वर्चुअल वर्ल्ड कांग्रेस में अपना व्याख्यान प्रस्तुत करते प्रो आशीष कौशिक
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर आशीष कौशिक ने डिजिटल निजता, मानवीय गरिमा और नई शुरुआत के अधिकार पर रखा दृष्टिकोण
मेरठ। डिजिटल दौर में इंटरनेट पर उपलब्ध सूचनाओं और व्यक्तिगत डेटा के लंबे समय तक बने रहने से निजता, व्यक्तिगत गरिमा और व्यक्ति के भविष्य पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर दुनिया भर में कानूनी बहस तेज हो रही है। इसी महत्वपूर्ण विषय पर चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के लीगल स्टडीज संस्थान के सहायक प्रोफेसर आशीष कौशिक ने ब्राजील के इटाउना विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित वर्चुअल वर्ल्ड कांग्रेस में अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने दुनिया के विभिन्न हिस्सों से जुड़े कानूनी विशेषज्ञों के समक्ष “भूल जाने का अधिकार: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता के अधिकार का एक उभरता आयाम” विषय पर अपना दृष्टिकोण रखा।
डिजिटल मेमोरी और व्यक्ति की गरिमा के बीच संतुलन की जरूरत
अपने व्याख्यान में प्रोफेसर आशीष कौशिक ने कहा कि आधुनिक तकनीक ने सूचनाओं को संग्रहित करने और उन्हें लंबे समय तक उपलब्ध रखने की क्षमता को अभूतपूर्व रूप से बढ़ा दिया है। इंटरनेट पर किसी व्यक्ति से संबंधित सामग्री एक बार उपलब्ध होने के बाद वर्षों तक मौजूद रह सकती है और उसके सामाजिक एवं व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित कर सकती है।
उन्होंने तर्क दिया कि मनुष्य का जीवन स्वाभाविक रूप से परिवर्तनशील है। व्यक्ति अपनी गलतियों से सीखता है, अपने विचार बदलता है और समय के साथ अपने व्यक्तित्व एवं जीवन को नई दिशा देता है। इसके विपरीत डिजिटल दुनिया की स्थायी स्मृति कई बार व्यक्ति के अतीत को उसके वर्तमान और भविष्य से लगातार जोड़ देती है। ऐसे में डिजिटल रिकॉर्ड व्यक्ति की गरिमा, बदलती पहचान और व्यक्तिगत स्वायत्तता के लिए चुनौती बन सकते हैं।
प्राकृतिक रूप से भूलना भी मानव विकास का हिस्सा
प्रोफेसर कौशिक ने अपने व्याख्यान में रोस्को पाउंड, जॉन लॉक और इमैनुएल कांट के दार्शनिक विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि व्यक्ति को अपने अतीत से आगे बढ़ने का अवसर मिलना उसके विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने कहा कि मानवीय समाज में भूलना केवल स्मृति का समाप्त होना नहीं, बल्कि व्यक्ति को अपने जीवन में सुधार करने और नई शुरुआत करने का अवसर देने वाली प्रक्रिया भी है।
उन्होंने चिंता व्यक्त की कि यदि व्यक्ति की पुरानी गलतियां डिजिटल माध्यमों में हमेशा के लिए दर्ज और आसानी से उपलब्ध रहती हैं तो वे उसके जीवन में स्थायी सामाजिक कलंक का कारण बन सकती हैं। इसलिए कानून और तकनीक के बीच ऐसा संतुलन आवश्यक है, जिसमें सूचना के अधिकार के साथ-साथ व्यक्ति के सम्मानपूर्वक आगे बढ़ने के अधिकार की भी रक्षा हो।
‘गूगल स्पेन’ फैसले से वैश्विक कानूनी विकास का उल्लेख
प्रोफेसर कौशिक ने अपने संबोधन में यूरोप में ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ से संबंधित महत्वपूर्ण कानूनी विकास का उल्लेख किया। उन्होंने 2014 के यूरोपीय न्यायालय के ‘गूगल स्पेन’ फैसले को इस बहस का महत्वपूर्ण पड़ाव बताया। इसके साथ ही उन्होंने यूरोपीय संघ के जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन (GDPR) के अनुच्छेद 17 का भी उल्लेख किया, जिसमें कुछ परिस्थितियों में व्यक्तिगत डेटा को हटाने के अधिकार से संबंधित प्रावधान हैं।
उन्होंने कहा कि डिजिटल युग में व्यक्तिगत डेटा के इस्तेमाल, संग्रहण और हटाने को लेकर दुनिया के विभिन्न देशों की कानूनी व्यवस्थाएं लगातार विकसित हो रही हैं। भारत भी इस वैश्विक बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
भारत में निजता को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता
भारतीय संवैधानिक व्यवस्था के संदर्भ में प्रोफेसर कौशिक ने न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017) के ऐतिहासिक फैसले का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी।
उनके अनुसार इस संवैधानिक विकास ने भारत में व्यक्तिगत निजता, डेटा सुरक्षा और व्यक्ति की स्वायत्तता से संबंधित कानूनी बहस को नई दिशा प्रदान की है।
DPDP कानून से डेटा सुरक्षा के नए आयाम
व्याख्यान में भारत के डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (DPDP Act) का भी उल्लेख किया गया। प्रोफेसर कौशिक ने बताया कि भारत में व्यक्तिगत डेटा के संरक्षण और उसके प्रसंस्करण को नियंत्रित करने के लिए वैधानिक ढांचा विकसित किया जा रहा है।
उन्होंने डेटा हटाने, सहमति वापस लेने और डेटा के आवश्यकता-आधारित उपयोग जैसे मुद्दों को डिजिटल निजता के व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि व्यक्तिगत डेटा के संबंध में व्यक्ति की भूमिका केवल डेटा उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसे अपने डेटा के उपयोग और संरक्षण के संबंध में प्रभावी अधिकार भी प्राप्त होने चाहिए।
निजता बनाम सार्वजनिक रिकॉर्ड और प्रेस की स्वतंत्रता
प्रोफेसर कौशिक ने इस विषय के एक महत्वपूर्ण और जटिल पहलू—व्यक्तिगत निजता तथा सार्वजनिक रिकॉर्ड एवं प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन—पर भी विचार रखा। उन्होंने उच्च न्यायालयों के ऐसे परस्पर भिन्न दृष्टिकोणों का उल्लेख किया, जिनमें एक ओर व्यक्तिगत निजता की सुरक्षा पर जोर दिया गया है, जबकि दूसरी ओर न्यायिक एवं सार्वजनिक रिकॉर्ड की उपलब्धता और पारदर्शिता को महत्व दिया गया है।
उन्होंने जोरावर सिंह मुंडी तथा धर्मराज भानुशंकर दवे से संबंधित न्यायिक दृष्टिकोणों का संदर्भ देते हुए कहा कि ‘भूल जाने के अधिकार’ को लागू करते समय ऐसा कोई तंत्र नहीं बनना चाहिए जिसके माध्यम से सार्वजनिक इतिहास, न्यायिक रिकॉर्ड या महत्वपूर्ण सूचनाओं का मनमाना संपादन किया जा सके।
उनके अनुसार व्यक्तिगत निजता की रक्षा और अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत अभिव्यक्ति एवं प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करना इस क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण कानूनी चुनौतियों में से एक है।
अनुपातिकता परीक्षण को अपनाने का सुझाव
व्यावहारिक समाधान के तौर पर प्रोफेसर कौशिक ने कई संरचनात्मक सुझाव भी प्रस्तुत किए। उन्होंने डेटा से संबंधित विवादों और ‘भूल जाने के अधिकार’ से जुड़े दावों की जांच के लिए डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड के माध्यम से अनुपातिकता परीक्षण (Proportionality Test) अपनाने का सुझाव दिया।
उनके अनुसार किसी व्यक्ति की निजता की रक्षा और सार्वजनिक हित के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए प्रत्येक मामले के तथ्यों, सूचना की प्रकृति, उसके सार्वजनिक महत्व और व्यक्ति पर पड़ने वाले प्रभाव का अनुपातिक मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
गलत नीयत से किए गए आवेदनों पर रोक की जरूरत
प्रोफेसर कौशिक ने यह भी सुझाव दिया कि डेटा हटाने या डिजिटल रिकॉर्ड को हटाने के अधिकार का गलत इस्तेमाल रोकने के लिए कड़े कानूनी प्रावधान होने चाहिए। उन्होंने आशंका जताई कि यदि इस अधिकार का उपयोग बिना उचित नियंत्रण के किया गया तो महत्वपूर्ण सार्वजनिक सूचनाओं को हटाने या इतिहास को प्रभावित करने के प्रयास भी हो सकते हैं।
इसलिए उन्होंने ऐसे मामलों में स्पष्ट कानूनी मानदंड और जवाबदेही की व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया, ताकि निजता की सुरक्षा के नाम पर सार्वजनिक हित को नुकसान न पहुंचे।
ऐतिहासिक रिकॉर्ड के संरक्षण के लिए ऑफलाइन डिपॉजिटरी का प्रस्ताव
ऐतिहासिक एवं न्यायिक रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने के लिए प्रोफेसर कौशिक ने न्यायिक देखरेख में केंद्रीकृत ऑफलाइन डिपॉजिटरी (Centralized Offline Depository) स्थापित करने का सुझाव भी दिया। उनका विचार है कि यदि किसी डिजिटल सामग्री को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराने पर निजता संबंधी गंभीर समस्या उत्पन्न होती है, तो उसे पूरी तरह नष्ट करने के बजाय उचित सुरक्षा व्यवस्था के अंतर्गत संरक्षित किया जा सकता है।
ऐसी व्यवस्था से एक ओर व्यक्ति की डिजिटल निजता की रक्षा की जा सकेगी और दूसरी ओर महत्वपूर्ण ऐतिहासिक एवं न्यायिक रिकॉर्ड के स्थायी संरक्षण का रास्ता भी बना रहेगा।
‘नई शुरुआत’ का अवसर मिलना चाहिए
अपने संबोधन के समापन में प्रोफेसर आशीष कौशिक ने कहा कि कानून और तकनीक का अंतिम उद्देश्य मानव जीवन को बेहतर बनाना होना चाहिए। उन्होंने जोर दिया कि तकनीक मानव गरिमा की सेवा करे, न कि व्यक्ति को उसकी पुरानी गलतियों का जीवनभर पीछा करने के लिए मजबूर करे।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी गलतियों से सीखने, अपने व्यक्तित्व में बदलाव लाने, आगे बढ़ने और नई शुरुआत करने का अवसर मिलना चाहिए। डिजिटल युग में ‘भूल जाने का अधिकार’ इसी व्यापक मानवीय गरिमा और व्यक्तिगत स्वायत्तता की बहस का उभरता हुआ हिस्सा है।
वैश्विक मंच पर भारतीय कानूनी दृष्टिकोण की प्रस्तुति
वर्ल्ड कांग्रेस जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रोफेसर आशीष कौशिक द्वारा भारतीय संविधान, निजता के मौलिक अधिकार, डेटा संरक्षण कानून और न्यायिक दृष्टिकोण के संदर्भ में ‘भूल जाने के अधिकार’ पर विचार रखना भारतीय कानूनी विमर्श को वैश्विक चर्चा से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण प्रयास माना जा सकता है। उनके व्याख्यान में डिजिटल तकनीक के दौर में निजता, गरिमा, सार्वजनिक हित, प्रेस की स्वतंत्रता और व्यक्ति के पुनर्निर्माण के अधिकार के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पर विशेष जोर रहा।