कथाव्यास डॉ. पूनम लखन पाल
मेरठ। शास्त्रीनगर स्थित निजनिवास पर सामवेद की नवमी कथा के चौथे दिन कथा का आयोजन किया गया। प्रो. सुधाकराचार्य त्रिपाठी जी की प्रेरणा से आयोजित इस कथा में कथाव्यास प्रो. पूनम लखनपाल ने सामवेद के अष्टम प्रपाठक के प्रथम अर्धक की कथा का विस्तार से वर्णन किया। कथा के दौरान वैदिक मंत्रों के माध्यम से आध्यात्मिक, नैतिक और व्यावहारिक जीवन से जुड़े विभिन्न पहलुओं को समझाया गया। कथा का संदेश “पात स्वस्तिभिः सदा नः” अर्थात सदैव हमारा कल्याण और रक्षा हो, की भावना से जुड़ा रहा।
त्वष्टा और विष्णु आदित्यों से जुड़ी दिनचर्या पर विशेष चर्चा
कथा के चौथे दिन 12 आदित्यों में से त्वष्टा और विष्णु से संबंधित दिनचर्या का विस्तार से वर्णन किया गया। प्रो. पूनम लखनपाल ने बताया कि सामवेद की कथा में विभिन्न देवताओं के माध्यम से जीवन के अलग-अलग पक्षों को समझने का प्रयास किया गया है। आज की कथा में अग्नि, इन्द्र, विष्णु, वायु और सोम आदि देवताओं से संबंधित वैदिक मंत्रों और उनके भावार्थ पर चर्चा हुई।
उन्होंने सामवेद के मंत्रों के आधार पर 90 से 105 के कालखंड को त्वष्टा तथा 105 से 120 के कालखंड को विष्णु से संबंधित बताते हुए दोनों आदित्यों के स्वरूप, उनके गणों और उनसे जुड़े प्रतीकात्मक पक्षों की जानकारी दी।
त्वष्टा के स्वरूप और महत्व पर प्रकाश
प्रो. पूनम लखनपाल ने त्वष्टा के संबंध में वैदिक एवं पौराणिक संदर्भों को सामने रखा। उन्होंने बताया कि त्वष्टा को अग्नि से संबंधित देवता के रूप में वर्णित किया जाता है। पौराणिक परंपरा में उन्हें त्रिशिरा और संज्ञा का पिता माना गया है। कथा में यह भी बताया गया कि सूर्य के अत्यधिक तेज को कम करने से संबंधित प्रसंग में त्वष्टा की महत्वपूर्ण भूमिका का उल्लेख मिलता है।
उन्होंने त्वष्टा को देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा के रूप में भी समझाया और उनके स्वरूप को सृजन, निर्माण तथा शक्ति के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया।
विष्णु के व्यापक स्वरूप की व्याख्या
कथा के दूसरे प्रमुख विषय विष्णु के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए प्रो. पूनम लखनपाल ने कहा कि वेदों में विष्णु का इन्द्र से संबंध बताया गया है और उन्हें इन्द्र का छोटा भाई कहा गया है। उन्होंने विष्णु शब्द के अर्थ को प्रवेश करने वाले तथा सर्वत्र व्याप्त होने वाले स्वरूप से जोड़ते हुए इसकी व्याख्या की।
उन्होंने बताया कि पौराणिक परंपरा में विष्णु को संसार के पालन-पोषण से संबंधित देवता माना गया है। कथा के माध्यम से विष्णु के व्यापक स्वरूप और उनके विराट भाव को दैनिक जीवन में व्याप्त चेतना तथा संरक्षण की भावना से जोड़कर समझाया गया।
अग्नि से अन्न और पोषण की कामना
कथा के दौरान अग्नि से संबंधित मंत्र की व्याख्या करते हुए बताया गया कि वैदिक ऋषि अग्नि से प्रार्थना करते हैं कि वे सभी अग्नियों के साथ यज्ञ में पधारें, ऋषियों की स्तुतियों को सुनें और अन्न आदि के माध्यम से उनका पोषण करें।
प्रो. पूनम ने इस भाव को मनुष्य के जीवन में ऊर्जा, सहयोग और पोषण की आवश्यकता से जोड़ते हुए कहा कि वैदिक मंत्र केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनके भीतर जीवन को व्यवस्थित और संतुलित करने वाले संदेश भी निहित हैं।
विष्णु की स्तुति में विराट स्वरूप का उल्लेख
विष्णु की स्तुति से जुड़े मंत्रों की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि ऋषि विष्णु को रश्मियों से युक्त और सर्वत्र व्याप्त स्वरूप में देखते हैं। वे प्रार्थना करते हैं कि उनका विराट स्वरूप मानव की रक्षा करे और उनकी व्यापक शक्ति मनुष्य के लिए कल्याणकारी बने।
कथा में बताया गया कि वैदिक चिंतन में देवताओं के स्वरूपों को प्रकृति, चेतना और जीवन के विभिन्न आयामों के प्रतीक के रूप में भी समझा जा सकता है।
वैदिक मंत्रों में अभय और संरक्षण की भावना
प्रो. पूनम लखनपाल ने वैदिक ऋषियों द्वारा देवताओं से की गई अभय की प्रार्थनाओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि वैदिक मंत्रों में मनुष्य द्वारा निकट और दूर से आने वाले अनिष्टों से सुरक्षा तथा भय से मुक्ति की कामना की गई है।
उन्होंने वेदों में उपलब्ध अन्य अभय मंत्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि वैदिक परंपरा में मनुष्य के लिए मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक सुरक्षा की भावना को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।
इन्द्र को आत्मा का प्रतीक मानकर षड् ऊर्मियों पर विजय का संदेश
कथा के दौरान इन्द्र को आत्मा के प्रतीक के रूप में समझाते हुए कहा गया कि आत्मस्वरूप इन्द्र मनुष्य को काम, क्रोध आदि षड् ऊर्मियों पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा देता है। इसके साथ ही यम-नियम आदि के रूप में जीवन के अनुशासन और सदाचार को अपनाने का संदेश भी दिया गया।
प्रो. पूनम ने बताया कि वैदिक प्रतीकों को यदि व्यावहारिक जीवन के संदर्भ में समझा जाए तो वे मनुष्य को आत्मसंयम, अनुशासन, विवेक और सकारात्मक जीवनशैली की ओर प्रेरित करते हैं।
दस इन्द्रियों के कार्य और दिनचर्या से जोड़ा वैदिक संदेश
कथा में दस इन्द्रियों से किए जाने वाले कार्यों को भी त्वष्टा और विष्णु से संबंधित कालखंड की दिनचर्या के रूप में समझाया गया। प्रो. पूनम ने वैदिक मंत्रों में निहित प्रतीकों को लौकिक और व्यावहारिक उदाहरणों से जोड़ते हुए दैनिक जीवन में उनके महत्व को स्पष्ट किया।
उन्होंने बताया कि 90 से 120 के बीच के कुतप काल से संबंधित दिनचर्या को सामवेद के मंत्रों के माध्यम से समझने पर व्यक्ति अपने दैनिक कार्यों को अधिक व्यवस्थित, संयमित और उद्देश्यपूर्ण ढंग से देखने का प्रयास कर सकता है।
सामवेद के मंत्रों का हुआ पाठ
कथा के दौरान सामवेद के संबंधित मंत्रों का पाठ भी किया गया। इनमें अग्नि, विष्णु, वायु, इन्द्र और अन्य देवताओं से संबंधित मंत्रों के माध्यम से प्रार्थना, शक्ति, संरक्षण, कल्याण और आत्मसंयम जैसे भावों को सामने रखा गया।
कार्यक्रम में मंत्रों के आध्यात्मिक अर्थ के साथ उनके व्यावहारिक और प्रतीकात्मक पक्षों को भी विस्तार से समझाया गया। इस प्रकार कथा के माध्यम से वैदिक ज्ञान को दैनिक जीवन से जोड़ने का प्रयास किया गया।
वैदिक ज्ञान को दैनिक जीवन से जोड़ने का संदेश
सामवेद की नवमी कथा के चौथे दिन का मुख्य संदेश यही रहा कि वैदिक मंत्रों और प्रतीकों को केवल धार्मिक अनुष्ठानों के संदर्भ में न देखकर उनके भीतर निहित जीवन-मूल्यों को भी समझा जाना चाहिए। आत्मसंयम, प्रकृति एवं ऊर्जा के प्रति सम्मान, भय से मुक्ति, संरक्षण की भावना और अनुशासित दिनचर्या जैसे विषय आज भी जीवन में प्रासंगिक हैं।
कथा के माध्यम से प्रो. पूनम लखनपाल ने सामवेद के मंत्रों को सरल एवं व्यावहारिक संदर्भों से जोड़ते हुए श्रोताओं को वैदिक ज्ञान की व्यापकता और उसके जीवनोपयोगी पक्षों से परिचित कराया।