा में लगभग 25 प्रतिशत तक कमी संभव हो सकती है।
- फर्टिगेशन में सुविधा
सिंचाई के पानी के साथ उर्वरक देने से पोषक तत्व सीधे जड़ क्षेत्र तक पहुंचाए जा सकते हैं। इससे उर्वरकों के अधिक प्रभावी उपयोग में मदद मिलती है और पोषक तत्वों के अनावश्यक नुकसान को कम किया जा सकता है।
- मृदा संरक्षण में सहायता
उपसतह सिंचाई में पानी सीधे मिट्टी के अंदर पहुंचता है। इससे सतही बहाव कम होने के कारण मृदा अपरदन को नियंत्रित करने में सहायता मिल सकती है। साथ ही मिट्टी में आवश्यक नमी बनाए रखने से जड़ तंत्र के बेहतर विकास के लिए अनुकूल वातावरण बनता है।
- ऊर्जा की बचत
उपसतह ड्रिप प्रणाली को नियंत्रित प्रवाह और उचित दबाव पर संचालित किया जा सकता है। इससे पंपिंग सिस्टम की ऊर्जा आवश्यकता को कम करने की संभावना रहती है। हालांकि वास्तविक ऊर्जा बचत पंप की क्षमता, पानी की गहराई, दबाव, प्रवाह दर और संचालन अवधि पर निर्भर करती है।
- खरपतवार नियंत्रण में सहायता
क्योंकि पानी मुख्य रूप से फसल के जड़ क्षेत्र में पहुंचता है और मिट्टी की ऊपरी सतह अपेक्षाकृत सूखी रह सकती है, इसलिए खरपतवारों के अंकुरण और वृद्धि को कम करने में सहायता मिलती है। तकनीकी सामग्री के अनुसार खरपतवारों के कारण होने वाले नुकसान में लगभग 30 प्रतिशत तक कमी संभव बताई गई है।
- कीट एवं रोग प्रबंधन में सहायता
फसल के स्वस्थ और संतुलित विकास से पौधों की प्रतिरोधक क्षमता बेहतर हो सकती है। इसके परिणामस्वरूप कुछ परिस्थितियों में कीट एवं रोग प्रबंधन पर होने वाले खर्च को कम करने में मदद मिल सकती है।
- श्रम की आवश्यकता में कमी
एक बार उपसतह ड्रिप प्रणाली स्थापित हो जाने के बाद सिंचाई को अपेक्षाकृत कम श्रम के साथ संचालित किया जा सकता है। स्वचालन की सुविधा होने पर सिंचाई और फर्टिगेशन की प्रक्रिया को अधिक नियंत्रित किया जा सकता है।
गन्ने में यांत्रिक खेती के लिए भी उपयोगी
सतही ड्रिप प्रणाली में खेत में विभिन्न कृषि कार्य करते समय पाइप और लेटरल के क्षतिग्रस्त होने का खतरा रहता है। इसके विपरीत उपसतह ड्रिप में लेटरल पाइप मिट्टी के नीचे स्थापित होते हैं। इसलिए फावड़ा चलाने, निराई-गुड़ाई, मिट्टी चढ़ाने और ट्रैक्टर या कुछ यांत्रिक हार्वेस्टर के संचालन में सुविधा मिल सकती है।
यह व्यवस्था गन्ने की यांत्रिक कटाई के दौरान ड्रिप लेटरल को नुकसान से बचाने में भी उपयोगी हो सकती है और प्रणाली के लंबे समय तक उपयोग में सहायता करती है।
प्रणाली का जीवनकाल
उपसतह ड्रिप प्रणाली की प्रारंभिक लागत पारंपरिक सिंचाई व्यवस्था की तुलना में अधिक हो सकती है, लेकिन उचित डिजाइन, नियमित सफाई, फिल्ट्रेशन और रखरखाव के साथ इसका लंबे समय तक उपयोग किया जा सकता है।
तकनीकी सामग्री में उचित रखरखाव की स्थिति में प्रणाली के लगभग 10 वर्षों तक उपयोग की संभावना का उल्लेख किया गया है। वास्तविक जीवनकाल पाइप की गुणवत्ता, पानी की गुणवत्ता, फिल्ट्रेशन, संचालन और रखरखाव पर निर्भर करेगा।
उपसतह ड्रिप प्रणाली की स्थापना में संभावित लागत
एसएसडीआई प्रणाली की स्थापना की लागत कई कारकों पर निर्भर करती है। इनमें जल स्रोत, पानी की गुणवत्ता, फिल्ट्रेशन की आवश्यकता, पाइप एवं अन्य सामग्री, मिट्टी की विशेषताएं और स्वचालन का स्तर प्रमुख हैं।
दी गई तकनीकी सामग्री के अनुसार स्थापना सहित प्रणाली की लागत लगभग 1,12,500 से 1,50,000 रुपये प्रति हेक्टेयर, यानी लगभग 45,000 से 60,000 रुपये प्रति एकड़ बताई गई है। वास्तविक लागत स्थान, कंपनी, डिजाइन, सामग्री और सरकारी सहायता के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
उपसतह ड्रिप सिंचाई पर सब्सिडी
किसानों और उत्पादकों को ड्रिप सिंचाई प्रणाली की स्थापना पर सरकारी योजनाओं के माध्यम से सहायता या सब्सिडी उपलब्ध हो सकती है। दी गई सामग्री में 50 से 75 प्रतिशत तक सब्सिडी का उल्लेख है। हालांकि सब्सिडी की वास्तविक राशि किसान की श्रेणी, भूमि, राज्य की योजना और उस समय लागू सरकारी दिशा-निर्देशों पर निर्भर करती है।
इसलिए किसान अपने जिले के कृषि या संबंधित विभाग से वर्तमान योजना, पात्रता और सब्सिडी की दर की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
प्रणाली के रखरखाव में सावधानी जरूरी
उपसतह ड्रिप प्रणाली की सफलता के लिए समय-समय पर पूरे सिस्टम की जांच और सफाई आवश्यक है। पाइपलाइन, फिल्टर, वाल्व, ड्रिपर और अन्य घटकों की कार्यक्षमता की नियमित निगरानी करनी चाहिए।
पानी की गुणवत्ता भी प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण है। पानी में मौजूद तलछट, लवण और अन्य पदार्थ ड्रिपर या लेटरल में अवरोध पैदा कर सकते हैं। तकनीकी सामग्री में तलछट और जमाव की समस्या को नियंत्रित करने के लिए एसिड तथा क्लोरीन उपचार का उल्लेख किया गया है। इनका प्रयोग विशेषज्ञ की सलाह और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही किया जाना चाहिए तथा दोनों उपचारों को एक साथ नहीं करना चाहिए।
यदि पानी का पीएच अधिक है तो लेटरल में लवण जमने की समस्या उत्पन्न हो सकती है, जिससे ड्रिपर ब्लॉक होने का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए पानी के पीएच और गुणवत्ता की समय-समय पर जांच आवश्यक है।
चूहों से भी लेटरल पाइप और गन्ने की फसल को नुकसान हो सकता है। इसलिए खेत में चूहा नियंत्रण और पाइपलाइन की नियमित निगरानी भी जरूरी है।
निष्कर्ष
जल संकट और जलवायु परिवर्तन की चुनौती के बीच गन्ने की खेती में उपसतह ड्रिप सिंचाई प्रणाली जल संरक्षण और टिकाऊ कृषि की दिशा में महत्वपूर्ण विकल्प बन सकती है। यह तकनीक पानी को सीधे जड़ क्षेत्र तक पहुंचाकर जल उपयोग दक्षता बढ़ाने, वाष्पीकरण एवं सतही बहाव से होने वाली हानि कम करने, फर्टिगेशन को प्रभावी बनाने और खरपतवार नियंत्रण में सहायता करने की क्षमता रखती है।
हालांकि इसकी प्रारंभिक स्थापना लागत अधिक है और प्रणाली के संचालन के लिए उचित फिल्ट्रेशन, डिजाइन, तकनीकी जानकारी तथा नियमित रखरखाव आवश्यक है। इसलिए किसान अपने खेत की मिट्टी, जल स्रोत, फसल पद्धति और स्थानीय परिस्थितियों का मूल्यांकन कर कृषि विशेषज्ञों की सलाह से इस तकनीक को अपनाएं।
कम पानी में अधिक उत्पादन, बेहतर पोषण प्रबंधन और टिकाऊ गन्ना खेती की दिशा में उपसतह ड्रिप सिंचाई एक उपयोगी आधुनिक तकनीक साबित हो सकती है।