अवैध निर्माण गिराता बुलडोजर (फाइल फोटो)
जोन-ए में एमडीए द्वारा चिन्हित संपत्तियों पर कार्रवाई के निर्देश, जोन-बी, सी और डी में भी अवैध निर्माण चिह्नित होंगे
मेरठ । मेरठ के शास्त्रीनगर स्थित सेंट्रल मार्केट में आवासीय संपत्तियों के व्यावसायिक इस्तेमाल और अवैध निर्माण के मामले में सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाया। सुप्रीम कोर्ट ने मेरठ विकास प्राधिकरण (एमडीए) द्वारा जोन-ए में चिन्हित की गई 16,726 अनधिकृत व्यावसायिक संपत्तियों को सील करने का आदेश दिया है। अदालत ने शहर के अन्य क्षेत्रों में भी इसी तरह की अनधिकृत संपत्तियों को चिन्हित करने के निर्देश दिए हैं।
16,726 संपत्तियों पर कार्रवाई के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सुनवाई के दौरान बताया गया कि एमडीए ने जोन-ए में बड़ी संख्या में ऐसी संपत्तियों को चिन्हित किया है, जहां आवासीय भवनों में व्यावसायिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं। अदालत ने इन संपत्तियों को सील करने के निर्देश दिए। इसके साथ ही जोन-बी, जोन-सी और जोन-डी में भी इस तरह की संपत्तियों की पहचान करने को कहा गया है। अदालत के निर्देशों के बाद मेरठ में आवासीय क्षेत्रों में चल रही व्यावसायिक गतिविधियों की जांच और कार्रवाई का दायरा बढ़ने की संभावना है। मामले की अगली सुनवाई 9 दिसंबर 2026 को निर्धारित की गई है।
सेंट्रल मार्केट की 44 संपत्तियों पर भी कार्रवाई
सेंट्रल मार्केट की 44 चिन्हित संपत्तियां पहले से ही इस मामले की कार्रवाई के केंद्र में हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 14 जुलाई के आदेश में इन संपत्तियों में किए गए अवैध निर्माण को हटाने के निर्देश दिए थे। इसके अनुपालन में आवास एवं विकास परिषद की ओर से कार्रवाई की गई। सोमवार की सुनवाई में अदालत को बताया गया कि 44 संपत्तियों में से 20 संपत्तियों से अवैध निर्माण पूरी तरह हटाया जा चुका है, जबकि शेष 24 संपत्तियों में कार्रवाई की जा रही है। अदालत ने शेष संपत्तियों में भी कार्रवाई पूरी करने के निर्देश दिए।
16 सितंबर को शुरू हुआ था ध्वस्तीकरण अभियान
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में आवास एवं विकास परिषद ने 16 सितंबर को शास्त्रीनगर सेंट्रल मार्केट में ध्वस्तीकरण अभियान शुरू किया था। भारी पुलिस बल की मौजूदगी में छह संपत्तियों पर कार्रवाई की गई थी। इससे पहले संबंधित संपत्ति मालिकों को अवैध हिस्से हटाने के लिए समय दिया गया था। कार्रवाई के दौरान सेंट्रल मार्केट और आसपास के क्षेत्र में बैरिकेडिंग की गई थी तथा सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई गई थी। परिषद का कहना था कि कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुपालन में की जा रही है।
अवैध निर्माण पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अवैध निर्माण को लेकर कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने कहा कि अवैध निर्माण को केवल इसलिए वैध नहीं माना जा सकता कि उसे बने हुए लंबा समय हो गया है। अदालत के रुख के मुताबिक नियमों के विपरीत किए गए निर्माण के संबंध में कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी है।
ईडब्ल्यूएस और एलआईजी आवासों का भी मामला उठा
सुनवाई के दौरान आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और निम्न आय वर्ग के आवासों का मुद्दा भी सामने आया। उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि ईडब्ल्यूएस और एलआईजी श्रेणी के 486 आवासों के लिए पुनर्वास नीति लाई जा रही है। इससे प्रभावित आवासों के संबंध में आगे की कार्रवाई और पुनर्वास नीति का स्वरूप महत्वपूर्ण रहेगा।
उल्देपुर की अवैध कॉलोनियों पर भी कोर्ट ने मांगा जवाब
सुनवाई के दौरान मेरठ के उल्देपुर क्षेत्र में विकसित की गई कथित अवैध कॉलोनियों का मामला भी सामने आया। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में अधिकारियों से सवाल किया और ऐसी कॉलोनियों के अस्तित्व में आने को लेकर जवाब मांगा। रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने अवैध कॉलोनियों के संबंध में भी कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
व्यापारियों की राहत की मांग पर भी हुई सुनवाई
सेंट्रल मार्केट के व्यापारियों की ओर से भी अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखा गया। व्यापारियों की ओर से ध्वस्तीकरण से पहले पुनर्वास और तब तक यथास्थिति बनाए रखने की मांग रखी गई। हालांकि उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार अदालत ने फिलहाल कार्रवाई रोकने संबंधी राहत नहीं दी और आवास एवं विकास परिषद को मामले में आगे की कार्रवाई जारी रखने को कहा।
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट के सोमवार के आदेश के बाद अब मेरठ में अवैध निर्माण और आवासीय क्षेत्रों में चल रही व्यावसायिक गतिविधियों की जांच का दायरा बढ़ सकता है। जोन-ए में चिन्हित 16,726 संपत्तियों के संबंध में सीलिंग की कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी, जबकि जोन-बी, सी और डी में भी ऐसी संपत्तियों की पहचान की जाएगी।
सेंट्रल मार्केट की 44 संपत्तियों में शेष अवैध निर्माण हटाने की कार्रवाई भी आगे बढ़ेगी। पूरे मामले में अगली महत्वपूर्ण सुनवाई 9 दिसंबर 2026 को होगी, जिसमें अब तक की कार्रवाई और संबंधित अधिकारियों द्वारा उठाए गए कदमों की स्थिति अदालत के सामने रखी जा सकती है।