आचार्य श्री आर्जवसागर जी
बड़ौत। बड़ौत के अजितनाथ सभागार में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री आर्जवसागर जी ने श्रद्धालुओं को जीवन में धर्म, सत्य, संयम, त्याग और आत्मशुद्धि का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने मन को गंगाजल की तरह पवित्र बनाना चाहिए। मन की पवित्रता के बिना धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझना कठिन है।
आचार्य श्री ने कहा कि साधु-संत मान-सम्मान पाने के लिए गृहस्थों के बीच नहीं आते, बल्कि उनका उद्देश्य संसारी प्राणियों के आध्यात्मिक उत्थान का मार्ग प्रशस्त करना है। संत अपनी आध्यात्मिक दृष्टि से मनुष्य के भीतर छिपी बुराइयों को पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास करते हैं। उन्होंने संतों के इस प्रयास को ‘आध्यात्मिक सर्जरी’ की संज्ञा दी।
उन्होंने कहा कि मनुष्य जब धर्म और संस्कारों को भूलकर पाप प्रवृत्तियों में डूब जाता है, तब संत ही उसे सही मार्ग दिखाने का कार्य करते हैं। संत समाज की बुराइयों पर चोट करते हैं और उनके कड़वे वचन भी व्यक्ति के जीवन को सुधारने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
संतों की फटकार में भी छिपा होता है आशीर्वाद
आचार्य श्री आर्जवसागर जी ने कहा कि संतों की फटकार और उनके कठोर वचनों में भी आशीर्वाद छिपा होता है। इसलिए संतों के उपदेश से भागने के बजाय उन्हें अपना सौभाग्य समझकर स्वीकार करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि शरीर का उपचार अस्पताल में संभव है, लेकिन मन की अशुद्धियों और आत्मा पर जमा बुराइयों का वास्तविक निदान संतों के समागम और आध्यात्मिक चिंतन से हो सकता है। यदि मनुष्य अपने जीवन को सुखमय और मंगलमय बनाना चाहता है तो उसे संतों की आध्यात्मिक सर्जरी को स्वीकार करते हुए अपने भीतर की बुराइयों को दूर करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जो जीव सही मार्ग पर आने की क्षमता रखते हैं, वे संतों के मार्गदर्शन से अपनी गलत प्रवृत्तियों को छोड़कर धर्म और सदाचार के रास्ते पर आगे बढ़ सकते हैं। वहीं गलत कर्मों के दुष्परिणाम मनुष्य को एक न एक दिन आत्मचिंतन और प्रायश्चित्त के लिए विवश करते हैं।
लोभ और स्वार्थ से धर्म के संस्कार हो रहे प्रभावित
आचार्य श्री ने वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि संसारी प्राणियों में लोभ और स्वार्थ की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है। जिन कार्यों को एक धार्मिक एवं नैतिक जीवन जीने वाले व्यक्ति को करने से बचना चाहिए, वे कार्य भी आज सहजता से किए जा रहे हैं। इसका दुष्परिणाम धर्म के संस्कारों और नैतिक मूल्यों के क्षरण के रूप में सामने आ रहा है।
उन्होंने कहा कि जब मनुष्य के जीवन में सच्चे ज्ञान का अभाव हो जाता है तो लोभ उसे अंधा और निर्दयी बना देता है। इसलिए मनुष्य को अपने मन, वचन और काया की शुद्धता पर विशेष ध्यान देना चाहिए। जब तक जीवन में दोष और बुराइयां बनी रहेंगी, तब तक दुर्भाग्य से पूरी तरह मुक्ति संभव नहीं है।
आचार्य श्री ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि सत्य को छिपाने के बजाय सत्य के मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ें और वीतरागी संतों के उपदेशों को अपने जीवन में उतारें। उन्होंने कहा कि आत्मा के कल्याण के लिए संत समागम का अवसर अत्यंत महत्वपूर्ण है।
परमात्मा से जुड़ जाए मन का संबंध
आचार्य श्री ने कहा कि यदि मनुष्य का मन परमात्मा से जुड़ जाता है तो उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आने लगता है। उन्होंने कहा कि अपने दोषों और बुराइयों को छोड़े बिना दुर्भाग्य से छुटकारा पाना संभव नहीं है। आत्मकल्याण के लिए मनुष्य को सबसे पहले अपने भीतर झांकना होगा और अपनी कमियों को दूर करने का प्रयास करना होगा।
उन्होंने श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन, संयम और सदाचार को जीवन का आधार बनाने का संदेश दिया।
दान केवल वस्तु देना नहीं, किसी का उपकार करना भी दान
धर्मसभा में आचार्य श्री ने दान की महत्ता पर भी विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति का उपकार करना भी दान का ही एक स्वरूप है। दान की भावना प्रत्येक व्यक्ति में सहज रूप से उत्पन्न नहीं होती, बल्कि धर्म के संस्कारों से ही मन में दान की भावना विकसित होती है।
उन्होंने कहा कि श्रद्धा और पात्रता के साथ किया गया दान व्यक्ति के कर्मों के क्षय और पुण्य के अर्जन में सहायक बनता है। श्रेष्ठ पात्र को श्रद्धा और नवधा भक्ति के साथ आहारदान करने का विशेष धार्मिक महत्व है।
हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि दान के साथ व्यक्ति को अपने दोषों और बुरी आदतों का त्याग भी करना चाहिए।
व्यसन छोड़ने के बिना दान-पुण्य का वास्तविक लाभ कठिन
आचार्य श्री ने व्यसनमुक्त जीवन पर जोर देते हुए कहा कि यदि व्यक्ति गंभीर बीमारियों के बावजूद तंबाकू, बीड़ी और सिगरेट जैसे नशे को नहीं छोड़ता तथा मांस-मदिरा जैसी प्रवृत्तियों से मुक्त नहीं होता, तो केवल दान-पुण्य करने से जीवन में अपेक्षित आध्यात्मिक परिवर्तन कैसे आएगा।
उन्होंने कहा कि दान से पहले जीवनशैली में मर्यादा और पवित्रता का होना आवश्यक है। व्यसनों का त्याग और बुराइयों से मुक्ति के बाद ही श्रद्धा एवं भक्ति में वास्तविक पवित्रता आ सकती है।
उन्होंने कहा कि जब मनुष्य अपने मन का मैल धोकर दान और धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ता है तो उसके जीवन का दृष्टिकोण बदल जाता है। सच्ची श्रद्धा तभी उत्पन्न होती है जब मन गंगाजल की तरह पावन हो। मन की पवित्रता ही धर्म का वास्तविक स्वरूप है।
दान-धर्म से स्वयं के साथ दूसरों का भी होता है कल्याण
आचार्य श्री ने कहा कि दान और धर्म का अनुसरण केवल व्यक्ति के स्वयं के कल्याण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे समाज और अन्य लोगों का भी उपकार होता है। सेवा, दान, संयम और सदाचार के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन को सार्थक बना सकता है और आत्मा को अनंत सुख की दिशा में अग्रसर कर सकता है।
धर्मसभा में आचार्य श्री के प्रवचन को श्रद्धालुओं ने ध्यानपूर्वक सुना और आत्मचिंतन के साथ जीवन में धर्म एवं सदाचार अपनाने का संदेश ग्रहण किया।
इस अवसर पर मुकेश जैन, वकील चंद जैन, जितेंद्र जैन, सतेंद्र जैन, सुनील जैन, अनिल जैन सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
धर्मसभा का मुख्य संदेश यही रहा कि बाहरी शुद्धता के साथ-साथ मन की पवित्रता भी आवश्यक है। यदि मनुष्य अपने भीतर के लोभ, स्वार्थ, व्यसन और अन्य बुराइयों को दूर कर सत्य, संयम, सेवा और दान के मार्ग पर आगे बढ़ता है, तो उसका जीवन वास्तव में धर्ममय और मंगलमय बन सकता है।