जैव प्राद्योगिकी सोमिनार में प्रतिभागी छात्राएं
मेरठ। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय (सीसीएसयू), मेरठ के जैव प्रौद्योगिकी विभाग में मंगलवार को ‘पादप–सूक्ष्मजीव अंतःक्रियाएं एवं सतत कृषि में जैव-प्रौद्योगिकीय अनुप्रयोग’ विषय पर विशेष अतिथि व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बीएससी एवं एमएससी जैव प्रौद्योगिकी के विद्यार्थियों के साथ विभाग के शोधार्थियों और शिक्षकों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। व्याख्यान के माध्यम से विद्यार्थियों को आधुनिक कृषि में जैव प्रौद्योगिकी की उपयोगिता और पर्यावरण-अनुकूल कृषि की संभावनाओं से परिचित कराया गया।
उज्बेकिस्तान की वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रो. दिलफुज़ा जब्बोरोवा रहीं मुख्य वक्ता
कार्यक्रम की मुख्य वक्ता एवं विशेषज्ञ प्रो. दिलफुज़ा जब्बोरोवा, वरिष्ठ वैज्ञानिक, आनुवंशिकी एवं पादप प्रायोगिक जीवविज्ञान संस्थान, उज्बेकिस्तान विज्ञान अकादमी रहीं। उन्होंने पादपों और सूक्ष्मजीवों के बीच होने वाली पारस्परिक अंतःक्रियाओं को विस्तार से समझाते हुए बताया कि ये अंतःक्रियाएं कृषि उत्पादन, मृदा की गुणवत्ता और पौधों के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
उन्होंने कहा कि सतत एवं पर्यावरण-अनुकूल कृषि की दिशा में लाभकारी सूक्ष्मजीवों का उपयोग महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी के माध्यम से इन सूक्ष्मजीवों की क्षमताओं का बेहतर उपयोग कर कृषि को अधिक टिकाऊ बनाने की दिशा में काम किया जा सकता है।
पौधों की वृद्धि और मृदा स्वास्थ्य में लाभकारी सूक्ष्मजीव महत्वपूर्ण
प्रो. जब्बोरोवा ने अपने व्याख्यान में बताया कि लाभकारी सूक्ष्मजीव पौधों की वृद्धि को प्रोत्साहित करने के साथ पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने, मृदा स्वास्थ्य बेहतर करने और विभिन्न रोगों के प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने विद्यार्थियों को सूक्ष्मजीवी जैव-संवर्धकों, जैविक रोग नियंत्रण तथा पादप वृद्धि को प्रोत्साहित करने वाले सूक्ष्मजीवों के महत्व से अवगत कराया।
उन्होंने बताया कि कृषि में इस प्रकार के जैविक विकल्पों का प्रभावी उपयोग रासायनिक कृषि-आदानों पर निर्भरता कम करने में सहायक हो सकता है। इससे पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव को कम करने के साथ टिकाऊ कृषि व्यवस्था को बढ़ावा देने की दिशा में भी मदद मिल सकती है।
नवीन शोध और भविष्य की संभावनाओं से विद्यार्थियों को कराया परिचित
विशेषज्ञ व्याख्यान के दौरान पादप–सूक्ष्मजीव अंतःक्रियाओं के केवल सैद्धांतिक पक्ष ही नहीं, बल्कि उनके व्यावहारिक और जैव-प्रौद्योगिकीय उपयोग पर भी चर्चा की गई। प्रो. जब्बोरोवा ने इस क्षेत्र में चल रहे नवीन शोध और भविष्य में विकसित होने वाली संभावनाओं की जानकारी विद्यार्थियों को दी।
उन्होंने विद्यार्थियों और शोधार्थियों को कृषि जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नई शोध संभावनाओं की तलाश करने के लिए प्रेरित किया। व्याख्यान के माध्यम से यह समझाने का प्रयास किया गया कि जैव प्रौद्योगिकी के आधुनिक प्रयोग कृषि उत्पादन और पर्यावरण संरक्षण के बीच बेहतर संतुलन स्थापित करने में उपयोगी हो सकते हैं।
80 से अधिक शोध-पत्र हो चुके हैं प्रकाशित
कार्यक्रम में बताया गया कि प्रो. दिलफुज़ा जब्बोरोवा 50 से अधिक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में सहभागिता कर चुकी हैं और उनके 80 से अधिक शोध-पत्र अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। उन्हें विश्व के शीर्ष दो प्रतिशत वैज्ञानिकों की सूची में भी स्थान प्राप्त हुआ है। इसके अतिरिक्त वह विभिन्न अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में शैक्षणिक संपादक एवं संपादकीय मंडल की सदस्य के रूप में भी योगदान दे रही हैं।
विद्यार्थियों और शोधार्थियों ने बताया ज्ञानवर्धक
कार्यक्रम में जैव प्रौद्योगिकी विभाग के समन्वयक प्रो. जितेंद्र सिंह सहित डॉ. प्रदीप कुमार, डॉ. आशु त्यागी, डॉ. ज्ञानिका शुक्ला, डॉ. संगीता बजाज, डॉ. सुप्रिया तोमर एवं डॉ. विदुषी महाजन उपस्थित रहे।
विभागीय शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने अतिथि व्याख्यान को ज्ञानवर्धक एवं शोधपरक बताया। उनका कहना था कि कार्यक्रम से पादप–सूक्ष्मजीव अंतःक्रियाओं, कृषि जैव प्रौद्योगिकी और सतत कृषि के क्षेत्र में विकसित हो रही नई शोध संभावनाओं को समझने का अवसर मिला।
कार्यक्रम के समापन पर विभाग की ओर से प्रो. दिलफुज़ा जब्बोरोवा के प्रति आभार व्यक्त किया गया। साथ ही विद्यार्थियों को कृषि जैव प्रौद्योगिकी, पर्यावरण-अनुकूल कृषि और सतत कृषि के उभरते क्षेत्रों में अध्ययन एवं अनुसंधान के लिए प्रेरित किया गया।