ई.वी. रामासामी (पेरियार)
संविधान, आरक्षण, जाति व्यवस्था और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व पर बहस तेज करने की अपील
मेरठ । महान समाज सुधारक, तर्कवादी और सामाजिक न्याय के आंदोलन से जुड़े पेरियार ई.वी. रामासामी की जयंती के अवसर पर सामाजिक समानता, जाति व्यवस्था, आरक्षण और वंचित वर्गों के प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर बहस की आवश्यकता पर जोर दिया गया। बहुजन मुक्ति पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं उत्तर प्रदेश-दिल्ली प्रदेश प्रभारी राजुद्दीन गादरे ने कहा कि पेरियार की विचारधारा पर चर्चा करते हुए सामाजिक न्याय और समान अवसर के सवालों को वर्तमान संदर्भ में भी समझना जरूरी है।
जाति आधारित भेदभाव और सामाजिक असमानता के खिलाफ पेरियार का आंदोलन
पेरियार ई.वी. रामासामी का जन्म 17 सितंबर 1879 को हुआ था। उन्होंने जाति आधारित भेदभाव, सामाजिक असमानता और अंधविश्वास के खिलाफ लंबे समय तक सामाजिक आंदोलन चलाया। दक्षिण भारत में सामाजिक न्याय और गैर-ब्राह्मण आंदोलन से उनका नाम प्रमुख रूप से जुड़ा रहा। हिंदी थोपे जाने के विरोध से जुड़े आंदोलनों में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। पेरियार के सामाजिक चिंतन का प्रमुख विषय यह था कि कानून में समानता के साथ-साथ समाज में व्याप्त ऐतिहासिक असमानताओं और भेदभाव को भी संबोधित किया जाना चाहिए। इसी संदर्भ में उनकी जयंती पर सामाजिक प्रतिनिधित्व और समान अवसर को लेकर बहस की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
संविधान को लेकर पेरियार के विरोध का संदर्भ
पेरियार के राजनीतिक-सामाजिक आंदोलन में संविधान को लेकर भी तीखी आपत्तियां सामने आई थीं। 1957 में उनके नेतृत्व में संविधान की प्रतियां जलाने का आंदोलन हुआ। उनके समर्थित तर्कों में यह सवाल प्रमुख था कि केवल कानूनी समानता पर्याप्त है या सामाजिक और जातिगत असमानताओं को समाप्त करने के लिए अतिरिक्त सामाजिक एवं राजनीतिक उपायों की आवश्यकता है। इस संदर्भ में पेरियार की आलोचना को उनके व्यापक सामाजिक न्याय आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में देखा जाता है। उनके विचारों में सामाजिक संरचना, जातिगत असमानता और वंचित समूहों के प्रतिनिधित्व का प्रश्न महत्वपूर्ण रहा।
आरक्षण के सवाल से जुड़ा 1951 का महत्वपूर्ण संवैधानिक घटनाक्रम
आरक्षण के संदर्भ में 1951 का State of Madras बनाम Champakam Dorairajan मामला महत्वपूर्ण माना जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने मद्रास सरकार के Communal G.O. के तहत समुदाय आधारित शैक्षणिक सीटों के वितरण को संविधान के अनुच्छेद 29(2) के अनुरूप नहीं माना। इसके बाद संविधान के प्रथम संशोधन, 1951 के माध्यम से अनुच्छेद 15(4) जोड़ा गया, जिसके तहत राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के उन्नयन के लिए विशेष प्रावधान करने की शक्ति मिली। यह घटनाक्रम भारतीय संविधान में समानता और सामाजिक न्याय के बीच संबंध पर होने वाली बहस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना। बाद के वर्षों में आरक्षण और सकारात्मक कार्रवाई से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या पर भी न्यायालयों में विभिन्न मामलों में चर्चा होती रही।

सामाजिक प्रतिनिधित्व का सवाल आज भी बहस का विषय
पेरियार जयंती के अवसर पर सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर यह सवाल भी उठाया गया कि विभिन्न सामाजिक वर्गों को शासन, प्रशासन, शिक्षा, रोजगार और निर्णय लेने वाली संस्थाओं में कितना प्रतिनिधित्व मिल रहा है। जाति जनगणना, आरक्षण, सरकारी नौकरियों में अवसर, शिक्षा और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दे समय-समय पर सार्वजनिक और राजनीतिक बहस का हिस्सा रहे हैं। गादरे ने कहा कि सामाजिक न्याय की चर्चा केवल आरक्षण तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि शिक्षा, रोजगार, प्रशासनिक संस्थाओं और निर्णय प्रक्रिया में अवसर तथा प्रतिनिधित्व के व्यापक सवालों पर भी विचार होना चाहिए।
सामाजिक न्याय की बहस को समुदायों के विरुद्ध नफरत से अलग रखने की अपील
पेरियार की विचारधारा पर चर्चा के दौरान यह सवाल भी उठाया गया कि सामाजिक न्याय की लड़ाई को किसी जाति, धर्म या समुदाय के विरुद्ध घृणा में बदलने के बजाय व्यवस्था, कानून, समान अवसर और प्रतिनिधित्व के मुद्दों तक सीमित रखा जाए। किसी संगठन, राजनीतिक दल, उद्योगपति, अधिकारी अथवा व्यक्ति पर भ्रष्टाचार, घोटाले, चुनावी धांधली या अन्य गंभीर आरोप लगाए जाने की स्थिति में उनकी पुष्टि स्वतंत्र और विश्वसनीय दस्तावेजों तथा संबंधित पक्ष के जवाब के आधार पर किए जाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।
लोकतांत्रिक और संवैधानिक माध्यमों से सामाजिक बदलाव पर जोर
सामाजिक न्याय के समर्थकों का तर्क है कि ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों के लिए समान अवसर और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना सामाजिक समानता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। दूसरी ओर, संवैधानिक व्यवस्था के संदर्भ में सामाजिक परिवर्तन की बहस को लोकतांत्रिक संस्थाओं, कानून और संवैधानिक प्रक्रियाओं के माध्यम से आगे बढ़ाने की आवश्यकता भी महत्वपूर्ण है। भारत के संविधान में समानता से संबंधित प्रावधानों के साथ सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के उन्नयन के लिए विशेष प्रावधानों की व्यवस्था भी की गई है। अनुच्छेद 15(4) इसी संवैधानिक ढांचे का हिस्सा है।
गादरे बोले- सवाल सम्मान, शिक्षा, रोजगार और भागीदारी का
बहुजन मुक्ति पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं उत्तर प्रदेश-दिल्ली प्रदेश प्रभारी राजुद्दीन गादरे ने कहा कि पेरियार ई.वी. रामासामी की जयंती केवल उनके ऐतिहासिक योगदान को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि सामाजिक समानता और प्रतिनिधित्व से जुड़े वर्तमान सवालों पर चर्चा का भी अवसर है। उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय की बहस को तथ्यों, संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर आगे बढ़ाया जाना चाहिए। उनके अनुसार सवाल किसी जाति या समुदाय से नफरत का नहीं, बल्कि इस बात का है कि देश के प्रत्येक नागरिक को सम्मान, शिक्षा, रोजगार, अधिकार और निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक भागीदारी कब और कैसे मिलेगी। गादरे ने कहा कि सामाजिक असमानता और प्रतिनिधित्व जैसे विषयों पर व्यापक और तथ्य आधारित सार्वजनिक चर्चा आवश्यक है, ताकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सभी वर्गों के अधिकारों और अवसरों को लेकर सार्थक संवाद आगे बढ़ सके