ब्रेन स्ट्रोक और ब्रेन हेमरेज: लक्षण, तुरंत इलाज और बचाव की संपूर्ण जानकारी
समय पर पहचान और अस्पताल पहुँचने से बच सकती है जान; ब्रेन हेमरेज और खून के थक्के वाले स्ट्रोक का इलाज अलग-अलग होता है
भारत | #ANN
ब्रेन स्ट्रोक अचानक होने वाली ऐसी गंभीर स्थिति है जिसमें मस्तिष्क के किसी हिस्से तक रक्त और ऑक्सीजन पहुँचना रुक जाता है या मस्तिष्क की कोई रक्तवाहिका फट जाती है। इससे मस्तिष्क की कोशिकाएँ तेजी से क्षतिग्रस्त होने लगती हैं। मरीज को चेहरे, हाथ-पैर, बोलने, देखने, संतुलन या चेतना से जुड़ी परेशानी हो सकती है। स्ट्रोक में हर मिनट अहम होता है—इसलिए लक्षण दिखने पर घरेलू उपचार आजमाने या अपने-आप ठीक होने का इंतजार करने के बजाय तत्काल अस्पताल की आपातकालीन सेवा लेनी चाहिए।
ब्रेन स्ट्रोक को अक्सर “ब्रेन अटैक” भी कहा जाता है। यह केवल बुजुर्गों की बीमारी नहीं है। बच्चों, युवाओं, महिलाओं और पुरुषों—किसी को भी स्ट्रोक हो सकता है। उम्र बढ़ने के साथ इसका खतरा बढ़ता है, लेकिन उच्च रक्तचाप, मधुमेह, धूम्रपान, हृदय रोग और अन्य जोखिम कम उम्र में भी स्ट्रोक का कारण बन सकते हैं।
यदि किसी व्यक्ति को अचानक चेहरा टेढ़ा होने, एक हाथ या पैर में कमजोरी, बोलने में परेशानी, संतुलन बिगड़ने या तेज असामान्य सिरदर्द की शिकायत हो, तो तुरंत एम्बुलेंस या नजदीकी स्ट्रोक-सुविधा वाले अस्पताल से संपर्क करें।
ब्रेन स्ट्रोक क्या है और ब्रेन हेमरेज से इसका क्या संबंध है?
“स्ट्रोक” मस्तिष्क की रक्तवाहिकाओं से जुड़ी अचानक हुई समस्या का व्यापक नाम है। इसके मुख्य प्रकार हैं:
- इस्केमिक स्ट्रोक: मस्तिष्क की किसी रक्तवाहिका में थक्का या अवरोध बन जाता है और संबंधित हिस्से तक रक्त की आपूर्ति कम या बंद हो जाती है। यह स्ट्रोक का सबसे आम प्रकार है।
- हेमरेजिक स्ट्रोक या ब्रेन हेमरेज: मस्तिष्क की रक्तवाहिका फटने से रक्त मस्तिष्क के भीतर या उसके आसपास जमा होने लगता है। रक्त का दबाव आसपास की कोशिकाओं को नुकसान पहुँचा सकता है।
ब्रेन हेमरेज स्ट्रोक का एक प्रकार है, लेकिन हर स्ट्रोक में रक्तस्राव नहीं होता। थक्का और रक्तस्राव वाले स्ट्रोक का इलाज अलग है। इसीलिए केवल लक्षण देखकर घर पर यह तय नहीं किया जा सकता कि मरीज को कौन-सा स्ट्रोक हुआ है। अस्पताल में सामान्यतः तत्काल मस्तिष्क की इमेजिंग—अक्सर सीटी स्कैन—कराकर इसका पता लगाया जाता है।
कभी-कभी स्ट्रोक जैसे लक्षण थोड़ी देर में ठीक हो जाते हैं। इसे ट्रांजिएंट इस्केमिक अटैक (TIA) कहा जा सकता है। लक्षण मिट जाने के बाद भी इसे मामूली समस्या मानना ठीक नहीं, क्योंकि यह आगे होने वाले बड़े स्ट्रोक की चेतावनी हो सकता है। ऐसे में भी तत्काल चिकित्सकीय जाँच जरूरी है।
स्ट्रोक के लक्षण: चेहरा, हाथ, बोली और समय पर ध्यान दें

स्ट्रोक के लक्षण अक्सर अचानक शुरू होते हैं। याद रखने का सरल तरीका है BE-FAST:
- B — Balance: अचानक संतुलन बिगड़ना, लड़खड़ाना या चलने में कठिनाई।
- E — Eyes: एक या दोनों आँखों से अचानक धुंधला दिखना, दोहरा दिखना या दृष्टि कम होना।
- F — Face: मुस्कराने पर चेहरे का एक हिस्सा नीचे लटकना या चेहरा टेढ़ा दिखना।
- A — Arm: एक हाथ या पैर में अचानक कमजोरी, सुन्नपन या उसे उठाने में कठिनाई।
- S — Speech: बोली लड़खड़ाना, बात समझने में परेशानी या सही शब्द न बोल पाना।
- T — Time: समय बर्बाद न करें—तुरंत आपातकालीन चिकित्सा सहायता लें।
हेमरेजिक स्ट्रोक में कुछ मरीजों को अचानक बहुत तेज सिरदर्द, उल्टी, गर्दन में अकड़न, दौरा, बेहोशी, अत्यधिक उनींदापन या चेतना में गिरावट भी हो सकती है। पर सिरदर्द न होना स्ट्रोक को खारिज नहीं करता; और तेज सिरदर्द होने का अर्थ हमेशा ब्रेन हेमरेज भी नहीं होता। निदान डॉक्टर और जाँच से ही होता है।
अस्पताल पहुँचने तक क्या करें?
- लक्षण शुरू होने का समय लिख लें। यदि शुरुआत का सही समय पता न हो, तो मरीज को आखिरी बार सामान्य कब देखा गया था, यह समय नोट करें।
- मरीज की दवाओं की सूची और मेडिकल रिकॉर्ड साथ लें—खासकर खून पतला करने वाली दवाओं की जानकारी।
- बेहोशी या उल्टी होने पर मरीज को सुरक्षित करवट पर रखें और साँस पर नजर रखें।
- मरीज को खाना, पानी या गोली मुँह से न दें। निगलने की क्षमता प्रभावित हो सकती है और चीज फेफड़ों में जा सकती है।
- एस्पिरिन, दर्द की दवा, घरेलू काढ़ा या रक्तचाप की अतिरिक्त गोली अपने-आप न दें। स्ट्रोक रक्तस्राव का है या थक्के का, यह जाँच के बाद ही तय होता है।
- तेल की मालिश, झाड़-फूँक, आयुर्वेदिक या होम्योपैथिक दवा आजमाने के लिए अस्पताल पहुँचने में देरी न करें।
ब्रेन हेमरेज क्यों होता है?
स्वतः होने वाले मस्तिष्कीय रक्तस्राव का एक प्रमुख जोखिम लंबे समय तक अनियंत्रित उच्च रक्तचाप है। रक्तवाहिकाओं की दीवारें कमजोर पड़ने पर उनके फटने की आशंका बढ़ सकती है। उम्र के साथ रक्तवाहिकाओं में बदलाव भी जोखिम बढ़ा सकते हैं। अन्य कारणों में मस्तिष्क की धमनी में उभार (एन्यूरिज्म), रक्तवाहिकाओं का असामान्य गुच्छा (AVM), रक्त जमने की समस्या, खून पतला करने वाली दवाएँ, सिर की चोट और कुछ नशीले उत्तेजक पदार्थ शामिल हो सकते हैं। वृद्ध लोगों में मस्तिष्क की छोटी रक्तवाहिकाओं में उम्र-संबंधी बदलाव भी भूमिका निभा सकते हैं।
धूम्रपान, अत्यधिक शराब सेवन, कोकीन या एम्फेटामीन जैसे उत्तेजक नशीले पदार्थ, उच्च रक्तचाप और कुछ हृदय या रक्त-संबंधी बीमारियाँ स्ट्रोक के खतरे को बढ़ा सकती हैं। खून पतला करने वाली दवा लेने वाले व्यक्ति को दवा बंद या बदलने का निर्णय खुद नहीं करना चाहिए; यह काम डॉक्टर की सलाह से ही होना चाहिए।
थक्का बनने वाला स्ट्रोक किन कारणों से हो सकता है?
इस्केमिक स्ट्रोक में रक्त का थक्का मस्तिष्क की किसी धमनी को बंद कर सकता है। थक्का मस्तिष्क की रक्तवाहिका में ही बन सकता है या शरीर के किसी दूसरे हिस्से—विशेषकर हृदय—से चलकर वहाँ पहुँच सकता है। अनियमित धड़कन, जैसे एट्रियल फिब्रिलेशन, हृदय के कुछ रोग, गर्दन की धमनियों में वसा जमना, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल इसके जोखिम हैं।
एक व्यक्ति में कई जोखिम एक साथ हो सकते हैं—मसलन उच्च रक्तचाप के साथ धूम्रपान और मधुमेह। जोखिम जितने अधिक और जितने लंबे समय तक अनियंत्रित रहेंगे, स्ट्रोक की आशंका उतनी बढ़ सकती है।
किस उम्र में और किन लोगों को स्ट्रोक हो सकता है?
स्ट्रोक किसी भी उम्र में हो सकता है, यहाँ तक कि नवजात शिशु और बच्चों में भी। फिर भी आयु बढ़ने के साथ इसका जोखिम सामान्यतः बढ़ता है। युवा वयस्कों में कुछ स्ट्रोक जन्मजात या अर्जित हृदय-समस्या, रक्त के थक्के बनने की प्रवृत्ति, रक्तवाहिका की असामान्यता, कुछ संक्रमण, नशीले पदार्थ या अन्य विशेष कारणों से हो सकते हैं।
बच्चों में स्ट्रोक के जोखिमों में जन्म के आसपास की जटिलताएँ, सिकल सेल रोग, जन्मजात हृदय रोग, रक्त जमने की समस्या, मस्तिष्क की रक्तवाहिका से जुड़ी बीमारी और कुछ संक्रमण शामिल हो सकते हैं। बच्चे में अचानक कमजोरी, शरीर के एक हिस्से का सुन्न होना, बोलने या देखने में बदलाव, तेज सिरदर्द, दौरा या चेतना में बदलाव को तत्काल बच्चों के अस्पताल या आपातकालीन विभाग में दिखाना चाहिए।
पुरुष और महिलाएँ—दोनों स्ट्रोक से प्रभावित होते हैं। विश्व स्ट्रोक संगठन के 2025 फैक्ट शीट में उद्धृत 2021 के आँकड़ों के अनुसार, नए स्ट्रोक के मामलों में पुरुषों का हिस्सा लगभग 53% और महिलाओं का लगभग 47% था। इसका अर्थ यह नहीं कि महिलाओं को स्ट्रोक का जोखिम नहीं है। गर्भावस्था और प्रसव के आसपास उच्च रक्तचाप या प्री-एक्लेम्पसिया जैसी स्थितियों में खास सतर्कता जरूरी है। महिलाओं में हार्मोन संबंधी जोखिमों पर व्यक्तिगत सलाह डॉक्टर से लेनी चाहिए।
अस्पताल में स्ट्रोक की जाँच कैसे होती है?
अस्पताल में डॉक्टर सबसे पहले मरीज की साँस, रक्तचाप, चेतना और न्यूरोलॉजिकल लक्षणों का आकलन करते हैं। साथ ही, लक्षण कब शुरू हुए और मरीज कौन-सी दवाएँ ले रहा है, यह जानकारी ली जाती है। मस्तिष्क में रक्तस्राव है या रक्तवाहिका में अवरोध—यह जानने के लिए तुरंत नॉन-कॉन्ट्रास्ट सीटी स्कैन आम जाँच है। जरूरत के अनुसार सीटी एंजियोग्राफी, एमआरआई, रक्त जाँच, हृदय की जाँच और अन्य स्कैन भी किए जा सकते हैं। रक्तस्राव वाले स्ट्रोक में सीटी या अन्य इमेजिंग रक्तस्राव के स्थान और आकार का आकलन करने में मदद करती है।
जाँचों का उद्देश्य केवल स्ट्रोक की पुष्टि करना नहीं होता। डॉक्टर यह भी देखते हैं कि स्ट्रोक किस वजह से हुआ, रक्तवाहिका में कोई एन्यूरिज्म या असामान्यता है या नहीं, मस्तिष्क में सूजन या दबाव कितना है और मरीज को कौन-सा उपचार सुरक्षित रूप से दिया जा सकता है।

ब्रेन हेमरेज का मेडिकल इलाज
ब्रेन हेमरेज होने पर इलाज रक्तस्राव के स्थान, आकार, कारण, मरीज की चेतना और अन्य बीमारियों को देखकर तय किया जाता है। उपचार में न्यूरो-आईसीयू या स्ट्रोक यूनिट में निगरानी, साँस और ऑक्सीजन का प्रबंधन, रक्तचाप का नियंत्रित उपचार, मस्तिष्क की सूजन और दबाव पर नजर तथा रक्त जमने की क्षमता से जुड़ी समस्याओं का प्रबंधन शामिल हो सकता है।
यदि मरीज खून पतला करने वाली कुछ दवाएँ ले रहा है, तो डॉक्टर जरूरत के अनुसार उनका असर उलटने के लिए विशेष दवा या उपचार दे सकते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ मामलों में वारफरिन, डाबीगैट्रान या फैक्टर-Xa अवरोधक दवाओं के लिए अलग-अलग रिवर्सल उपचार उपलब्ध होते हैं। इन्हें अस्पताल में डॉक्टर की देखरेख में ही दिया जाता है। रक्तचाप को उचित सीमा में स्थिर रखना और रक्तस्राव बढ़ने के जोखिम को कम करना उपचार का अहम हिस्सा है।
हर ब्रेन हेमरेज में ऑपरेशन जरूरी नहीं होता। कुछ मरीजों में रक्तस्राव का कारण एन्यूरिज्म या AVM हो तो क्लिपिंग, कॉइलिंग या अन्य न्यूरोवैस्कुलर प्रक्रिया पर विचार किया जा सकता है। कुछ चुनिंदा मामलों में रक्त का जमा थक्का निकालने या मस्तिष्क पर दबाव कम करने के लिए सर्जरी की जा सकती है। यह निर्णय न्यूरोसर्जन और स्ट्रोक विशेषज्ञ जाँच के बाद लेते हैं। मरीज को घर पर रक्तचाप की दवा की खुराक बढ़ाकर या खून पतला करने वाली दवा देकर उपचार करने की कोशिश नुकसानदेह हो सकती है।
थक्का वाले स्ट्रोक का इलाज
इस्केमिक स्ट्रोक में यदि मस्तिष्क की धमनी में थक्का हो और मरीज तय चिकित्सकीय मानदंडों पर खरा उतरे, तो डॉक्टर अल्टेप्लेस या टेनेक्टेप्लेस जैसी थक्का घोलने वाली दवा देने पर विचार कर सकते हैं। ये उपचार आम तौर पर लक्षण शुरू होने के 4.5 घंटे के भीतर पात्र मरीजों में उपयोग किए जा सकते हैं; हर मरीज इसके लिए उपयुक्त नहीं होता। उपचार से पहले इमेजिंग से रक्तस्राव को अलग करना जरूरी है।
बड़ी रक्तवाहिका में थक्का होने पर पात्र मरीजों में मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी की जा सकती है। इसमें कैथेटर और विशेष उपकरण के जरिए थक्का हटाया जाता है। कुछ मरीजों में इमेजिंग और अन्य मानदंडों के आधार पर यह प्रक्रिया लक्षण शुरू होने के 24 घंटे तक भी संभव हो सकती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि अस्पताल जाने में 24 घंटे इंतजार किया जाए—जितनी जल्दी उपचार शुरू होगा, उतना बेहतर।
थक्का और रक्तस्राव के इलाज में अंतर होने के कारण घर पर एस्पिरिन या कोई अन्य खून पतला करने वाली दवा देना खतरनाक हो सकता है। पहले स्कैन और डॉक्टर का निदान जरूरी है।
स्थिर होने के बाद पुनर्वास क्यों जरूरी है?
स्ट्रोक के बाद कई मरीजों को चलने, हाथ-पैर हिलाने, बोलने, निगलने, देखने, याद रखने या रोजमर्रा के काम करने में कठिनाई रह सकती है। अस्पताल में मरीज के स्थिर होने के बाद फिजियोथेरेपी, ऑक्यूपेशनल थेरेपी, स्पीच और भाषा उपचार, निगलने की क्षमता की जाँच, पोषण-सलाह और जरूरत पड़ने पर मानसिक स्वास्थ्य सहायता पुनर्वास का हिस्सा हो सकते हैं।
कुछ मरीजों को लकवा या बोलने की समस्या के लिए लंबे समय तक अभ्यास की जरूरत पड़ती है। पुनर्वास का कार्यक्रम मरीज की स्थिति के अनुसार बनना चाहिए। दोबारा स्ट्रोक से बचने के लिए रक्तचाप, मधुमेह, कोलेस्ट्रॉल, हृदय की धड़कन और अन्य कारणों का उपचार भी जारी रखना जरूरी है।
आयुर्वेद और होम्योपैथी: क्या भूमिका हो सकती है?
ब्रेन स्ट्रोक या ब्रेन हेमरेज एक आपातकालीन बीमारी है। आयुर्वेदिक या होम्योपैथिक उपचार को आपातकालीन अस्पताल-उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। इनके कारण अस्पताल पहुँचने में देरी होने से मरीज की जान और मस्तिष्क की कार्यक्षमता पर गंभीर असर पड़ सकता है।
आयुर्वेद
स्ट्रोक के बाद पुनर्वास में आयुर्वेदिक पद्धति को लेकर अध्ययन हुए हैं, लेकिन उपलब्ध प्रमाण इसे मानक फिजियोथेरेपी से बेहतर साबित नहीं करते। 2025 में प्रकाशित एक भारतीय रैंडमाइज़्ड अध्ययन में परीक्षण किए गए आयुर्वेदिक पुनर्वास कार्यक्रम ने फिजियोथेरेपी की तुलना में बेहतर परिणाम नहीं दिखाए। इसलिए यदि मरीज और परिवार आयुर्वेदिक उपायों पर विचार करें, तो यह स्ट्रोक के स्थिर होने के बाद, न्यूरोलॉजिस्ट और योग्य चिकित्सक से चर्चा करके तथा निर्धारित पुनर्वास के साथ ही होना चाहिए।
कुछ आयुर्वेदिक उत्पादों में सीसा, पारा या आर्सेनिक जैसे तत्व विषाक्त मात्रा में हो सकते हैं। दवाओं और जड़ी-बूटियों का कुछ खून पतला करने वाली या रक्तचाप की दवाओं से परस्पर असर भी हो सकता है। इस्तेमाल की जा रही हर दवा और उत्पाद की जानकारी इलाज कर रहे डॉक्टर को दें।
होम्योपैथी
होम्योपैथी से स्ट्रोक का इलाज या स्ट्रोक के कारण हुए मस्तिष्कीय नुकसान को पलटने के पर्याप्त विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। गंभीर या जीवन-जोखिम वाली बीमारी में प्रमाणित चिकित्सा को छोड़कर होम्योपैथी पर निर्भर करना नुकसान पहुँचा सकता है। किसी भी पूरक उपचार को अपनाने से पहले डॉक्टर से बात करें।

भारत में स्ट्रोक का इलाज कहाँ उपलब्ध है?
स्ट्रोक में सिर्फ अस्पताल का नाम नहीं, बल्कि तत्काल जाँच और उपचार की उपलब्धता मायने रखती है। संभव हो तो ऐसे अस्पताल जाएँ जहाँ आपातकालीन सीटी स्कैन, स्ट्रोक या न्यूरोलॉजी टीम, आईसीयू और जरूरत पड़ने पर न्यूरोसर्जरी या थ्रोम्बेक्टॉमी जैसी सुविधाएँ उपलब्ध हों। भारत में उदाहरण के तौर पर निम्न संस्थानों की आधिकारिक जानकारी में स्ट्रोक-संबंधी सेवाओं का उल्लेख है:
- AIIMS, नई दिल्ली: न्यूरोलॉजी विभाग स्ट्रोक से जुड़ी क्लिनिकल सेवाएँ और देखभाल प्रदान करता है।
- वीएमएमसी एवं सफदरजंग अस्पताल, नई दिल्ली: न्यूरोलॉजी विभाग में स्ट्रोक एचडीयू और स्ट्रोक आईसीयू बेड उपलब्ध होने की जानकारी है।
- किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU), लखनऊ: अलग स्ट्रोक वार्ड और ट्रॉमा सेंटर में चौबीसों घंटे आपातकालीन सेवा तथा पात्र मरीजों के लिए थ्रोम्बोलाइसिस का उल्लेख है।
- SCTIMST, तिरुवनंतपुरम: संस्थान के कॉम्प्रिहेंसिव स्ट्रोक केयर सेंटर में स्ट्रोक यूनिट, स्ट्रोक आईसीयू, इमेजिंग, थ्रोम्बोलाइसिस और मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी जैसी सेवाओं की जानकारी दी गई है।
- PGIMER, चंडीगढ़ और CMC, वेल्लोर: इनके स्ट्रोक उपचार से जुड़े केंद्रों और सेवाओं का भी उल्लेख है।
- SGPGI, लखनऊ: संस्थान की सूचना में समर्पित स्ट्रोक यूनिट और पात्र मरीजों के लिए थ्रोम्बोलाइसिस या थ्रोम्बेक्टॉमी का उल्लेख है।
- AIIMS तथा अन्य सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में उपलब्ध सुविधाएँ शहर और संस्थान के अनुसार अलग हो सकती हैं। कुछ अस्पतालों में शुरुआती जाँच संभव है, लेकिन विशेष न्यूरोवैस्कुलर उपचार के लिए मरीज को दूसरे केंद्र में भेजना पड़ सकता है।
यह सूची उपचार की गारंटी या अस्पतालों की रैंकिंग नहीं है। सुविधाएँ, विशेषज्ञों की उपलब्धता और आपातकालीन क्षमता बदल सकती हैं। मरीज को लेकर दूर-दराज के अस्पतालों की सूची खोजते रहने के बजाय नजदीकी उपयुक्त आपातकालीन सेवा से तुरंत संपर्क करें। फोन पर यह जानकारी देना उपयोगी होगा कि लक्षण कब शुरू हुए, मरीज होश में है या नहीं, और वह कौन-सी दवाएँ लेता है।
स्ट्रोक से बचाव के लिए रोजमर्रा की आदतें
सभी स्ट्रोक रोके नहीं जा सकते, लेकिन कई प्रमुख जोखिमों पर काम किया जा सकता है:
रक्तचाप की नियमित जाँच
उच्च रक्तचाप में कई बार कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते। नियमित रूप से रक्तचाप जाँचें, डॉक्टर द्वारा दी गई दवा नियमित लें और दवा अपने-आप बंद या कम न करें। ब्रेन हेमरेज की रोकथाम के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण कदमों में से है।
मधुमेह और कोलेस्ट्रॉल पर नियंत्रण
रक्त शर्करा और कोलेस्ट्रॉल की जाँच चिकित्सकीय सलाह के अनुसार कराएँ। यदि मधुमेह, उच्च कोलेस्ट्रॉल, हृदय रोग या अनियमित धड़कन है, तो नियमित उपचार और फॉलो-अप जरूरी है।
तंबाकू और नशीले पदार्थों से दूरी
सिगरेट, बीड़ी, हुक्का, तंबाकू और वेपिंग सहित सभी तंबाकू उत्पाद रक्तवाहिकाओं को नुकसान पहुँचा सकते हैं। नशीले उत्तेजक पदार्थ स्ट्रोक का जोखिम भी बढ़ा सकते हैं। धूम्रपान छोड़ने में जरूरत हो तो डॉक्टर या तंबाकू-निषेध सेवा की मदद लें।
खान-पान और शारीरिक सक्रियता
सब्जियों, फलों, साबुत अनाज और दालों वाला संतुलित भोजन लें। नमक, अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ और अनावश्यक रूप से अधिक वसा वाले भोजन को सीमित करें। नियमित शारीरिक गतिविधि, स्वस्थ वजन और पर्याप्त नींद पर ध्यान दें। स्वस्थ वयस्कों के लिए सामान्य सार्वजनिक-स्वास्थ्य सलाह में सप्ताह में करीब 150 मिनट मध्यम तीव्रता की गतिविधि शामिल है; व्यक्ति की उम्र या बीमारी के अनुसार व्यायाम डॉक्टर से पूछकर तय करें।
वायु प्रदूषण और पर्यावरण
वायु प्रदूषण को स्ट्रोक सहित हृदय और रक्तवाहिका संबंधी बीमारियों के जोखिमों में गिना जाता है। प्रदूषण के ऊँचे स्तर वाले दिनों में बाहर भारी व्यायाम सीमित करना और संभव हो तो साफ हवा वाले स्थानों में गतिविधि करना सहायक हो सकता है। वायु प्रदूषण से सुरक्षा केवल व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं—स्वच्छ हवा के लिए सार्वजनिक नीतियाँ और प्रदूषण नियंत्रण भी जरूरी हैं। WHO स्ट्रोक से जुड़े जोखिमों में वायु प्रदूषण, उच्च रक्तचाप, धूम्रपान, उच्च LDL, अधिक नमक, ऊँची रक्त शर्करा, निष्क्रिय जीवनशैली और अधिक वजन को शामिल करता है।
गर्भावस्था और प्रसव के बाद सतर्कता
गर्भावस्था में तेज सिरदर्द, दृष्टि में बदलाव, बहुत बढ़ा रक्तचाप, दौरा, अचानक कमजोरी या बोलने में परेशानी हो तो तत्काल चिकित्सा सहायता लें। प्री-एक्लेम्पसिया या एक्लेम्पसिया जैसी स्थितियों में विशेषज्ञ देखभाल जरूरी है। दवाओं, गर्भनिरोधक गोलियों और अन्य जोखिमों पर व्यक्तिगत सलाह डॉक्टर से लें, खासकर यदि धूम्रपान, माइग्रेन या पहले रक्त के थक्के की समस्या रही हो।
भारत और विश्व में स्ट्रोक के आँकड़े
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 2021 में विश्वभर में करीब 1.19 करोड़ नए स्ट्रोक हुए। उसी वर्ष स्ट्रोक मृत्यु और दिव्यांगता के प्रमुख कारणों में तीसरे स्थान पर था। WHO के अनुमान के मुताबिक, दुनिया में 25 वर्ष से अधिक उम्र के लगभग हर चार लोगों में से एक को जीवनकाल में स्ट्रोक होने का जोखिम है। यह वैश्विक अनुमान है—इसे किसी व्यक्ति की निश्चित भविष्यवाणी या भारत में ठीक-ठीक हर चौथे व्यक्ति का आँकड़ा नहीं समझना चाहिए।
विश्व स्ट्रोक संगठन के 2025 फैक्ट शीट में 2021 के लिए लगभग 9.38 करोड़ लोगों के स्ट्रोक के बाद जीवित रहने का अनुमान दिया गया है। इसी डेटा में मस्तिष्क के भीतर रक्तस्राव (इंट्रासेरेब्रल हेमरेज) के करीब 34 लाख नए मामले बताए गए हैं—यह सभी नए स्ट्रोक का लगभग 29% है। आँकड़े अलग-अलग परिभाषाओं और मॉडलिंग पर आधारित हो सकते हैं; इसलिए इन्हें अनुमान के रूप में पढ़ना चाहिए।
भारत में 2018–2019 के दौरान पाँच भौगोलिक क्षेत्रों—कटक, कछार, तिरुनेलवेली, कोटा और वाराणसी—में किए गए ICMR-समर्थित जनसंख्या-आधारित अध्ययन में स्ट्रोक की कच्ची वार्षिक घटना-दर 100,000 लोगों पर 138.1 और आयु-मानकीकृत दर 100,000 पर 103.4 दर्ज हुई। सरल गणना में 138.1 प्रति लाख लगभग 0.138% वार्षिक घटना-दर के बराबर है, लेकिन यह पाँच अध्ययन क्षेत्रों का परिणाम है—इसे पूरे भारत की सटीक राष्ट्रीय दर या पहले से स्ट्रोक झेल चुके लोगों का प्रतिशत नहीं कहा जा सकता। भारत में अलग-अलग क्षेत्रों के आँकड़ों और पंजीकरण की उपलब्धता में अंतर है।
घटना-दर, प्रचलन और जीवनकाल जोखिम अलग-अलग चीजें हैं। घटना-दर बताती है कि एक अवधि में कितने नए मामले हुए; प्रचलन बताता है कि किसी समय कितने लोग बीमारी के साथ जी रहे हैं; जीवनकाल जोखिम बताता है कि जीवन में कभी स्ट्रोक होने की संभावना कितनी है। इन आँकड़ों को एक-दूसरे की जगह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
चिकित्सा इतिहास: स्ट्रोक की जानकारी सबसे पहले कब दर्ज हुई?
प्राचीन यूनानी चिकित्सक हिप्पोक्रेट्स के लेखन में अचानक लकवा या चेतना में बदलाव जैसी स्थिति का उल्लेख “एपोप्लेक्सी” के नाम से मिलता है। उस समय बीमारी के पीछे रक्तवाहिका में रुकावट और रक्तस्राव जैसे आधुनिक कारण ज्ञात नहीं थे। 1658 में स्विस चिकित्सक जोहान याकोब वेप्फर ने मृत मरीजों के अध्ययन के आधार पर मस्तिष्कीय रक्तस्राव और स्ट्रोक जैसे लक्षणों के संबंध को दर्ज किया। इतिहास में कई चिकित्सकों और वैज्ञानिकों के योगदान से स्ट्रोक को समझने और इलाज करने की पद्धति विकसित हुई—इसलिए आधुनिक उपचार किसी एक डॉक्टर ने शुरू नहीं किया था।
आधुनिक स्ट्रोक चिकित्सा में बाद के दशकों में इमेजिंग, स्ट्रोक यूनिट और रक्त प्रवाह बहाल करने वाले उपचार विकसित हुए। 1995 के NINDS अध्ययन ने पात्र इस्केमिक स्ट्रोक मरीजों में अल्टेप्लेस के लाभ का महत्वपूर्ण प्रमाण दिया; अमेरिका में 1996 में इसे स्वीकृति मिली। 2015 के कई परीक्षणों ने चयनित मरीजों में मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी के लाभ का समर्थन किया। ये उपचार थक्के वाले स्ट्रोक के लिए हैं—ब्रेन हेमरेज में इन्हें नहीं दिया जाता।
जनहित में सबसे जरूरी संदेश
स्ट्रोक अचानक हो सकता है, लेकिन उसके असर को कम करने का अवसर समय पर इलाज से मिलता है। चेहरा टेढ़ा होना, हाथ-पैर में अचानक कमजोरी, बोली बिगड़ना, दृष्टि या संतुलन में अचानक बदलाव, तेज असामान्य सिरदर्द, उल्टी, दौरा या बेहोशी को आपातकाल मानें। लक्षण शुरू होने का समय नोट करें और मरीज को तत्काल अस्पताल पहुँचाएँ। स्कैन से पहले स्ट्रोक का प्रकार पता नहीं चलता, इसलिए मरीज को एस्पिरिन, अतिरिक्त रक्तचाप की दवा, आयुर्वेदिक या होम्योपैथिक उपचार अपने-आप न दें। समय पर पहचान, सही जाँच और उचित स्ट्रोक-चिकित्सा ही जीवन और मस्तिष्क की कार्यक्षमता बचाने का सबसे अहम रास्ता है।
यह जनहित जानकारी है, व्यक्तिगत चिकित्सकीय सलाह नहीं। किसी व्यक्ति में स्ट्रोक के लक्षण दिखें तो तुरंत आपातकालीन सेवा लें