आचार्य आर्जवसागर महाराज
तमिलनाडु से 32 श्रद्धालु पहुंचे बड़ौत; आचार्य आर्जवसागर महाराज के दर्शन कर जताई गुरु भक्ति
बड़ौत । मंडी बड़ौत स्थित अजितनाथ सभागार में परम पूज्य आचार्य श्री 108 आर्जवसागर जी महामुनिराज ससंघ के सान्निध्य में चल रहे श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के छठे दिन श्रद्धा और भक्ति का वातावरण रहा। विधान में श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से पूजन कर सिद्ध परमेष्ठी के चरणों में 256 अर्घ्य समर्पित किए। जिनेंद्र भगवान की आराधना और भक्ति गीतों से सभागार गूंज उठा।
इस अवसर पर तमिलनाडु से 20 प्रतिमाधारी और 12 अणुव्रती सहित कुल 32 श्रद्धालु बड़ौत पहुंचे। उन्होंने आचार्य श्री के दर्शन कर अपनी गुरु निष्ठा और भक्ति व्यक्त की। दक्षिण भारत से उत्तर प्रदेश की धर्मभूमि तक पहुंचे इन श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने विधान के आयोजन को विशेष बना दिया। आचार्य श्री का पूर्व में तमिलनाडु में सात वर्ष का प्रवास रहा था। श्रद्धालुओं की यह यात्रा गुरु के प्रति उनके अनुराग और समर्पण को दर्शाती है।
जिनाभिषेक और शांतिधारा से हुआ विधान का शुभारंभ
प्रातःकाल जिनाभिषेक और सौधर्म इंद्र राजेश जैन द्वारा की गई शांतिधारा के साथ धार्मिक कार्यक्रम शुरू हुए। इसके बाद श्रद्धालुओं ने जिनेंद्र भगवान की पूजा-अर्चना की। विधानाचार्य पं. सनत कुमार जैन और पं. विनोद कुमार जैन के निर्देशन में धार्मिक क्रियाएं संपन्न हुईं। श्रद्धालुओं ने 256 अर्घ्य अर्पित कर सिद्ध परमेष्ठी के गुणों का स्मरण किया। संतोष म्यूजिकल ग्रुप की संगीतमय प्रस्तुतियों ने वातावरण को भक्तिमय बनाए रखा।
आचार्य श्री ने बताया आत्मस्वरूप पहचानने का मार्ग
प्रवचन में आचार्य श्री आर्जवसागर जी महाराज ने सिद्धचक्र महामंडल विधान की आध्यात्मिक महत्ता बताई। उन्होंने कहा कि जिनेंद्र भगवान की आराधना का उद्देश्य केवल धार्मिक क्रियाएं करना नहीं, बल्कि आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानना है। अर्घ्य समर्पित करते समय साधक सिद्ध परमेष्ठी के अनंत गुणों का स्मरण करता है और अपने जीवन को उन गुणों के अनुरूप ढालने की प्रेरणा लेता है।
आचार्य श्री ने कहा कि सिद्ध परमेष्ठी वह अवस्था है, जिसमें आत्मा सभी कर्मबंधनों से मुक्त होकर अपने शुद्ध स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाती है। सिद्धों की आराधना यह संदेश देती है कि संसार के सुख क्षणिक हैं, जबकि आत्मिक शांति और कर्मों से मुक्ति जीवन का परम लक्ष्य है। धर्माराधना तभी सार्थक होती है, जब श्रद्धा के साथ जीवन में संयम, विनय, सदाचार और आत्मचिंतन भी शामिल हों।
उन्होंने श्रद्धालुओं से पूजा और विधान के साथ दैनिक जीवन में भी धर्म के सिद्धांत अपनाने का आह्वान किया। मन, वचन और काया की शुद्धि, कषायों पर नियंत्रण तथा सभी जीवों के प्रति करुणा का भाव आत्मकल्याण के मार्ग को प्रशस्त करता है।
शाम को हुई नृत्य नाटिका, 15 अक्टूबर को होगा विधान का समापन
मीडिया प्रभारी वरदान जैन ने बताया कि श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होकर धर्मलाभ प्राप्त कर रहे हैं। शाम को आरती के बाद दिल्ली के मयूर आर्ट ग्रुप ने भरत-बाहुबली युद्ध पर आधारित नृत्य नाटिका प्रस्तुत की।
विधान का समापन 15 अक्टूबर को होगा। इसी दिन शाम पांच बजे श्री वकील चंद जैन, पूर्व प्राचार्य दिगंबर जैन इंटर कॉलेज बड़ौत, की दीक्षा पूर्व शोभायात्रा निकाली जाएगी। शाम सात बजे अजितनाथ सभागार में गोद भराई का कार्यक्रम आयोजित होगा।