वैदिक धर्म सभा को संबोधित करते अचार्य अनुज शास्त्री
मेरठ। आर्यसमाज सूरजकुंड मार्ग के वार्षिकोत्सव के अंतर्गत आयोजित वैदिक धर्मसभा में वैदिक संस्कृति, मानव कल्याण और विश्व शांति पर विस्तृत विचार-विमर्श किया गया। कार्यक्रम में अंतरराष्ट्रीय युवा वैदिक प्रवक्ता आचार्य अनुज शास्त्री ने अपने ओजस्वी एवं प्रेरक उद्बोधन में वेदों की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वेद ही सनातन ज्ञान का मूल स्रोत हैं और मानवता को शांति, सत्य तथा नैतिक जीवन का मार्ग दिखाते हैं।
कार्यक्रम का शुभारंभ आचार्या सविता जी के सान्निध्य में वैदिक मंत्रोच्चार एवं यज्ञ के साथ हुआ। यज्ञ के माध्यम से वातावरण की शुद्धि, विश्व कल्याण और समाज में सुख-समृद्धि की कामना की गई। इसके बाद आयोजित वैदिक धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु, आर्यसमाज के पदाधिकारी और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
अपने संबोधन में आचार्य अनुज शास्त्री ने कहा कि ‘सनातन’ किसी धर्म का नाम नहीं, बल्कि एक विशेषण है, जिसका अर्थ है— जो सदा से है, जो अनादि और शाश्वत है। उन्होंने कहा कि आज समाज ‘सनातन’ शब्द का व्यापक रूप से प्रयोग तो करता है, लेकिन उसके वास्तविक आधार वेद को भूलता जा रहा है। उनके अनुसार वेद ही सनातन हैं, क्योंकि उनमें समस्त मानव जाति के कल्याण, सत्य, न्याय, ज्ञान और विश्वबंधुत्व का सार्वभौमिक संदेश निहित है।
उन्होंने कहा कि वेद मानवता के मूल धर्मग्रंथ हैं, जबकि अन्य धार्मिक पुस्तकें धर्म से संबंधित ग्रंथ हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि जिस प्रकार ‘वैज्ञानिक’ शब्द का संबंध विज्ञान से, ‘भौतिक’ का संबंध पदार्थ से और ‘आध्यात्मिक’ का संबंध अध्यात्म से होता है, उसी प्रकार ‘धार्मिक’ का अर्थ धर्म से संबंधित है। उन्होंने कहा कि समय के साथ विभिन्न मतों, संप्रदायों और परंपराओं को ही धर्म मान लेने से वैदिक सिद्धांतों की मूल भावना धूमिल हो गई है।
आचार्य अनुज शास्त्री ने कहा कि यदि संपूर्ण मानव समाज एक परमेश्वर और वेदों में निहित सार्वभौमिक ज्ञान को अपनाए, तो विश्व में शांति, सद्भाव, समन्वय और भाईचारे की स्थापना संभव हो सकती है। उन्होंने लोगों से वैदिक ज्ञान को समझने और जीवन में अपनाने का आह्वान भी किया।
कार्यक्रम के सांस्कृतिक सत्र में भजनोपदेशक मोहित शास्त्री ने अपने मधुर भजनों “प्रभु न माला, न माल देखता है, वह केवल हमारे अहवाल देखता है” तथा “दुनिया बनाने वाले कितना महान है तू” की प्रस्तुति देकर उपस्थित श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया। भजनों के दौरान पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया और श्रद्धालु भक्ति-रस में सराबोर दिखाई दिए।
कार्यक्रम के अंत में समाज और राष्ट्र की उन्नति, विश्व शांति तथा वैदिक संस्कृति के प्रचार-प्रसार का संकल्प लिया गया। इस अवसर पर आर्यसमाज के पदाधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता, गणमान्य नागरिक तथा बड़ी संख्या में आर्यजन उपस्थित रहे।