आंखों की सेहत: आम रोग, लक्षण, बचाव और उपचार की पूरी जानकारी
मोतियाबिंद से लेकर ग्लूकोमा और डायबिटिक रेटिनोपैथी तक—बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों में आंखों की समस्याओं के कारण, आधुनिक चिकित्सा, आयुर्वेदिक दावों की सीमा, सरकारी सुविधाएं और नेत्रदान की प्रक्रिया
विशेष स्वास्थ्य लेख । #ANN आंखों की रोशनी जीवन के हर चरण में सीखने, काम करने और स्वतंत्र रहने के लिए जरूरी है। धुंधला दिखना, आंखों में दर्द या लालिमा जैसी परेशानी को मामूली समझकर टालना ठीक नहीं, क्योंकि कुछ रोग धीरे-धीरे बिना स्पष्ट लक्षणों के बढ़ते हैं और नजर को स्थायी नुकसान पहुंचा सकते हैं। मोतियाबिंद और चश्मे के नंबर जैसी समस्याओं का उपचार उपलब्ध है, जबकि ग्लूकोमा और डायबिटिक रेटिनोपैथी में समय पर जांच और नियमित इलाज दृष्टि को बचाने में अहम भूमिका निभाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दृष्टि-दोष के प्रमुख कारणों में बिना सुधारे गए चश्मे का नंबर, मोतियाबिंद, डायबिटिक रेटिनोपैथी, ग्लूकोमा और उम्र से जुड़ी मैक्युलर डिजनरेशन शामिल हैं।
यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। आंखों की जांच और उपचार नेत्र रोग विशेषज्ञ यानी ऑप्थैल्मोलॉजिस्ट से ही कराएं। आंखों में अचानक दृष्टि कम होना, तेज दर्द, चोट, रासायनिक पदार्थ पड़ना, रोशनी की चमक या पर्दा-सा दिखना आपात स्थिति हो सकती है।
आंखों के प्रमुख रोग और उनके लक्षण
- मोतियाबिंद
मोतियाबिंद में आंख के प्राकृतिक लेंस पर धुंधलापन आ जाता है। यह आमतौर पर उम्र बढ़ने के साथ होता है, लेकिन मधुमेह, आंख की चोट, कुछ दवाओं—खासकर लंबे समय तक स्टेरॉयड के उपयोग—या जन्मजात कारणों से भी हो सकता है। इसके लक्षणों में धीरे-धीरे धुंधला दिखना, रंग फीके लगना, रात में देखने में कठिनाई, तेज रोशनी या वाहन की हेडलाइट से परेशानी, रोशनी के चारों ओर घेरे दिखना और चश्मे का नंबर बार-बार बदलना शामिल हैं।
चश्मा बदलने या रोशनी बढ़ाने से शुरुआती अवस्था में कुछ सुविधा मिल सकती है, लेकिन मोतियाबिंद को हटाने का प्रभावी उपचार ऑपरेशन है। ऑपरेशन में धुंधले प्राकृतिक लेंस को निकालकर कृत्रिम लेंस लगाया जाता है। ऑपरेशन कब कराना है, यह इस पर निर्भर करता है कि नजर की कमी रोजमर्रा के कामों को कितना प्रभावित कर रही है और आंख की पूरी जांच में क्या पाया गया है। खुद से तय कर लेना कि मोतियाबिंद “पकने” तक इंतजार करना है, उचित नहीं; समय और ऑपरेशन की जरूरत नेत्र रोग विशेषज्ञ से तय करें।

- ग्लूकोमा या काला मोतिया
ग्लूकोमा आंख की ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुंचाने वाले रोगों का समूह है। इसके कई प्रकार होते हैं। आम किस्मों में नुकसान धीरे-धीरे बढ़ सकता है और शुरुआत में व्यक्ति को कोई साफ लक्षण महसूस नहीं होते। बाद में देखने का दायरा किनारों से कम हो सकता है। आंख का दबाव जांचना उपयोगी है, लेकिन केवल दबाव का एक माप ग्लूकोमा को पूरी तरह साबित या खारिज नहीं करता; विशेषज्ञ आंख की नस, दृष्टि क्षेत्र और अन्य जांचों को साथ में देखते हैं।
अचानक होने वाले एंगल-क्लोजर ग्लूकोमा में तेज आंख-दर्द, सिरदर्द, धुंधली नजर, रोशनी के चारों ओर घेरे, मतली या उल्टी हो सकती है। यह आपात स्थिति है। ग्लूकोमा से पहले हो चुका नुकसान सामान्यतः वापस नहीं आता, लेकिन निर्धारित आई-ड्रॉप, लेजर या ऑपरेशन से आगे का नुकसान रोकने या कम करने की कोशिश की जाती है। दवा बंद करना या बूंदों की मात्रा बदलना डॉक्टर से पूछे बिना न करें।
- डायबिटिक रेटिनोपैथी
लंबे समय तक रक्त में शुगर बढ़ी रहने से रेटिना की छोटी रक्त-नलिकाओं को नुकसान हो सकता है। इसे डायबिटिक रेटिनोपैथी कहते हैं। शुरुआती चरण में लक्षण न भी हों; बाद में धुंधलापन, तैरते धब्बे, नजर में उतार-चढ़ाव, काला पर्दा या अचानक दृष्टि कम होना हो सकता है। मधुमेह से मैक्युला में सूजन, मोतियाबिंद और ग्लूकोमा का जोखिम भी बढ़ सकता है।
मधुमेह वाले लोगों को नियमित रूप से आंख के पर्दे की जांच करानी चाहिए—आमतौर पर कम-से-कम सालाना, या डॉक्टर की बताई अवधि में। उपचार में शुगर, रक्तचाप और अन्य जोखिमों को नियंत्रित करना, आंख में इंजेक्शन, लेजर या सर्जरी शामिल हो सकती है। किसकी जरूरत है, यह रेटिना विशेषज्ञ जांच के बाद तय करता है। शुगर नियंत्रण उपचार का विकल्प नहीं, बल्कि आंखों के जोखिम को घटाने का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
- उम्र से जुड़ी मैक्युलर डिजनरेशन
मैक्युला रेटिना का वह हिस्सा है जो सामने की बारीक चीजें—जैसे पढ़ना और चेहरा पहचानना—देखने में मदद करता है। उम्र के साथ इसमें बदलाव से सीधा देखने में धुंधलापन, अक्षरों का टेढ़ा दिखना या चेहरे पहचानने में कठिनाई हो सकती है। कुछ प्रकार धीरे बढ़ते हैं, जबकि कुछ में तेजी से दृष्टि प्रभावित हो सकती है। जांच के बाद विशेषज्ञ निगरानी, विशेष पोषण-सप्लीमेंट, इंजेक्शन या अन्य उपचार पर विचार कर सकता है। बिना जांच सप्लीमेंट लेना उपचार नहीं है।
- चश्मे का नंबर: निकट-दृष्टि, दूर-दृष्टि और उम्र के साथ पढ़ने की समस्या
निकट-दृष्टि में दूर की चीजें, दूर-दृष्टि में पास की चीजें और प्रेस्बायोपिया में उम्र बढ़ने के साथ पास का काम कठिन हो सकता है। सिरदर्द, आंखों में थकान, किताब या मोबाइल को बहुत पास अथवा दूर रखना संकेत हो सकते हैं। बच्चों में नंबर का समय पर पता न चलने पर पढ़ाई और आंखों के सामान्य विकास पर असर पड़ सकता है। उचित चश्मा, कॉन्टैक्ट लेंस या चुने हुए मामलों में लेजर उपचार विकल्प हो सकते हैं; चश्मे के नंबर की जांच प्रशिक्षित नेत्र विशेषज्ञ या ऑप्टोमेट्रिस्ट से कराएं।
- आंख आना या कंजंक्टिवाइटिस
कंजंक्टिवाइटिस में आंख की बाहरी झिल्ली लाल, खुजलीदार या पानीदार हो सकती है। कारण वायरस, बैक्टीरिया, एलर्जी या कोई उत्तेजक पदार्थ हो सकता है। हर लाल आंख में एंटीबायोटिक की जरूरत नहीं होती—वायरल संक्रमण में एंटीबायोटिक काम नहीं करता। तौलिया, रूमाल और आंखों के सौंदर्य-प्रसाधन साझा न करें, हाथ धोएं और आंख न मलें। दर्द, रोशनी से तकलीफ, धुंधली नजर, बहुत अधिक स्राव, कॉन्टैक्ट लेंस पहनने या लक्षण बिगड़ने पर डॉक्टर से जांच कराएं।

- ड्राई आई और एलर्जी
आंख में किरकिरापन, जलन, खुजली, लालिमा, थकान, पढ़ते समय या स्क्रीन देखते समय परेशानी और कभी-कभी उलटे अधिक पानी आना ड्राई आई में हो सकता है। उम्र, कुछ दवाएं, मधुमेह, थायरॉयड या ऑटोइम्यून रोग, धुआं, तेज हवा, वातानुकूलित वातावरण और लंबे समय तक स्क्रीन देखने से लक्षण बढ़ सकते हैं। उपचार में कारण के अनुसार चिकनाई देने वाली बूंदें, वातावरण में बदलाव और अन्य चिकित्सकीय उपाय शामिल हो सकते हैं। आंख की बूंद चुनने और लंबे समय तक उपयोग के लिए डॉक्टर की सलाह लें।
- कॉर्निया की चोट या संक्रमण
कॉर्निया आंख की सामने की पारदर्शी परत है। चोट, कॉन्टैक्ट लेंस की अस्वच्छता, संक्रमण या सूजन से दर्द, लालिमा, पानी आना, रोशनी से परेशानी और धुंधली नजर हो सकती है। कॉन्टैक्ट लेंस पहनने वाले व्यक्ति में दर्द और लालिमा को अनदेखा नहीं करना चाहिए। कॉर्निया पर निशान या गंभीर संक्रमण दृष्टि को प्रभावित कर सकता है; कुछ मामलों में दवा, लेजर या कॉर्निया प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ सकती है।
- रेटिना का अलग होना
अचानक बहुत से नए तैरते धब्बे दिखना, चमक दिखाई देना या नजर के किसी हिस्से में पर्दे/छाया का आना रेटिना के फटने या अलग होने का संकेत हो सकता है। यह दर्द के बिना भी हो सकता है। ऐसी स्थिति में उसी दिन नेत्र आपात सेवा तक पहुंचें; इंतजार करने से दृष्टि स्थायी रूप से प्रभावित हो सकती है। इलाज में लेजर, फ्रीजिंग प्रक्रिया या ऑपरेशन शामिल हो सकता है।
- भेंगापन और आलसी आंख
बच्चे की एक आंख का अंदर या बाहर मुड़ना, एक आंख से कम देखना, सिर तिरछा रखकर देखना या किताब/स्क्रीन बहुत पास लाना जांच कराने के कारण हैं। भेंगापन और आलसी आंख का इलाज बचपन में शुरू हो तो बेहतर परिणाम की संभावना रहती है। इलाज में चश्मा, पैच, दवा या सर्जरी हो सकती है। यह मानकर न चलें कि बच्चा बड़ा होगा तो आंख अपने-आप ठीक हो जाएगी।
- समयपूर्व जन्मे शिशुओं में रेटिनोपैथी (ROP)
समय से पहले जन्मे या कम वजन वाले शिशुओं में रेटिना की रक्त-नलिकाओं का विकास असामान्य हो सकता है। कुछ मामलों में यह गंभीर दृष्टि-हानि का कारण बनता है। ऐसे शिशुओं की जांच का समय नवजात विशेषज्ञ और आंखों के डॉक्टर तय करते हैं। बच्चा सामान्य दिख रहा हो तब भी निर्धारित ROP जांच न छोड़ें।
उम्र के अनुसार किन स्थितियों में आंखों को खतरा बढ़ता है?
शिशु और छोटे बच्चे: जन्मजात मोतियाबिंद, भेंगापन, संक्रमण, चोट और समयपूर्व जन्म से जुड़ी ROP महत्वपूर्ण कारण हैं। आंख में सफेद चमक दिखना, लगातार पानी आना, रोशनी से असामान्य परेशानी या आंख का सीधा न टिकना डॉक्टर को दिखाने की वजह है।
स्कूली उम्र के बच्चे और किशोर: बिना सुधारे चश्मे का नंबर, मायोपिया, आंखों को रगड़ना, स्क्रीन/किताब पर लगातार पास से काम और खेल के दौरान चोट जोखिम बढ़ा सकते हैं। स्कूल स्क्रीनिंग उपयोगी है, पर उसमें समस्या मिले तो पूरी आंख की जांच कराएं। बाहर समय बिताना और लगातार पास का काम बीच-बीच में रोकना बच्चों में मायोपिया की शुरुआत या बढ़त को धीमा करने में मदद कर सकता है।
युवा और कामकाजी वयस्क: लंबे समय तक स्क्रीन, धूल-धुआं, कॉन्टैक्ट लेंस की गलत सफाई, रसायन या औद्योगिक चोट, खेल की चोट और मधुमेह जैसे रोग आंखों को प्रभावित कर सकते हैं। स्क्रीन से जुड़ी थकान में नियमित विराम, पलकें झपकाना और रोशनी/बैठने की दूरी ठीक रखना मददगार है, लेकिन लगातार धुंधलेपन का समाधान केवल स्क्रीन ब्रेक नहीं—जांच है।
बुजुर्ग: मोतियाबिंद, ग्लूकोमा, मैक्युलर डिजनरेशन, डायबिटिक रेटिनोपैथी और ड्राई आई की आशंका बढ़ सकती है। कुछ दवाएं भी आंखों में सूखापन या अन्य बदलाव कर सकती हैं। दवा खुद बंद न करें; डॉक्टर को सभी दवाओं की सूची बताएं और नियमित आंख जांच कराएं।
प्रदूषण आंखों को कैसे प्रभावित करता है और जिम्मेदारी किसकी है?
धूल, धुआं, हवा में मौजूद सूक्ष्म कण, वाहन और उद्योगों का प्रदूषण, पराली या कचरा जलाना, निर्माण-स्थलों की धूल, घरेलू धुएं और तेज हवा से आंखों में जलन, पानी, खुजली और सूखापन बढ़ सकता है। वायु प्रदूषण और आंख की सतह की जलन/सूखापन के बीच संबंध पर शोध उपलब्ध है; प्रदूषण से आंखों में तकलीफ होना संभव है, लेकिन हर आंख रोग का कारण केवल प्रदूषण नहीं होता। मधुमेह, उम्र, संक्रमण, एलर्जी और आनुवंशिक कारण भी महत्वपूर्ण हैं।
प्रदूषण कम करने की जिम्मेदारी केवल व्यक्ति की नहीं है। सरकारी विभागों और स्थानीय निकायों की भूमिका में वायु गुणवत्ता की निगरानी, निर्माण-स्थलों पर धूल नियंत्रण, कचरा और पराली जलाने पर रोक का पालन, सार्वजनिक परिवहन और हरित क्षेत्र बढ़ाना शामिल है। उद्योगों और निर्माण कंपनियों को उत्सर्जन एवं धूल नियंत्रण मानकों का पालन करना चाहिए। नागरिक धुआं/कचरा न जलाएं, आंखों को गंदे हाथों से न छुएं, प्रदूषण बहुत अधिक होने पर बाहर रहने का समय घटाएं और जोखिम वाले काम में सुरक्षा चश्मा पहनें। प्रदूषण नियंत्रण शिकायत स्थानीय प्रशासन या प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के माध्यम से दर्ज कराई जा सकती है।
आंखों को सुरक्षित रखने के व्यावहारिक उपाय
- नियमित आंख जांच कराएं। मधुमेह, उच्च रक्तचाप, ग्लूकोमा का पारिवारिक इतिहास, पहले से आंख का रोग या स्टेरॉयड दवा लेने पर डॉक्टर से जांच की उचित अवधि पूछें।
- बच्चों की नजर और आंखों के सीधेपन पर ध्यान दें। पढ़ाई में कठिनाई, टीवी के पास बैठना या सिर तिरछा करके देखना हो तो जांच कराएं।
- आंखों को साफ पानी से धोना ठीक है, लेकिन गुलाबजल, शहद, नींबू, घी, त्रिफला का घरेलू घोल या बिना सलाह की दवा आंख में न डालें।
- धूल, धातु काटने, ड्रिलिंग, वेल्डिंग, रसायन, खेल या पटाखों के दौरान उपयुक्त सुरक्षा चश्मा पहनें। तेज रोशनी/यूवी के संपर्क में प्रमाणित यूवी सुरक्षा वाले धूप के चश्मे का उपयोग करें।
- कॉन्टैक्ट लेंस साफ हाथों से लगाएं और निर्धारित तरीके से साफ-संग्रह करें। लेंस पहनकर सोना, तैरना या नहाना संक्रमण का जोखिम बढ़ा सकता है, जब तक डॉक्टर ने विशेष रूप से अनुमति न दी हो।
- आंखों की बूंद का नाम, उद्देश्य और अवधि जानें। किसी अन्य व्यक्ति की बूंदें न लें और विशेषकर स्टेरॉयड आई-ड्रॉप बिना नेत्र विशेषज्ञ की सलाह के न डालें।
- मोबाइल या कंप्यूटर पर लगातार काम में नियमित छोटे विराम लें, स्क्रीन को आरामदायक दूरी पर रखें और पलकें झपकाते रहें। लंबे समय तक स्क्रीन से होने वाली थकान को नजर के नंबर या बीमारी की जांच का विकल्प न मानें।
- धूम्रपान से बचें और मधुमेह तथा रक्तचाप को नियंत्रित रखें। इससे आंखों सहित शरीर के कई अंगों के जोखिम को कम करने में मदद मिलती है।
रसायन आंख में पड़ जाए तो: आंख को तुरंत साफ बहते पानी से लगातार धोना शुरू करें और चिकित्सा सहायता लें। धोने में देर न करें। आंख में फंसी वस्तु को खुद निकालने की कोशिश न करें, आंख पर दबाव न डालें और तेज चोट, दृष्टि में बदलाव या तेज दर्द में तुरंत अस्पताल जाएं।

एलोपैथिक उपचार और आयुर्वेदिक दावों को कैसे समझें?
आधुनिक नेत्र चिकित्सा में उपचार रोग के कारण और जांच के नतीजे के अनुसार होता है। इसमें चश्मा, दवा या आई-ड्रॉप, संक्रमण के लिए कारण-आधारित दवा, लेजर, आंख में इंजेक्शन, मोतियाबिंद ऑपरेशन, रेटिना सर्जरी और कॉर्निया प्रत्यारोपण शामिल हो सकते हैं। हर व्यक्ति को हर उपचार की जरूरत नहीं होती। डॉक्टर की लिखी बूंदें बीच में बंद करना, खुद से एंटीबायोटिक या स्टेरॉयड लेना अथवा किसी गैर-विशेषज्ञ से आंख में प्रक्रिया कराना नुकसानदेह हो सकता है।
आयुर्वेद में आंखों की देखभाल के लिए कुछ प्रक्रियाओं और औषधियों के दावे किए जाते हैं। लेकिन मोतियाबिंद को घोलने, ग्लूकोमा से क्षतिग्रस्त नस को फिर से ठीक करने, डायबिटिक रेटिनोपैथी रोकने या रेटिना को वापस जोड़ने के लिए इन विधियों को मानक उपचार का विकल्प मानने का पर्याप्त प्रमाण नहीं है। मोतियाबिंद को हटाने का प्रभावी इलाज ऑपरेशन है और ग्लूकोमा में दबाव घटाने वाली निर्धारित दवा, लेजर या सर्जरी से आगे का नुकसान रोकने की कोशिश की जाती है। कुछ सप्लीमेंट विशेष परिस्थितियों में डॉक्टर सुझा सकता है, लेकिन उन्हें अपने-आप शुरू करना उचित नहीं। हर्बल या घरेलू पदार्थ आंख में डालने से संक्रमण, एलर्जी, जलन या चोट हो सकती है; आंख की सतह संवेदनशील होती है।
यदि कोई आयुर्वेदिक या अन्य पूरक उपचार लेना चाहते हैं, तो पहले नेत्र रोग विशेषज्ञ को बताएं, खासकर यदि ऑपरेशन, इंजेक्शन या नियमित आई-ड्रॉप चल रहे हों। उससे प्रमाणित इलाज में देरी न करें और किसी भी बूंद की स्वच्छता, घटक और सुरक्षा की पुष्टि करें। मोतियाबिंद, ग्लूकोमा और कुछ रेटिना रोगों में देरी से होने वाला नुकसान वापस पाना कठिन हो सकता है। उपलब्ध समीक्षा में भी जड़ी-बूटियों और सप्लीमेंट्स को ग्लूकोमा, डायबिटिक रेटिनोपैथी और मोतियाबिंद का उपचार मानने के लिए पर्याप्त समर्थन नहीं मिला।
भारत में सरकारी अस्पतालों में आंखों का इलाज
भारत सरकार का राष्ट्रीय अंधता एवं दृष्टि-दोष नियंत्रण कार्यक्रम (NPCBVI) मोतियाबिंद, चश्मे के दोष, ग्लूकोमा, डायबिटिक रेटिनोपैथी, बचपन के अंधत्व और कॉर्निया संबंधी रोगों सहित आंखों की सेवाओं पर काम करता है। कार्यक्रम सरकारी मेडिकल कॉलेजों और जिला अस्पतालों में नेत्र सेवाओं को मजबूत करने का लक्ष्य रखता है। उपलब्ध सुविधा, डॉक्टर, जांच और सर्जरी की तारीख जिले तथा अस्पताल के अनुसार अलग हो सकती है।
शुरुआत नजदीकी आयुष्मान आरोग्य मंदिर/प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र या जिला अस्पताल से की जा सकती है। वहां उपलब्ध नेत्र जांच के बाद जरूरत होने पर मेडिकल कॉलेज या बड़े नेत्र केंद्र में रेफर किया जा सकता है। पात्रता और अस्पताल की नीति के अनुसार कुछ सेवाएं निःशुल्क या रियायती हो सकती हैं; पंजीकरण के समय यह जानकारी लें।
विशेषज्ञ सेवाओं के लिए देश में कुछ प्रमुख सरकारी संस्थान हैं:
- डॉ. राजेंद्र प्रसाद सेंटर फॉर ऑप्थैल्मिक साइंसेज, एम्स, नई दिल्ली—राष्ट्रीय स्तर का नेत्र संस्थान; यहां चौबीसों घंटे आई-कैजुअल्टी सेवा उपलब्ध बताई गई है।
- PGIMER का एडवांस्ड आई सेंटर, चंडीगढ़—ऑप्थैल्मोलॉजी विभाग और आपात ऑपरेशन थिएटर सहित सेवाएं।
- AIIMS ऋषिकेश—नेत्र रोग विभाग तथा आई बैंक की सुविधा संस्थान की निर्देशिका में सूचीबद्ध है।
- किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी, लखनऊ—नेत्र रोग विभाग और ओपीडी सेवाएं।
- गुरु नानक आई सेंटर, दिल्ली—मोतियाबिंद ऑपरेशन सहित नेत्र जांच और उपचार; केंद्र ने सरकारी कार्यक्रम के अंतर्गत सेवाओं का उल्लेख किया है।
- JIPMER, पुडुचेरी—ऑप्थैल्मोलॉजी सेवाओं में चौबीसों घंटे आपात नेत्र देखभाल और विशेष क्लिनिक शामिल हैं।
विशेषज्ञ नेत्र देखभाल के लिए अरविंद आई केयर, एल.वी. प्रसाद आई इंस्टीट्यूट और शंकरा नेत्रालय जैसे केंद्र भी कॉर्निया, रेटिना, ग्लूकोमा, बाल नेत्र चिकित्सा और अन्य विशेषताओं की सेवाएं देते हैं। इलाज की उपलब्धता, शुल्क, पात्रता और प्रतीक्षा अवधि की जानकारी सीधे अस्पताल से लें; किसी अस्पताल में हर रोग का हर उपचार हर समय उपलब्ध हो, यह मानकर यात्रा न करें।
नेत्रदान और कॉर्निया प्रत्यारोपण: क्या ट्रांसप्लांट होता है?
आम बोलचाल में इसे “आंखों का दान” या “आंखों का प्रत्यारोपण” कहा जाता है, लेकिन चिकित्सकीय रूप से मृत दाता की पूरी आंख किसी दूसरे व्यक्ति में लगाकर दृष्टि बहाल नहीं की जाती। नेत्रदान से आमतौर पर कॉर्निया—आंख की आगे की पारदर्शी परत—दान और प्रत्यारोपण के लिए प्राप्त किया जाता है। कॉर्निया पर सफेद दाग, चोट, संक्रमण या बीमारी से दृष्टि प्रभावित होने पर उपयुक्त मरीज में कॉर्निया प्रत्यारोपण किया जा सकता है। इसका सफल होना रोग की वजह, आंख के बाकी हिस्सों की स्थिति और प्रत्यारोपित ऊतक पर निर्भर करता है; हर मरीज में दृष्टि पूरी तरह लौटना निश्चित नहीं है।
मृत्यु के बाद परिवार को जितनी जल्दी हो सके, आदर्शतः 6–8 घंटे के भीतर निकटतम आई बैंक या नेत्रदान केंद्र को फोन करना चाहिए। टीम उपलब्धता और उपयुक्तता की जांच कर प्रक्रिया बताएगी। समय की सीमा परिस्थितियों से प्रभावित हो सकती है, इसलिए “कुछ घंटे बाकी हैं” सोचकर संपर्क टालें नहीं। निकट संबंधी की सहमति आवश्यक होती है और आई बैंक दान की उपयुक्तता जांचता है।
परिवार आई बैंक से संपर्क करने तक मृतक की आंखें धीरे से बंद रख सकता है, आंखों पर साफ नम कपड़ा रख सकता है, पंखा सीधे चेहरे पर न चलाए और सिर थोड़ा ऊंचा रखे। ये अस्थायी उपाय हैं; सबसे जरूरी है तुरंत आई बैंक को सूचित करना और उनके निर्देश मानना। दाता की आंखों/कॉर्निया की उपयुक्तता और संक्रमण-संबंधी जांच के बाद ही प्रत्यारोपण का निर्णय होता है। नेत्रदान की प्रतिज्ञा करना उपयोगी है, लेकिन मृत्यु के बाद परिवार को आई बैंक से संपर्क करना फिर भी जरूरी है।
किन लक्षणों में तुरंत अस्पताल जाएं?
अचानक एक या दोनों आंखों से नजर कम होना, नए चमकते धब्बे और पर्दा-सा दिखना, तेज दर्द के साथ लाल आंख, आंख में रसायन पड़ना, चोट या फंसी वस्तु, रोशनी से गंभीर परेशानी, पुतली का असामान्य दिखना, अथवा आंख के संक्रमण के साथ दृष्टि धुंधली होना—इनमें तुरंत नेत्र आपात सेवा लें। खुद से बूंद डालकर या घरेलू उपचार करके समय न गंवाएं।
याद रखें: आंखों के कई रोग शुरुआती अवस्था में बिना दर्द या साफ लक्षणों के बढ़ते हैं। नियमित जांच, मधुमेह और रक्तचाप पर नियंत्रण, सुरक्षा चश्मे का उपयोग और डॉक्टर द्वारा सुझाए उपचार का पालन दृष्टि को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के सबसे उपयोगी कदम हैं।