वर्ल्ड कांग्रेस के कार्यक्रम में संबोधन करते C C S U के प्रो डॉ आशीष कौशिक
मेरठ। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय (सीसीएसयू) के इंस्टीट्यूट ऑफ लीगल स्टडीज़ के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. आशीष कौशिक ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित वर्ल्ड कांग्रेस में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और कानून के बदलते स्वरूप पर अपने विचार रखते हुए कहा कि “टेक्नोलॉजी को लोगों की सेवा करनी चाहिए, न कि उन पर नियंत्रण रखना चाहिए।” उन्होंने संप्रभु आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Sovereign AI) के बढ़ते प्रभाव, उससे जुड़े संभावित खतरों और मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए आवश्यक कानूनी सुधारों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
यह वर्ल्ड कांग्रेस “कानून में बदलाव में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की भूमिका: चुनौतियां और लंबित एजेंडा” विषय पर आयोजित की गई थी। इसका आयोजन एस्कुएला इंटरडिसिप्लिनार डी डेरेचोस फंडामेंटल्स प्रीमिनेंटिया जस्टिटिया (पेरू), यूनिवर्सिडेड डी इटाउना (ब्राज़ील) तथा यूनिवर्सिडेड डो एक्सट्रेमो सुल कैटारिनेन्स (ब्राज़ील) द्वारा संयुक्त रूप से किया गया।
संप्रभु AI विकास का माध्यम, लेकिन मानवाधिकार सर्वोपरि
अपने संबोधन में डॉ. आशीष कौशिक ने कहा कि संप्रभु AI विकासशील देशों को पश्चिमी तकनीकी कंपनियों पर निर्भरता कम करने और तकनीकी आत्मनिर्भरता प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि तकनीकी स्वतंत्रता की कीमत पर नागरिकों के मौलिक अधिकारों और मानवीय गरिमा से समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता।
उन्होंने भारत के “तीसरे रास्ते” (Third Way) का उल्लेख करते हुए कहा कि आधार और यूपीआई जैसे बड़े सरकारी समर्थित डिजिटल प्लेटफॉर्म राष्ट्रीय क्षमता को मजबूत करने के सफल उदाहरण हैं। लेकिन उन्होंने यह भी आगाह किया कि गंभीर चुनौती तब उत्पन्न होती है जब सरकार स्वयं इन डिजिटल प्रणालियों की निर्माता, उपयोगकर्ता और नियामक (रेगुलेटर) तीनों भूमिकाएं एक साथ निभाने लगती है। ऐसी स्थिति में पारदर्शिता और जवाबदेही प्रभावित हो सकती है।
‘राजधर्म’ से संचालित हो तकनीकी शासन
डॉ. कौशिक ने कहा कि तकनीकी शासन (Technology Governance) को भारत की प्राचीन नैतिक अवधारणा ‘राजधर्म’ से प्रेरित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी शासन व्यवस्था की वैधता तभी है जब वह जनता के सामूहिक कल्याण के लिए कार्य करे और प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा तथा मौलिक अधिकारों का सम्मान सुनिश्चित करे।
AI से संवैधानिक अधिकारों पर बढ़ता खतरा
अपने व्याख्यान में उन्होंने डीप-लर्निंग आधारित AI प्रणालियों को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि अधिकांश AI सिस्टम एक “ब्लैक बॉक्स” की तरह कार्य करते हैं, जिनके निर्णय लेने की प्रक्रिया आम नागरिकों के लिए पूरी तरह अस्पष्ट होती है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई एल्गोरिदम किसी नागरिक को सरकारी कल्याणकारी योजना का लाभ देने से इंकार कर देता है या उसके साथ भेदभाव करता है, तो प्रभावित व्यक्ति को अक्सर यह तक नहीं बताया जाता कि ऐसा निर्णय क्यों लिया गया। यह स्थिति संविधान द्वारा प्रदत्त समानता और न्याय के सिद्धांतों के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।
डिजिटल निगरानी और गोपनीयता पर जताई चिंता
डॉ. कौशिक ने हाई-इंटेंसिटी फेशियल रिकग्निशन, ट्रैकिंग सिस्टम और डिजिटल निगरानी तकनीकों के बढ़ते उपयोग पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यदि इनके लिए स्पष्ट और कठोर कानूनी ढांचा नहीं बनाया गया, तो नागरिकों की निजता (Privacy) और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत के नए डिजिटल डेटा संरक्षण कानूनों में सरकारी एजेंसियों को दी गई व्यापक छूट सार्वजनिक जवाबदेही को कमजोर करती है, जिससे नागरिक अधिकारों के संरक्षण पर प्रश्नचिह्न खड़े होते हैं।
वैश्विक कानूनी एजेंडे के लिए सुझाए तीन बड़े सुधार
अपने संबोधन के समापन में डॉ. आशीष कौशिक ने आम नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए तीन महत्वपूर्ण कानूनी सुधारों का प्रस्ताव रखा—
हाई-रिस्क संप्रभु AI सिस्टम पर स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट अनिवार्य किया जाए, ताकि जनता पर लागू होने से पहले उनकी निष्पक्ष जांच हो सके।
प्रत्येक नागरिक को “स्पष्टीकरण का अधिकार” (Right to Explanation) मिले, जिससे वह अपने जीवन को प्रभावित करने वाले AI आधारित निर्णयों के पीछे का कारण जान सके।
सरकारी डिजिटल निगरानी और सर्विलांस के लिए न्यायालय से पूर्व अनुमति (वारंट) को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाया जाए, ताकि नागरिकों की निजता सुरक्षित रह सके।
मानव स्वतंत्रता के अधीन रहे तकनीक
डॉ. कौशिक ने अपने संबोधन का समापन इस संदेश के साथ किया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आधुनिक तकनीक का उद्देश्य लोगों के जीवन को सरल बनाना और उनकी सहायता करना होना चाहिए, न कि उन पर नियंत्रण स्थापित करना। उन्होंने कहा कि भविष्य की तकनीकी नीतियों का मूल आधार मानव गरिमा, पारदर्शिता, जवाबदेही और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा होना चाहिए। यही संदेश इस अंतरराष्ट्रीय वर्ल्ड कांग्रेस का भी प्रमुख निष्कर्ष रहा।