आचार्य श्री आर्जव सागर
बड़ौत के श्री अजितनाथ सभागार में धर्मसभा को किया संबोधित, सप्त व्यसनों के त्याग और अष्ट मूलगुणों के पालन का दिया संदेश
बड़ौत । नगर के श्री अजितनाथ सभागार में विराजमान परम पूज्य आचार्य श्री आर्जव सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन के माध्यम से श्रद्धालुओं को व्यसनमुक्त, संयमित और सदाचारपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा दी। धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ है और इसे केवल सांसारिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति में व्यतीत नहीं करना चाहिए। धर्म, संयम, सदाचार और आत्मचिंतन के माध्यम से जीवन को सार्थक बनाना ही मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य है।
व्यसन मनुष्य को धीरे-धीरे पतन की ओर ले जाते हैं
आचार्य श्री आर्जव सागर जी महाराज ने कहा कि सप्त व्यसन मनुष्य के जीवन को धीरे-धीरे पतन की ओर ले जाते हैं। शुरुआत में कई व्यसन व्यक्ति को छोटे, सामान्य अथवा आकर्षक लग सकते हैं, लेकिन समय बीतने के साथ उनका प्रभाव व्यक्ति की बुद्धि, विवेक, धन, समय और पारिवारिक सुख-शांति पर पड़ने लगता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि व्यसनों से केवल बचना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनसे पूरी तरह दूर रहने का दृढ़ संकल्प लेना चाहिए। व्यक्ति को समय-समय पर अपने जीवन का आत्मनिरीक्षण करते हुए यह विचार करना चाहिए कि उसकी कौन-सी आदतें उसे उन्नति और धर्म के मार्ग पर ले जा रही हैं तथा कौन-सी आदतें उसे पतन की ओर ले जा रही हैं।
जैन धर्म में सप्त व्यसनों के त्याग का विशेष महत्व
आचार्य श्री ने कहा कि जैन धर्म में सप्त व्यसनों के त्याग को विशेष महत्व दिया गया है। जुआ, मांस, मद्यपान, शिकार, चोरी, परस्त्रीसेवन तथा वेश्यागमन जैसे व्यसनों से दूर रहना व्यक्ति के चरित्र, संयम और सदाचार की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि इन बुराइयों का त्याग व्यक्ति को आत्मकल्याण, संयम और सदाचार की दिशा में आगे बढ़ाता है। व्यसनमुक्त जीवन व्यक्ति को अपनी ऊर्जा सकारात्मक कार्यों में लगाने और अपने जीवन में बेहतर संस्कार विकसित करने का अवसर देता है।
व्यसन का प्रभाव केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं
आचार्य श्री ने कहा कि किसी व्यक्ति की बुरी आदतों का प्रभाव केवल उसी व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका असर पूरे परिवार पर पड़ सकता है। व्यसन के कारण परिवार की शांति प्रभावित होती है, धन का दुरुपयोग हो सकता है और आपसी रिश्तों में तनाव उत्पन्न हो सकता है। उन्होंने कहा कि इसलिए परिवार के प्रत्येक सदस्य को व्यसनमुक्त और संस्कारित वातावरण बनाने के लिए प्रयास करना चाहिए। परिवार में यदि संयम, सदाचार और अच्छे संस्कारों का वातावरण रहेगा तो बच्चों और युवाओं को भी जीवन में सकारात्मक दिशा प्राप्त होगी।
युवा पीढ़ी को संस्कार देना जरूरी
आचार्य श्री ने विशेष रूप से युवा पीढ़ी को व्यसनों से दूर रखने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि बच्चों और युवाओं को बचपन से ही धर्म, अहिंसा, शाकाहार, सत्य, संयम और सदाचार के संस्कार दिए जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि जिस घर में अच्छे संस्कारों का वातावरण होता है, वहां आने वाली पीढ़ी भी श्रेष्ठ मूल्यों को अपनाती है। परिवार और समाज की जिम्मेदारी है कि युवाओं को सकारात्मक सोच, अनुशासन और संस्कारों से जोड़ने के लिए निरंतर प्रयास किए जाएं।
अष्ट मूलगुणों के पालन का भी दिया संदेश
आचार्य श्री ने कहा कि व्यसनों के त्याग के साथ श्रावक को अष्ट मूलगुणों का पालन भी करना चाहिए। उन्होंने बताया कि अष्ट मूलगुणों में पांच उदुम्बर फलों के त्याग तथा तीन मकार—मद्य, मांस और मधु—के त्याग की परंपरा बताई गई है। उन्होंने कहा कि बड़, पीपल, पाकर, कठूमर और ऊमर जैसे उदुम्बर फलों का त्याग जैन श्रावक के लिए अहिंसा और जीवदया की भावना को मजबूत करने वाला माना गया है। इसी प्रकार मद्य, मांस और मधु का त्याग भी संयम, करुणा और शुद्ध जीवन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
धर्म को केवल सुनें नहीं, जीवन में उतारें
आचार्य श्री ने कहा कि धर्म का वास्तविक लाभ तभी है, जब उसका प्रभाव व्यक्ति के व्यवहार में दिखाई दे। केवल प्रवचन सुनना, धार्मिक स्थानों पर जाना या पूजा-पाठ करना पर्याप्त नहीं है। धर्म को विचार, वाणी और व्यवहार में उतारना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यदि धार्मिक प्रवचन सुनने के बाद भी व्यक्ति के जीवन में कोई सकारात्मक परिवर्तन नहीं आता तो उसे स्वयं का आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। व्यक्ति को अपने व्यवहार और आदतों की समीक्षा करते हुए उन कमियों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए, जो उसे धर्म और सदाचार से दूर ले जाती हैं।
त्याग का अर्थ आनंद से दूर होना नहीं
आचार्य श्री ने कहा कि त्याग का अर्थ जीवन से आनंद समाप्त करना नहीं है। त्याग का वास्तविक अर्थ उन आदतों और वस्तुओं से दूरी बनाना है, जो मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप और आत्मकल्याण से दूर करती हैं। उन्होंने कहा कि व्यसन छोड़ने वाला व्यक्ति अपने जीवन में शांति, स्वास्थ्य, सम्मान और अच्छे संस्कारों के लिए स्थान बनाता है। संयमित जीवन व्यक्ति को मानसिक रूप से अधिक स्थिर और सकारात्मक बनाने में सहायक होता है।
संतोष और संयम से जीवन में आती है शांति
आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में संतोष, संयम और सदाचार को स्थान देना चाहिए। आवश्यकता से अधिक संग्रह और विषय-भोग की प्रवृत्ति मनुष्य की इच्छाओं को लगातार बढ़ाती रहती है। इच्छाओं पर नियंत्रण और संयम का अभ्यास ही जीवन को शांत और संतुलित बनाता है। उन्होंने कहा कि सच्चा सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि निर्मल मन और संयमित जीवन में है। जिस व्यक्ति का मन व्यसनों से मुक्त और जीवन सदाचार से युक्त होता है, वह विपरीत परिस्थितियों में भी शांति का अनुभव कर सकता है।
मनुष्य जीवन को आत्मकल्याण में लगाएं
आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य जीवन अत्यंत मूल्यवान है। इसे व्यसन, प्रमाद और बुरी आदतों में नष्ट करने के बजाय धर्म और आत्मकल्याण के लिए लगाना चाहिए। सप्त व्यसनों का त्याग और अष्ट मूलगुणों का पालन व्यक्ति को अहिंसा, संयम और सदाचार की दिशा में ले जाने वाले महत्वपूर्ण संकल्प हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे स्वयं व्यसनमुक्त बनें, अपने परिवार को व्यसनमुक्त बनाने का प्रयास करें और समाज में भी सदाचार एवं संस्कारों का वातावरण तैयार करें। उन्होंने कहा कि धर्म को केवल सुनना नहीं, बल्कि उसे अपने जीवन में उतारना ही मनुष्य जीवन की वास्तविक सार्थकता है।
धर्मसभा में मौजूद रहे श्रद्धालु
धर्मसभा में मुकेश जैन, प्रदीप जैन, वरदान जैन, नवीन जैन, राकेश जैन, विकास जैन, ऋषभ जैन सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।
12 और 13 सितंबर को राष्ट्रीय विद्वत गोष्ठी
मीडिया प्रभारी वरदान जैन ने बताया कि आगामी 12 और 13 सितंबर को श्री अजितनाथ सभागार में राष्ट्रीय विद्वत गोष्ठी का आयोजन किया जाएगा। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम का आयोजन डॉक्टर श्रेयांस जैन एवं ऋषिका दीदी के निर्देशन में किया जाएगा। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय विद्वत गोष्ठी में देश के विभिन्न क्षेत्रों से प्रसिद्ध विद्वान बड़ौत नगर पहुंचेंगे और धर्म एवं दर्शन से जुड़े विषयों पर अपने विचार रखेंगे।