डॉ॰ आशीष कौशिक
मेरठ। शासन व्यवस्था में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और पूर्वानुमान आधारित प्रणालियों का बढ़ता इस्तेमाल नागरिकों के मौलिक अधिकारों के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। तकनीक को मानवीय स्वतंत्रता, संवैधानिक मूल्यों और न्याय के अधीन रखना आवश्यक है। यह बात चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के विधि अध्ययन संस्थान के सहायक प्रोफेसर डॉ. आशीष कौशिक ने एक अंतरराष्ट्रीय विश्व कांग्रेस में ऑनलाइन व्याख्यान के दौरान कही।
डॉ. कौशिक ने ‘शासन प्रणालियों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, पूर्वानुमान आधारित विश्लेषण और मौलिक अधिकार’ विषय पर अपने विचार रखे। कांग्रेस का संयुक्त आयोजन ब्राजील के यूनिवर्सिटी ऑफ काक्सियास डो सुल और यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सट्रेमो सुल कैटारिनेन्स ने किया। इसमें विभिन्न देशों के न्यायविदों, शिक्षाविदों और संवैधानिक विशेषज्ञों ने आधुनिक तकनीक, शासन और मानवाधिकारों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की।
‘ब्लैक बॉक्स’ प्रणालियों के फैसलों का आधार जानना जरूरी
डॉ. कौशिक ने कहा कि स्वचालित निर्णय लेने वाली प्रणालियां और गहन अधिगम पर आधारित तंत्रिका नेटवर्क कई बार ऐसे नतीजे देते हैं, जिनके पीछे के कारण आम नागरिकों के लिए समझना कठिन होता है। यह स्थिति तब अधिक गंभीर हो सकती है, जब इन प्रणालियों के आधार पर सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ देने, किसी व्यक्ति को निगरानी सूची में शामिल करने या जमानत जैसे जीवन को प्रभावित करने वाले फैसले लिए जाएं।
उन्होंने कहा कि नागरिकों को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि उनके संबंध में कोई निर्णय किन कारणों और तथ्यों के आधार पर लिया गया। निर्णय का आधार स्पष्ट न होने पर प्रभावित व्यक्ति के लिए प्रभावी अपील या न्यायिक समीक्षा मांगना कठिन हो सकता है। इसलिए स्वचालित निर्णयों में पारदर्शिता, जवाबदेही और न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करना जरूरी है।
आंकड़ों में मौजूद पूर्वाग्रह दोहरा सकती है तकनीक
डॉ. कौशिक ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता की गणितीय निष्पक्षता के दावों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि ये प्रणालियां जिस आंकड़ा-सामग्री से सीखती हैं, उसमें पहले से मौजूद सामाजिक भेदभाव और पूर्वाग्रह शामिल हो सकते हैं। ऐसे आंकड़ों के आधार पर ऋण पात्रता का आकलन या अपराध की आशंका के आधार पर पुलिस कार्रवाई जैसी व्यवस्थाएं वंचित समुदायों के प्रति भेदभाव को और मजबूत कर सकती हैं।
उन्होंने कहा कि किसी निर्णय का गणितीय गणना पर आधारित होना अपने आप में निष्पक्षता की गारंटी नहीं है। आंकड़ों में असमानता होने पर तकनीक उसी असमानता को अधिक व्यापक और संस्थागत रूप दे सकती है। इसलिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस्तेमाल में स्वतंत्र निष्पक्षता जांच और संवैधानिक मानकों का पालन आवश्यक है।
निगरानी से व्यवहार पर असर डालने तक पहुंच सकती है तकनीक
डॉ. कौशिक ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विशेषकर सृजनात्मक कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए बड़े पैमाने पर आंकड़े जुटाने और उनका विश्लेषण करने से निजता के अधिकार के सामने नई चुनौतियां खड़ी हुई हैं। निगरानी केवल किसी व्यक्ति की गतिविधियों पर नजर रखने तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि उसके व्यवहार का अनुमान लगाने और उसे प्रभावित करने का माध्यम भी बन सकती है।
उन्होंने आगाह किया कि इससे व्यक्ति की स्वायत्तता, निजता और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता कमजोर हो सकती है। तकनीकी विकास के साथ व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा की रक्षा के लिए प्रभावी कानूनी उपाय विकसित करना समय की जरूरत है।
मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सुझाए चार कानूनी उपाय
डॉ. कौशिक ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दुरुपयोग को रोकने और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए चार प्रमुख उपाय सुझाए। पहला, स्वचालित निर्णयों के कारण जानने का नागरिकों को कानूनी अधिकार मिले। उनके अनुसार, एल्गोरिदम आधारित फैसलों के स्पष्ट और समझने योग्य कारण दिए जाने चाहिए, ताकि प्रभावित व्यक्ति न्यायिक समीक्षा की मांग कर सके।
दूसरा, कानून लागू करने और सामाजिक कल्याण योजनाओं में इस्तेमाल होने वाले एल्गोरिदम की संवैधानिक कसौटियों पर जांच हो। तकनीक का उपयोग आवश्यक, उचित और आनुपातिक होना चाहिए तथा मनमाने फैसलों को रोकने के लिए सख्त मानक लागू किए जाने चाहिए।
तीसरा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, न्यायिक निर्णय और अन्य संवेदनशील मामलों में मानवीय निगरानी अनिवार्य हो। अंतिम जिम्मेदारी केवल मशीनों पर नहीं छोड़ी जा सकती; निर्णय प्रक्रिया में मानवीय विवेक, नैतिकता और कानूनी जवाबदेही की भूमिका बनी रहनी चाहिए।
चौथा, बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों की जवाबदेही तय की जाए। डॉ. कौशिक ने कहा कि जब निजी कंपनियों के डिजिटल मंच और प्रणालियां सार्वजनिक जीवन को व्यापक रूप से प्रभावित करती हैं, तो उन्हें भी मौलिक अधिकारों के संरक्षण और जवाबदेही से जुड़े उचित मानकों के दायरे में लाना जरूरी है।
“कृत्रिम बुद्धिमत्ता शासन और अधिकारों की पुनर्रचना है”
व्याख्यान के समापन में डॉ. कौशिक ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल तकनीकी प्रगति या संस्थागत दक्षता का साधन नहीं, बल्कि शासन और अधिकारों की पुनर्रचना का माध्यम भी है। तकनीक का उद्देश्य मानवीय क्षमताओं को सशक्त करना होना चाहिए, न कि नागरिकों की स्वतंत्रता, निजता और न्याय पाने के अधिकार को कमजोर करना।
उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग तभी स्वीकार्य हो सकता है, जब उसके केंद्र में संविधान, पारदर्शिता, मानवीय गरिमा और जवाबदेही जैसे मूलभूत मूल्य बने रहें।