कार्यशाला में विद्यार्थियों को भारतीय दृष्टिकोण के बारे में बताते प्रोफेसर संजय कुमार
मेरठ। ग्रीष्मकालीन अवकाश के बाद नवीन शैक्षिक सत्र 2026-27 का शुभारंभ बालेराम ब्रजभूषण सरस्वती शिशु मंदिर वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, मेरठ में उत्साह, नवसंकल्प और भारतीय शिक्षा दर्शन के साथ किया गया। सत्र के प्रथम दिन विद्यालय के समस्त आचार्य परिवार के व्यावसायिक उन्नयन के उद्देश्य से “भारतीय परिप्रेक्ष्य में बाल मनोविज्ञान” विषय पर एक दिवसीय ज्ञानवर्धक कार्यशाला का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन एवं सामूहिक सरस्वती वंदना के साथ हुआ। वैदिक मंत्रोच्चार से वातावरण आध्यात्मिक एवं प्रेरणादायी बन गया। विद्यालय परिवार ने ज्ञान की अधिष्ठात्री मां सरस्वती से विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य और नवीन शैक्षिक सत्र की सफलता की कामना की।
वरिष्ठ पदाधिकारियों की रही गरिमामयी उपस्थिति
कार्यक्रम में विद्यालय प्रबंध समिति के अनेक वरिष्ठ पदाधिकारी उपस्थित रहे। विद्यालय के प्रधानाचार्य श्री प्रभात कुमार गुप्ता ने सभी अतिथियों का परिचय कराया। इस अवसर पर उपाध्यक्ष डॉ. विनोद अग्रवाल, प्रबंधक डॉ. आशीष अग्रवाल, उपप्रबंधक डॉ. सुधांशु अग्रवाल, निदेशक श्री कृष्ण कुमार शर्मा तथा कमला देवी सरस्वती शिशु मंदिर की प्रधानाचार्या श्रीमती गीता अग्रवाल विशेष रूप से मौजूद रहीं।
प्रोफेसर संजय कुमार ने भारतीय दृष्टिकोण से समझाया बाल मनोविज्ञान
कार्यशाला के मुख्य वक्ता एवं विषय विशेषज्ञ चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के मनोविज्ञान विभागाध्यक्ष प्रोफेसर संजय कुमार रहे। उन्होंने भारतीय संस्कृति, पारिवारिक मूल्यों और परंपराओं के संदर्भ में बाल मनोविज्ञान की विस्तृत व्याख्या की।
उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों के मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों को भारतीय बच्चों पर पूरी तरह लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि भारतीय समाज में संयुक्त परिवार, गुरु-शिष्य परंपरा, संस्कार और सामूहिक जीवन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यही विशेषताएं भारतीय बच्चों के व्यक्तित्व और मनोविज्ञान को अलग पहचान देती हैं।
पंचकोश विकास से बनता है संपूर्ण व्यक्तित्व
प्रोफेसर संजय कुमार ने पंचकोश विकास की अवधारणा को समझाते हुए कहा कि केवल बौद्धिक विकास ही पर्याप्त नहीं है। किसी भी बालक के संपूर्ण व्यक्तित्व के निर्माण के लिए अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोश का संतुलित विकास आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि शिक्षक केवल विषय पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि एक ‘आचार्य’ होता है, जो अपने आचरण से विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करता है। इसलिए प्रत्येक शिक्षक में धैर्य, संवेदनशीलता और बालक के व्यवहार को समझने की क्षमता होनी चाहिए।
आनंदमय वातावरण में बेहतर सीखते हैं बच्चे
कार्यशाला में उन्होंने बताया कि बच्चों के सीखने की प्रक्रिया भयमुक्त और आनंदमय वातावरण में अधिक प्रभावी होती है। कहानी, खेल, संगीत और गतिविधि आधारित शिक्षण भारतीय शिक्षा पद्धति के अनुरूप है और इससे बच्चों की स्वाभाविक जिज्ञासा तथा रचनात्मकता विकसित होती है।
उन्होंने एकल परिवारों और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण बच्चों में तनाव, अकेलेपन और मानसिक दबाव जैसी समस्याओं पर चिंता व्यक्त करते हुए विद्यालय और अभिभावकों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया।
शिक्षकों ने पूछे व्यवहारिक प्रश्न
कार्यशाला पूरी तरह संवादात्मक रही। शिक्षकों ने कक्षा में आने वाली व्यावहारिक समस्याओं जैसे बच्चों की चंचलता, एकाग्रता की कमी, हीन भावना और व्यवहार संबंधी चुनौतियों पर प्रश्न पूछे। प्रोफेसर संजय कुमार ने भारतीय संदर्भों और व्यवहारिक उदाहरणों के माध्यम से इनका समाधान प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम में विद्यालय के लगभग 125 आचार्य एवं दीदियों ने सक्रिय सहभागिता की। समूह चर्चा और केस स्टडी के माध्यम से शिक्षकों ने बाल मनोविज्ञान के सिद्धांतों को व्यवहारिक रूप से समझा।
भारतीय शिक्षा दर्शन को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल
विद्यालय के प्रधानाचार्य श्री प्रभात कुमार गुप्ता ने कहा कि यह कार्यशाला शिक्षकों को बच्चे को केवल विद्यार्थी नहीं, बल्कि एक संवेदनशील बालक के रूप में समझने की प्रेरणा देती है।
विद्यालय के प्रबंधक डॉ. आशीष अग्रवाल ने कहा कि विद्या भारती का उद्देश्य आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को भारतीय दृष्टिकोण से प्रस्तुत करना है। उन्होंने कहा कि शिक्षा का लक्ष्य केवल परीक्षा में अंक प्राप्त करना नहीं, बल्कि संस्कारवान, चरित्रवान और संतुलित नागरिक तैयार करना है।
वहीं निदेशक श्री कृष्ण कुमार शर्मा ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 (NEP-2020) भी भारतीय ज्ञान परंपरा और बाल-केंद्रित शिक्षा पर विशेष बल देती है। ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम नई शिक्षा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
आभार के साथ हुआ कार्यशाला का समापन
कार्यक्रम के अंत में विद्यालय के प्रधानाचार्य ने मुख्य वक्ता प्रोफेसर संजय कुमार, सभी अतिथियों और समस्त आचार्य परिवार का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि कार्यशाला से प्राप्त ज्ञान को कक्षा-कक्ष तक पहुंचाकर विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए प्रभावी प्रयास किए जाएंगे।
शांति मंत्र के साथ कार्यशाला का समापन हुआ। ग्रीष्मावकाश के बाद आयोजित यह कार्यक्रम नए शैक्षिक सत्र के लिए शिक्षकों में नई ऊर्जा, सकारात्मक सोच और भारतीय मूल्यों पर आधारित शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता को और मजबूत करने वाला सिद्ध हुआ।