आचार्य भगवंत श्री 108 आर्जवसागर महामुनिराज ससंघ
श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के पांचवें दिन आचार्य श्री 108 आर्जवसागर महामुनिराज ने आत्मकल्याण, गुरु महिमा और जीवों के प्रति मैत्री का संदेश दिया
बड़ौत । श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर कमेटी मंडी बड़ौत के तत्वावधान में आयोजित श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के पांचवें दिन श्रद्धा और भक्ति का वातावरण रहा। आचार्य भगवंत श्री 108 आर्जवसागर महामुनिराज ससंघ के मंगल सान्निध्य में हुए धार्मिक अनुष्ठानों और प्रवचनों से मंदिर परिसर धर्ममय हो उठा। श्रद्धालुओं ने सिद्ध परमेष्ठी की आराधना और जिनेंद्र भगवान की पूजा-अर्चना की।
प्रातःकाल सौधर्म इंद्र राजेश जैन ने भगवान आदिनाथ की प्रतिमा का अभिषेक किया। शांतिधारा का सौभाग्य चक्रवर्ती लोकेश जैन और कुबेर इंद्र सतेंद्र को प्राप्त हुआ। पंडित सनत कुमार और विनोद कुमार के निर्देशन में देव-शास्त्र-गुरु पूजन, चंद्रप्रभु भगवान देहरा पूजन, आचार्य श्री आर्जवसागर पूजन और सिद्ध यंत्र की पूजा कराई गई। सौधर्म इंद्र ने मंडल पर 128 अर्घ समर्पित किए। संतोष म्यूजिक ग्रुप के भक्ति गीतों ने श्रद्धालुओं को भावविभोर किया।
विधान में सामग्री भेंट करने और दीप प्रज्वलन का सौभाग्य श्री स्याद्वाद महिला संगठन नगर तथा अतिथि भवन पुजारी संघ को मिला। अतिथि भवन श्राविका संघ ने पाद प्रक्षालन किया, जबकि दीप्ति जैन ने जिनवाणी भेंट की।
भगवान की आराधना से आत्मचिंतन का मार्ग प्रशस्त
प्रवचन में आचार्य श्री ने बड़ौत के लोगों की गुरुभक्ति, परमेष्ठी भगवंतों के प्रति अनुराग और धर्म के प्रति समर्पण की सराहना की। उन्होंने कहा कि चातुर्मास के दौरान यहां श्रद्धा, लगन और उत्साह देखने को मिल रहा है। भगवान अजितनाथ सहित अन्य जिनबिंबों से सुशोभित विशाल जिनालय में दर्शन करना पुण्य का फल है।
आचार्य श्री ने आत्मस्वरूप की पहचान पर जोर देते हुए कहा कि जीव ने अनंत काल से संसार में भटकते हुए अनेक स्थानों की यात्रा की, लेकिन अपने निज स्वरूप और आत्मतत्त्व को नहीं पहचाना। भगवान के सम्मुख पहुंचकर मनुष्य कुछ समय के लिए सांसारिक चिंताओं और उलझनों को भूल जाता है। जब मन संसार से हटकर प्रभु के चरणों में एकाग्र होता है, तब आत्मचिंतन और अपने वास्तविक स्वरूप की ओर बढ़ने का मार्ग खुलता है।

संतों का सान्निध्य जीवन को देता है नई दिशा
गुरु-सान्निध्य का महत्व बताते हुए आचार्य श्री ने कहा कि संतों और मुनिराजों का समागम सहजता से नहीं मिलता। जीवन में जब भी संतों का सान्निध्य प्राप्त हो, उसका पूरा लाभ लेना चाहिए। संतों के उपदेश मनुष्य को जीवन की दिशा बदलने और मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा देते हैं।
उन्होंने कहा कि धर्म की प्राप्ति दुर्लभ है और गुरुओं का समागम अंतर्चक्षु खोलने के साथ आत्मिक शांति एवं सुख का अनुभव कराता है। देव, शास्त्र और गुरु जीवन को महान बनाते हैं। बड़ौत के लोगों की इनके प्रति भक्ति सराहनीय है। आचार्य श्री ने विश्वास जताया कि समाज की यह श्रद्धा जिनालय और संत निवास के जीर्णोद्धार सहित धार्मिक कार्यों को आगे बढ़ाने की प्रेरणा बनेगी।
धर्म, परोपकार और जीवदया का संदेश
धर्म की महत्ता बताते हुए आचार्य श्री ने कहा कि धर्म जीवन को सुखी बनाने और इहलोक तथा परलोक को सुधारने का माध्यम है। तीर्थंकरों की दिव्य वाणी आचार्य भगवंतों के माध्यम से प्राप्त होती है और उनके उपदेश अनेक जीवों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं। गुरु आत्मकल्याण की राह दिखाने वाले महान उपकारी हैं।
उन्होंने कहा कि केवल मनुष्य के रूप में जन्म लेना पर्याप्त नहीं है। धर्म को जीवन में धारण करना और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना ही जन्म को सार्थक बनाता है। प्रवचन के अंतिम चरण में आचार्य श्री ने परस्पर उपकार, मैत्री और जीवदया का संदेश देते हुए कहा कि प्रत्येक जीव के प्रति कल्याण की भावना रखनी चाहिए। कोई व्यक्ति हमारे प्रति उपकार करे या न करे, हमें सबके सुख और कल्याण की कामना करनी चाहिए।
शाम को गुरुभक्ति, आरती और सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए। कार्यक्रम में मुकेश जैन, प्रदीप जैन, वरदान जैन, नवीन जैन, सुरेश जैन, विकास जैन, ऋषभ जैन, संजीव जैन, अनिल जैन और संजय जैन सहित अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे। वरदान जैन, मीडिया प्रभारी ने यह जानकारी दी।