हृदय रोग: कारण, लक्षण, बचाव, इलाज और भारत में उपचार की सुविधाएं
समय पर पहचान और विशेषज्ञ से उपचार से कई कैंसर का बेहतर इलाज संभव; गांठ या लगातार बने रहने वाले लक्षणों को न करें नजरअंदाज
कैंसर क्या है ?
कैंसर बीमारियों का एक बड़ा समूह है। इसमें शरीर की कुछ कोशिकाएं असामान्य रूप से बढ़ने और विभाजित होने लगती हैं। ये कोशिकाएं आसपास के ऊतकों में फैल सकती हैं और शरीर के दूसरे अंगों तक पहुंच सकती हैं। इस फैलाव को मेटास्टेसिस कहा जाता है। कैंसर का प्रकार इस बात पर निर्भर करता है कि वह शरीर के किस अंग या ऊतक से शुरू हुआ है। हर गांठ कैंसर नहीं होती और हर कैंसर में एक जैसे लक्षण भी नहीं होते।
कैंसर होने के प्रमुख कारण और जोखिम
कैंसर का कोई एक कारण नहीं होता। कोशिकाओं में होने वाले बदलावों के पीछे आनुवंशिक कारण, उम्र और बाहरी जोखिमों का मेल हो सकता है। तंबाकू और गुटखा, शराब, असंतुलित भोजन, शारीरिक गतिविधि की कमी, अधिक वजन, वायु प्रदूषण, सूर्य की पराबैंगनी किरणें तथा कुछ संक्रमण कैंसर का जोखिम बढ़ा सकते हैं। एस्बेस्टस और कुछ अन्य हानिकारक रसायनों के संपर्क में लंबे समय तक रहना भी जोखिमकारी हो सकता है।
कुछ संक्रमण भी विशेष प्रकार के कैंसर से जुड़े हैं। उदाहरण के लिए, ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (एचपीवी) गर्भाशय-ग्रीवा के कैंसर का जोखिम बढ़ा सकता है। हेपेटाइटिस बी और सी का संक्रमण यकृत कैंसर से जुड़ा हो सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि संक्रमण होने पर कैंसर होना तय है, लेकिन संक्रमण की जांच, रोकथाम और चिकित्सकीय सलाह अहम है।
हर कैंसर को रोका नहीं जा सकता। फिर भी तंबाकू से दूरी, स्वस्थ जीवनशैली और कुछ संक्रमणों से बचाव जैसे कदम जोखिम घटाने में मदद कर सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, उपलब्ध प्रमाण-आधारित रोकथाम उपायों से कैंसर के एक हिस्से को रोका जा सकता है।
किन लक्षणों पर ध्यान देना चाहिए?
कैंसर के लक्षण उसके प्रकार और प्रभावित अंग के अनुसार अलग-अलग होते हैं। नीचे दिए गए संकेतों में से कोई भी लक्षण अपने आप में कैंसर की पुष्टि नहीं करता, लेकिन यदि वह बना रहे, बढ़े या बिना स्पष्ट कारण दिखाई दे तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है:
- शरीर में नई गांठ या सूजन, खासकर स्तन, गर्दन, बगल या जांघ के पास
- मुंह का ऐसा घाव जो ठीक न हो, मुंह में सफेद या लाल धब्बा, आवाज में लगातार बदलाव
- बिना चोट के खून आना या मल-मूत्र में खून दिखाई देना
- लंबे समय तक बनी खांसी, खांसी में खून या सांस लेने में परेशानी
- निगलने में कठिनाई या लगातार अपच
- मल-मूत्र की आदतों में लगातार बदलाव
- किसी तिल या मस्से के आकार, रंग या रूप में बदलाव
- बिना प्रयास के वजन कम होना, भूख घटना या असामान्य थकान
इन लक्षणों की वजह कैंसर के अलावा दूसरी बीमारियां भी हो सकती हैं। इसलिए स्वयं निष्कर्ष निकालने या डरने के बजाय चिकित्सक से परामर्श करें।
कैंसर की जांच कैसे होती है?
डॉक्टर पहले मरीज के लक्षणों, स्वास्थ्य और परिवार में बीमारियों के इतिहास की जानकारी लेते हैं तथा शारीरिक जांच करते हैं। जरूरत के अनुसार रक्त या अन्य जांच, एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन, एमआरआई, एंडोस्कोपी या दूसरी जांचें कराई जा सकती हैं। कैंसर की पुष्टि के लिए कई मामलों में संदिग्ध ऊतक का छोटा नमूना लेकर उसकी जांच की जाती है, जिसे बायोप्सी कहते हैं। पैथोलॉजी रिपोर्ट से कैंसर का प्रकार समझने और उपचार तय करने में मदद मिलती है।
कई बार कैंसर के ऊतक पर बायोमार्कर या अन्य विशेष जांचें भी की जाती हैं। इनसे यह पता चल सकता है कि किसी मरीज के लिए कौन-सा लक्षित उपचार उपयुक्त हो सकता है। केवल रक्त में किसी ट्यूमर मार्कर का स्तर बढ़ा होना कैंसर की पुष्टि नहीं करता; डॉक्टर उसे अन्य जांचों के साथ देखते हैं।
कैंसर की स्टेज क्या होती है?
कैंसर की स्टेज बताती है कि बीमारी कितनी फैली है। स्टेज तय करने में ट्यूमर का आकार, आसपास के लिम्फ नोड्स की स्थिति और शरीर के दूर के अंगों तक फैलाव देखा जाता है। कई कैंसरों में इसके लिए टीएनएम प्रणाली इस्तेमाल होती है—टी मूल ट्यूमर, एन पास के लिम्फ नोड्स और एम दूर तक फैलाव को दर्शाता है। अलग-अलग कैंसर के लिए स्टेज तय करने की विधि अलग हो सकती है; कुछ रक्त कैंसरों में सामान्य स्टेजिंग प्रणाली लागू नहीं होती।
सामान्य तौर पर स्टेज का अर्थ इस प्रकार समझा जाता है:
- स्टेज 0: असामान्य कोशिकाएं मौजूद होती हैं, लेकिन आसपास के ऊतकों में फैलाव नहीं हुआ होता।
- स्टेज 1: कैंसर आमतौर पर उसी जगह तक सीमित और अपेक्षाकृत छोटा होता है, जहां से वह शुरू हुआ।
- स्टेज 2: ट्यूमर बड़ा हो सकता है या आसपास के ऊतकों तक फैल सकता है।
- स्टेज 3: कैंसर आसपास के ऊतकों या क्षेत्रीय लिम्फ नोड्स तक अधिक फैल चुका हो सकता है।
- स्टेज 4: कैंसर शरीर के दूर स्थित अंगों तक फैल चुका होता है।
यह सामान्य जानकारी है, हर कैंसर पर एक जैसी लागू नहीं होती। स्टेज 4 का अर्थ भी यह नहीं कि उपचार संभव नहीं है। कुछ मामलों में उपचार का लक्ष्य कैंसर को नियंत्रित करना, जीवन बढ़ाना और लक्षणों में राहत देना होता है। बीमारी की वास्तविक स्थिति और संभावनाएं मरीज के कैंसर के प्रकार, जांच रिपोर्ट और स्वास्थ्य पर निर्भर करती हैं।
कैंसर के उपचार में कौन-सी दवाएं और तरीके इस्तेमाल होते हैं?
कैंसर का उपचार उसके प्रकार, स्टेज, बायोमार्कर, मरीज की उम्र और सामान्य स्वास्थ्य के आधार पर तय होता है। कई मरीजों को एक से अधिक उपचार पद्धतियों का संयोजन दिया जाता है। उपचार योजना कैंसर विशेषज्ञों की टीम तैयार कर सकती है।
कीमोथेरेपी: इसमें कैंसर कोशिकाओं को मारने या उनकी वृद्धि रोकने वाली दवाएं दी जाती हैं। इसे अकेले या सर्जरी और रेडिएशन के साथ दिया जा सकता है। कीमोथेरेपी के दौरान स्वस्थ तेजी से बढ़ने वाली कोशिकाएं भी प्रभावित हो सकती हैं, जिससे मतली, मुंह में छाले, बाल झड़ना या थकान जैसे दुष्प्रभाव हो सकते हैं। दवा, मात्रा और समय-सारणी कैंसर के अनुसार अलग होती है।
हार्मोन थेरेपी: कुछ स्तन और प्रोस्टेट कैंसर हार्मोन के प्रभाव से बढ़ते हैं। ऐसे मामलों में हार्मोन के असर को रोकने या कम करने वाली दवाएं दी जा सकती हैं।
टार्गेटेड थेरेपी: यह दवाएं कैंसर कोशिकाओं की उन खास विशेषताओं या बदलावों पर निशाना साधती हैं जो उनके बढ़ने में मदद करते हैं। यह उपचार तभी उपयुक्त होता है जब जांच में संबंधित लक्ष्य मौजूद मिले।
इम्यूनोथेरेपी: इसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को कैंसर से लड़ने में मदद देने वाली दवाएं शामिल होती हैं। यह हर कैंसर या हर मरीज के लिए प्रभावी नहीं होती; इसका उपयोग चिकित्सकीय जांच और सलाह के बाद किया जाता है।
सर्जरी और रेडिएशन: सर्जरी में ट्यूमर को निकालने की कोशिश की जाती है। रेडिएशन थेरेपी में उच्च ऊर्जा वाली किरणों से कैंसर कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाया जाता है। कई बार उपचार के हिस्से के रूप में इनका दवाओं के साथ संयोजन किया जाता है। जरूरत के अनुसार दर्द, मतली या अन्य दुष्प्रभावों को नियंत्रित करने वाली सहायक दवाएं भी दी जा सकती हैं।
दवाएं स्वयं न लें: कैंसर की दवाएं शक्तिशाली होती हैं और इनके गलत इस्तेमाल से गंभीर नुकसान हो सकता है। किसी परिचित की दवा, ऑनलाइन सलाह या अप्रमाणित उपचार के आधार पर दवा शुरू या बंद न करें। इलाज में बदलाव केवल कैंसर विशेषज्ञ की सलाह से करें।
कैंसर से बचाव और जोखिम घटाने के उपाय
- तंबाकू, बीड़ी, सिगरेट, गुटखा और तंबाकू वाले अन्य उत्पादों से पूरी तरह दूरी रखें।
- शराब का सेवन न करें या इससे बचने के लिए चिकित्सकीय सलाह लें।
- संतुलित भोजन करें, फल-सब्जियां शामिल करें और नियमित शारीरिक गतिविधि बनाए रखें।
- वजन को स्वस्थ सीमा में रखने की कोशिश करें।
- तेज धूप में त्वचा की सुरक्षा करें और अनावश्यक पराबैंगनी किरणों से बचें।
- डॉक्टर की सलाह के अनुसार एचपीवी और हेपेटाइटिस-बी टीकाकरण के बारे में जानकारी लें।
- कार्यस्थल पर रसायनों, धूल या अन्य हानिकारक पदार्थों के संपर्क से बचने के लिए सुरक्षा नियमों का पालन करें।
स्क्रीनिंग कब कराएं?
स्क्रीनिंग में उन लोगों की जांच की जाती है जिनमें लक्षण नहीं हैं, ताकि कुछ कैंसर या कैंसर-पूर्व बदलावों का पता जल्दी लगाया जा सके। स्क्रीनिंग हर कैंसर के लिए उपयोगी या जरूरी नहीं होती; इसकी सलाह उम्र, व्यक्तिगत जोखिम और उपलब्ध जांच के आधार पर दी जानी चाहिए। लक्षण होने पर स्क्रीनिंग का इंतजार नहीं करना चाहिए—डॉक्टर से जांच करानी चाहिए।
भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम में 30 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों के लिए मुंह, स्तन और गर्भाशय-ग्रीवा के कैंसर की स्क्रीनिंग पर ध्यान दिया जाता है। उपलब्ध सरकारी दिशानिर्देशों में इन कैंसरों के लिए जांच के तरीके बताए गए हैं; कौन-सी जांच कब करानी है, यह स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र या चिकित्सक से पूछें। असामान्य नतीजे का अर्थ अपने आप कैंसर नहीं होता, लेकिन आगे की जांच जरूरी हो सकती है।
मरीज और परिवार क्या करें?
कैंसर का संदेह होने पर पंजीकृत चिकित्सक या कैंसर विशेषज्ञ से संपर्क करें और जांच रिपोर्ट संभालकर रखें। बायोप्सी तथा स्कैन रिपोर्ट को समझे बिना उपचार के बारे में फैसला न लें। जरूरत पड़ने पर दूसरी विशेषज्ञ राय लेना भी मरीज का अधिकार है। इलाज के दौरान पौष्टिक भोजन, भावनात्मक सहयोग और नियमित फॉलो-अप उपयोगी होते हैं। दर्द या अन्य तकलीफों को छिपाने के बजाय उपचार टीम को बताएं; लक्षणों में राहत और जीवन की गुणवत्ता सुधारने वाली पैलिएटिव केयर उपचार के साथ भी दी जा सकती है।
जनजागरूकता का संदेश: कैंसर का हर लक्षण कैंसर नहीं होता, लेकिन लगातार बने रहने वाले बदलावों की जांच टालना भी ठीक नहीं। समय पर चिकित्सकीय सलाह, सही जांच और विशेषज्ञ द्वारा तय उपचार से कई कैंसरों में बेहतर परिणाम की संभावना बढ़ सकती है। यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है; जांच और इलाज का निर्णय डॉक्टर की सलाह से ही करें।