मेरठ कॉलेज में आयोजित संगोष्ठी में मंचासीन अतिथिगण
मेरठ। साहित्य सम्राट मुंशी प्रेमचंद की मानवीय विचारधारा, सामाजिक न्याय और हिंदी-उर्दू की साझा सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने के उद्देश्य से मेरठ कॉलेज, मेरठ में एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। हिंदी एवं उर्दू विभाग के संयुक्त तत्वावधान में डॉ. रामकुमार गुप्ता सभागार में आयोजित इस संगोष्ठी का विषय “प्रेमचंद : एक साझी विरासत” रहा। कार्यक्रम में देशभर से आए शिक्षाविदों, साहित्यकारों और शोधार्थियों ने प्रेमचंद के साहित्य की समकालीन प्रासंगिकता पर विस्तार से विचार व्यक्त किए।
वक्ताओं ने अपने संबोधन में कहा कि प्रेमचंद का साहित्य केवल साहित्यिक कृतियों का संग्रह नहीं, बल्कि भारतीय समाज की आत्मा, सामाजिक समरसता, मानवीय संवेदनाओं और लोकतांत्रिक मूल्यों का जीवंत दस्तावेज है। आज के सामाजिक परिवेश में प्रेमचंद के विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं, क्योंकि उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से समाज में व्याप्त असमानताओं, शोषण, जातीय भेदभाव, किसान जीवन की कठिनाइयों, स्त्री संघर्ष और मानवीय मूल्यों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।
अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रेमचंद को बताया भारतीय समाज की साझी चेतना का साहित्यकार
संगोष्ठी की अध्यक्षता चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. असलम जमशेदपुरी ने की। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद केवल हिंदी या उर्दू के लेखक नहीं हैं, बल्कि वे भारतीय समाज की साझी चेतना के महान साहित्यकार हैं। उनका साहित्य भाषा, धर्म और क्षेत्र की सीमाओं से ऊपर उठकर इंसानियत, समानता और सामाजिक न्याय का संदेश देता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में प्रेमचंद की विचारधारा समाज को जोड़ने और सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
नई पीढ़ी को प्रेमचंद के साहित्य से जोड़ने पर दिया गया बल
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ कवि ईश्वर चंद गंभीर ने कहा कि प्रेमचंद की रचनाएँ आज भी समाज में नैतिक मूल्यों, संवेदनशीलता और सामाजिक उत्तरदायित्व की प्रेरणा देती हैं। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को प्रेमचंद के साहित्य का अध्ययन अवश्य करना चाहिए, क्योंकि उनके साहित्य में जीवन के यथार्थ, संघर्ष और मानवीय मूल्यों की सशक्त अभिव्यक्ति मिलती है।
सामाजिक विषमताओं और ग्रामीण जीवन के सशक्त चित्रकार थे प्रेमचंद
मुख्य वक्ता प्रो. ललिता यादव (एन.ए.एस. महाविद्यालय, मेरठ) ने अपने व्याख्यान में कहा कि प्रेमचंद ने भारतीय ग्रामीण समाज, किसान जीवन, स्त्री विमर्श, सामाजिक विषमताओं और मानवीय संघर्षों को जिस गहराई और संवेदनशीलता के साथ अपने साहित्य में चित्रित किया, वह आज भी साहित्य जगत के लिए प्रेरणास्रोत है। उनके उपन्यास और कहानियाँ भारतीय समाज के वास्तविक स्वरूप को सामने लाती हैं।
वहीं डॉ. आरती राणा, हिंदी विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य सामाजिक समानता, लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवीय गरिमा की स्थापना का सशक्त माध्यम है। उन्होंने कहा कि आज के समय में भी प्रेमचंद की रचनाएँ समाज को नई दिशा देने का कार्य कर रही हैं।
हिंदी-उर्दू की साझा सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक हैं प्रेमचंद
डॉ. नूरुल इस्लाम, इलाहाबाद डिग्री कॉलेज, प्रयागराज ने अपने वक्तव्य में कहा कि हिंदी और उर्दू की साझा सांस्कृतिक परंपरा को मजबूत करने में प्रेमचंद का योगदान अतुलनीय है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य दोनों भाषाओं के बीच सेतु का कार्य करता है और भारतीय संस्कृति की गंगा-जमुनी तहजीब को सुदृढ़ बनाता है।
शोधार्थियों ने प्रस्तुत किए शोध-पत्र
संगोष्ठी के द्वितीय सत्र में हिंदी एवं उर्दू विभाग के शोधार्थियों ने प्रेमचंद के साहित्य के विविध आयामों पर अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए। इस दौरान सामाजिक न्याय, किसान जीवन, स्त्री चेतना, राष्ट्रीय एकता, सांप्रदायिक सौहार्द, दलित विमर्श तथा मानवीय मूल्यों जैसे विषयों पर विस्तृत चर्चा हुई। विद्वानों ने शोधार्थियों के शोध कार्यों की सराहना करते हुए उन्हें गंभीर अध्ययन एवं शोध के लिए प्रेरित किया।
संयुक्त रूप से हुआ कार्यक्रम का संचालन
कार्यक्रम का संचालन प्रो. कविता त्यागी, डॉ. यशिका सागर एवं डॉ. मुकेश सेमवाल ने संयुक्त रूप से किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. दिनेश कुमार ने प्रस्तुत किया।
इस अवसर पर मेरठ कॉलेज के विभिन्न विभागों के प्राध्यापक, शोधार्थी, विद्यार्थी एवं साहित्य प्रेमी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। पूरे कार्यक्रम के दौरान प्रेमचंद के साहित्यिक योगदान, सामाजिक दृष्टि और राष्ट्रीय चेतना पर सार्थक विमर्श हुआ।
नई पीढ़ी तक प्रेमचंद की विचारधारा पहुँचाने का लिया संकल्प
संगोष्ठी का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि प्रेमचंद की मानवीय, समावेशी और लोकतांत्रिक विचारधारा को नई पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए भविष्य में भी इस प्रकार के अकादमिक एवं साहित्यिक आयोजनों का नियमित आयोजन किया जाएगा। वक्ताओं ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के समाज को दिशा देने वाली अमूल्य विरासत है।