राज़ुद्दीन गादरे (राष्ट्रीय प्रवक्ता बहुजन मुक्ति पार्टी)
दिल्ली/लखनऊ। बहुजन मुक्ति पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं उत्तर प्रदेश और दिल्ली प्रदेश प्रभारी राजुद्दीन गादरे ने केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों को लेकर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि देश की जनता को हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद और धार्मिक भावनाओं से जुड़े मुद्दों में उलझाने के बजाय सरकार को जनता के वास्तविक आर्थिक सवालों का जवाब देना चाहिए।
गादरे ने कहा कि आम आदमी आज महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य खर्च, कर्ज और EMI जैसी आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे में राजनीतिक बहस का केंद्र जनता की आर्थिक स्थिति, रोजगार के अवसर और सामाजिक सुरक्षा होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि सरकार को यह बताना चाहिए कि देश की आर्थिक नीतियों से आम नागरिक की जिंदगी में कितना सुधार आया है और सार्वजनिक संसाधनों का इस्तेमाल किन प्राथमिकताओं के आधार पर किया जा रहा है।
“जनता को नारे नहीं, रोजगार और आर्थिक राहत चाहिए”
राजुद्दीन गादरे ने कहा कि चुनावी राजनीति में नारे और भावनात्मक मुद्दे अपनी जगह हो सकते हैं, लेकिन आम नागरिक की रोजमर्रा की समस्याओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा—
«“जनता पूछ रही है—रोजगार कहां है? महंगाई क्यों है? बच्चों की फीस इतनी महंगी क्यों है? इलाज इतना महंगा क्यों है? किसान और मजदूर आर्थिक संकट में क्यों हैं? और देश पर बढ़ते कर्ज का बोझ आखिर किसके लिए है?”»
उन्होंने कहा कि किसी भी सरकार के कामकाज का मूल्यांकन केवल बड़े आंकड़ों या राजनीतिक नारों से नहीं होना चाहिए। वास्तविक उपलब्धि तब मानी जाएगी, जब गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत हो, युवाओं को रोजगार मिले, किसानों को आर्थिक सुरक्षा मिले और आम नागरिक को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाएं सुलभ हों।
बाहरी कर्ज के आंकड़े पर सरकार से सवाल
गादरे ने भारत के बाहरी कर्ज को लेकर भी केंद्र सरकार से सवाल किए। उन्होंने कहा कि भारत सरकार की India’s External Debt 2024-25 रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2025 के अंत तक देश का बाहरी कर्ज लगभग 736.3 अरब डॉलर था।
गादरे ने कहा कि कर्ज अपने आप में हमेशा नकारात्मक नहीं होता और विकास परियोजनाओं के लिए उधार लिया गया धन अर्थव्यवस्था में उपयोगी भूमिका निभा सकता है। लेकिन सरकार को जनता के सामने यह स्पष्ट करना चाहिए कि कर्ज का उपयोग किन क्षेत्रों में किया गया, उससे कितनी आर्थिक गतिविधि और रोजगार पैदा हुआ तथा उसके ब्याज और पुनर्भुगतान का बोझ किस प्रकार संभाला जा रहा है।
उन्होंने कहा कि देश की आर्थिक नीतियों पर पारदर्शी सार्वजनिक बहस जरूरी है।
“हर-हर मोदी का नारा बहुत सुन लिया—अब हर घर का हिसाब दो”
गादरे ने राजनीतिक अंदाज में कहा कि जनता अब केवल नारों से संतुष्ट नहीं होगी।
उन्होंने कहा—
«“हर-हर मोदी का नारा बहुत सुन लिया—अब हर घर का हिसाब दो।”»
उन्होंने केंद्र सरकार से रोजगार, महंगाई और आम परिवार के खर्च से जुड़े सवालों का जवाब मांगते हुए कहा कि देश का युवा अपने भविष्य को लेकर स्पष्ट नीति चाहता है।
उनके मुताबिक, रोजगार के अवसर, शिक्षा की लागत, स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च और परिवारों पर बढ़ता आर्थिक दबाव ऐसे मुद्दे हैं जिन पर सरकार को ठोस जवाब देना चाहिए।
“हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर लड़ाना बंद करो”
गादरे ने धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि गरीब हिन्दू और गरीब मुस्लिम परिवारों की आर्थिक समस्याएं कई मामलों में समान हैं।
उन्होंने कहा—
«“गरीब हिन्दू और गरीब मुस्लिम की तकलीफ एक है। बेरोजगार हिन्दू और बेरोजगार मुस्लिम की समस्या एक है। महंगाई दोनों के घर का चूल्हा प्रभावित करती है। बीमारी दोनों के परिवार को परेशान करती है।”»
उन्होंने सवाल किया कि अगर आम नागरिक रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और महंगाई की समस्या से जूझ रहा है तो उसे धार्मिक मुद्दों पर बांटने से उसकी आर्थिक परेशानी कैसे दूर होगी।
गादरे ने कहा कि धार्मिक पहचान के आधार पर राजनीतिक संघर्ष खड़ा करने के बजाय गरीबों और वंचित वर्गों की आर्थिक एवं सामाजिक समस्याओं पर चर्चा होनी चाहिए।
“रोटी के सवाल को मंदिर-मस्जिद से नहीं दबाया जा सकता”
बहुजन मुक्ति पार्टी नेता ने कहा कि जनता के आर्थिक सवालों को भावनात्मक मुद्दों के पीछे नहीं छिपाया जा सकता।
उन्होंने कहा—
«“रोटी के सवाल को मंदिर-मस्जिद से नहीं दबाया जा सकता। रोजगार के सवाल को नफरत से नहीं दबाया जा सकता। महंगाई के सवाल को भाषणों से नहीं दबाया जा सकता।”»
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता को सरकार से सवाल पूछने और नीतियों का मूल्यांकन करने का अधिकार है।
सरकार से पूछे आर्थिक सवाल
गादरे ने केंद्र सरकार के सामने कई सवाल रखते हुए कहा कि इनका जवाब जनता के सामने आना चाहिए।
उन्होंने पूछा—
- देश पर कर्ज बढ़ रहा है तो आम नागरिक की आय कितनी बढ़ी?
- युवाओं के लिए कितने स्थायी रोजगार के अवसर पैदा हुए?
- गरीब परिवारों के बच्चों के लिए शिक्षा कितनी सुलभ और सस्ती हुई?
- सरकारी अस्पतालों और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में कितना सुधार हुआ?
- किसानों और मजदूरों की आर्थिक सुरक्षा कितनी मजबूत हुई?
- छोटे व्यापारियों और मध्यम वर्ग को कितनी आर्थिक राहत मिली?
- सरकार के कर्ज और उसके ब्याज भुगतान का बोझ कितना है?
- सार्वजनिक धन का इस्तेमाल किन प्रमुख क्षेत्रों में किया जा रहा है?
गादरे ने कहा कि इन सवालों पर सरकार को आंकड़ों और तथ्यों के साथ जवाब देना चाहिए।
“जनता के टैक्स और कर्ज का हिसाब पारदर्शी होना चाहिए”
उन्होंने कहा कि सरकार के पास उपलब्ध संसाधन अंततः जनता और देश की अर्थव्यवस्था से जुड़े हैं। इसलिए सरकारी खर्च, कर्ज, ब्याज भुगतान और विकास योजनाओं पर पर्याप्त पारदर्शिता होनी चाहिए।
गादरे ने कहा कि आर्थिक नीतियों को लेकर राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं, लेकिन जनता को यह जानने का अधिकार है कि सरकारी धन किन प्राथमिकताओं पर खर्च किया जा रहा है।
“अब जनता को डराकर नहीं, जवाब देकर वोट मांगना होगा”
गादरे ने कहा कि लोकतंत्र में जनता सर्वोच्च है और चुनी हुई सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है।
उन्होंने कहा कि चुनाव के समय केवल धार्मिक और भावनात्मक मुद्दों के आधार पर वोट मांगने के बजाय राजनीतिक दलों को अपने कार्यकाल का रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने रखना चाहिए।
उन्होंने सवाल किया—
«“पांच साल में हमारे लिए क्या किया? हमारे बच्चों के लिए क्या किया? रोजगार कितना दिया? महंगाई कितनी घटाई? शिक्षा और स्वास्थ्य कितने बेहतर किए?”»
उन्होंने कहा कि जनता को राजनीतिक दलों से इन सवालों के जवाब मांगने चाहिए।
आर्थिक और सामाजिक न्याय को मुद्दा बनाएगी पार्टी
गादरे ने कहा कि बहुजन मुक्ति पार्टी जनता के बीच आर्थिक न्याय, सामाजिक न्याय, शिक्षा, रोजगार और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों को मजबूती से उठाएगी।
उन्होंने कहा कि पार्टी का प्रयास रहेगा कि राजनीतिक विमर्श में आम नागरिक की समस्याओं को प्रमुखता मिले और गरीब, मजदूर, किसान, युवा तथा मध्यम वर्ग से जुड़े सवाल सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में आएं।
गादरे का सीधा संदेश
राजुद्दीन गादरे ने अपने बयान के अंत में सरकार और राजनीतिक दलों के सामने कई मुद्दे रखते हुए कहा—
«“नफरत की राजनीति बंद करो!
जनता को धर्म के नाम पर मत बांटो!
बेरोजगार युवाओं को रोजगार दो!
महंगाई से जनता को राहत दो!
देश के कर्ज का हिसाब दो!
जनता के टैक्स का हिसाब दो!
और लोकतंत्र में जनता के सवालों का जवाब दो!”»
उन्होंने कहा कि अब जनता को तय करना है कि उसे ऐसी राजनीति चाहिए जो लोगों को आपस में बांटे या ऐसी राजनीति जो रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर काम करे।
उन्होंने कहा—
«“जनता जाग गई तो सत्ता के सारे भ्रम टूट जाएंगे। अब नफरत नहीं—हिसाब होगा। अब उन्माद नहीं—सवाल होगा। अब जुमले नहीं—जवाब होगा।”