जैनाचार्य सौरभ सागर जी महाराज
जिला कारागार में कैदियों को जैनाचार्य ने दिया आत्मचिंतन और सुधार का संदेश, बोले—जेल कैदखाना नहीं, सुधार गृह है
मेरठ । जिला कारागार में जैनाचार्य सौरभ सागर जी महाराज के प्रवचन कार्यक्रम का आयोजन हुआ। इस दौरान उन्होंने जेल में निरुद्ध बंदियों को संबोधित करते हुए जीवन में क्रोध, आवेश और क्षणिक गलत फैसलों के परिणामों पर गंभीरता से विचार करने का संदेश दिया। जैनाचार्य ने कहा कि कई बार व्यक्ति कुछ क्षण के क्रोध या आवेश में ऐसा कदम उठा लेता है, जिसका खामियाजा उसे वर्षों तक भुगतना पड़ता है। इसी भाव को व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा—“लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई।”
कुछ क्षण का क्रोध बदल सकता है पूरी जिंदगी
जैनाचार्य सौरभ सागर जी महाराज ने बंदियों से कहा कि व्यक्ति को उस क्षण को याद करना चाहिए, जब उसने अपना आपा खोया और उसके हाथों से अपराध हो गया। उसके बाद जीवन में अक्सर पश्चाताप ही शेष रह जाता है। उन्होंने कहा कि बीते हुए समय को बदला नहीं जा सकता, लेकिन वर्तमान को बेहतर बनाकर भविष्य को अवश्य बदला जा सकता है। उन्होंने बंदियों को आत्मचिंतन करने की प्रेरणा देते हुए कहा कि जेल में रहना जीवन का अंत नहीं है, बल्कि यह स्वयं को सुधारने और अपने भीतर सकारात्मक परिवर्तन लाने का अवसर भी हो सकता है।
“जेल कैदखाना नहीं, सुधार गृह है”
जैनाचार्य ने कहा कि इस समय को केवल सजा के रूप में देखने के बजाय आत्ममंथन और सुधार के अवसर के रूप में लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जेल को केवल कैदखाना समझने के बजाय सुधार गृह के रूप में देखा जाना चाहिए। यहां सरकार की ओर से भोजन, रहने और पहनने जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। उन्होंने कहा कि अब जरूरत इस बात की है कि व्यक्ति अपने भीतर झांके, अपने किए गए कर्मों पर विचार करे और गलतियों से सीख लेकर आगे का जीवन सद्मार्ग पर बिताने का संकल्प ले। उन्होंने बंदियों से कहा कि उन्हें अपने भीतर सकारात्मक बदलाव लाने के लिए प्रयास करना चाहिए, ताकि जेल से बाहर निकलने के बाद वे समाज में बेहतर जीवन जी सकें।
संतों की तपस्या से प्रेरणा लेने का आह्वान
जैनाचार्य सौरभ सागर जी महाराज ने अपने जीवन और साधना का उदाहरण देते हुए कहा कि दिगंबर संत सुख-सुविधाओं से दूर रहकर आत्मकल्याण के लिए तपस्या करते हैं। उन्होंने कहा कि संत सीमित आहार और संयमित जीवन के माध्यम से सांसारिक मोह-माया से स्वयं को मुक्त करने का प्रयास करते हैं। उन्होंने बंदियों से भी आग्रह किया कि वे अपने जीवन में संयम, अनुशासन और सदाचार को अपनाएं। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार संत अपने कर्मों से मुक्ति पाने के लिए साधना करते हैं, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्मों पर विचार करते हुए जीवन को सही दिशा देने का प्रयास करना चाहिए।
बाहर निकलने के बाद सद्मार्ग पर चलने का संदेश
जैनाचार्य ने कहा कि जेल से बाहर निकलने के बाद बंदियों का प्रयास होना चाहिए कि वे अपने शेष जीवन को अच्छे कार्यों और सद्मार्ग पर चलकर बिताएं। उन्होंने कहा कि पश्चाताप तभी सार्थक है, जब वह व्यक्ति के व्यवहार और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लेकर आए। उन्होंने कहा कि मनुष्य अपनी गलतियों से सीखकर स्वयं को निखार सकता है और अपने परिवार तथा समाज के लिए उपयोगी जीवन जी सकता है।

कवि सौरभ जैन सुमन ने सुनाया अमीर खुसरो और निजामुद्दीन औलिया का प्रसंग
कार्यक्रम का संचालन एवं उद्बोधन कार्यक्रम के संयोजक कवि सौरभ जैन सुमन ने किया। उन्होंने कहा कि जेल में संतों का समागम होना अपने आप में सौभाग्य की बात है। उन्होंने बंदियों को विश्वास, गुरु और आध्यात्मिक मार्गदर्शन का महत्व समझाने के लिए अमीर खुसरो और निजामुद्दीन औलिया से जुड़ा एक दृष्टांत सुनाया। उन्होंने बताया कि अमीर खुसरो को तैरना नहीं आता था। उनके उस्ताद निजामुद्दीन औलिया ने उन्हें भरोसा रखने और उनका नाम लेते हुए उनके साथ बने रहने को कहा। दृष्टांत के माध्यम से उन्होंने समझाया कि गुरु पर विश्वास रखने से व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी मार्ग पा सकता है। सौरभ जैन सुमन ने कहा कि जिस प्रकार इस प्रसंग में अमीर खुसरो का भरोसा अपने उस्ताद पर था, उसी प्रकार व्यक्ति को संतों के मार्गदर्शन पर विश्वास रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि “ये संत हमारे निजामुद्दीन औलिया हैं और हम अमीर खुसरो हैं। इन पर भरोसा रखिए, ये हमें ईश्वर से मिला देंगे।”
डॉ. अनामिका जैन अम्बर ने किया मंगलाचरण
कार्यक्रम का मंगलाचरण प्रसिद्ध कवयित्री डॉ. अनामिका जैन अम्बर ने किया। उन्होंने अपनी काव्य प्रस्तुति के माध्यम से सत्य, दया, सम्मान, ईमानदारी और मानवीय संवेदनाओं का संदेश दिया।
उन्होंने कहा—
“जहाँ पर सच, दया, सम्मान और ईमान रहता है,
वहीं जाकर वो अल्लाह और वो भगवान रहता है।
अगर तूने निकाला है किसी के पाँव का काँटा,
तो ये तय है तेरे दिल में कोई इंसान रहता है।”
उनकी प्रस्तुति ने कार्यक्रम में मौजूद बंदियों को मानवीय मूल्यों और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता का संदेश दिया।
जेल प्रशासन ने किया जैनाचार्य का स्वागत
जैनाचार्य सौरभ सागर जी महाराज के जिला कारागार पहुंचने पर मुख्य जेलर हरबंश पाण्डेय ने उनका स्वागत किया। उन्होंने जैनाचार्य के पद प्रक्षालन किए तथा श्रीफल अर्पित कर उनका अभिनंदन किया। इस अवसर पर जेल अधीक्षक डॉ. वीरेश राज शर्मा ने जैनाचार्य को जिला कारागार का भ्रमण कराया। जैनाचार्य ने जेल परिसर में मंदिर, पाकशाला, अस्पताल सहित विभिन्न स्थानों का निरीक्षण किया।
जेल की साफ-सफाई और हरियाली की जैनाचार्य ने की सराहना
जेल परिसर का निरीक्षण करने के बाद जैनाचार्य सौरभ सागर जी महाराज ने वहां की साफ-सफाई और हरियाली की सराहना की। उन्होंने कहा कि वे देश की अनेक जेलों में प्रवचन एवं धार्मिक कार्यक्रमों के लिए गए हैं, लेकिन इस जेल में हरियाली और साफ-सफाई उन्हें विशेष रूप से बेहतर दिखाई दी। जेल प्रशासन की ओर से बताया गया कि बंदियों के लिए उपलब्ध व्यवस्थाओं और परिसर की स्वच्छता पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
कार्यक्रम में अनेक गणमान्य लोग रहे मौजूद
कार्यक्रम में अजय जैन, विजय जैन सर्राफ (आनंद जी परिवार), रिंकू जैन, मयंक अग्रवाल (IIMT), अभिषेक जैन (सारू परिवार), सुशील जैन, समीर जैन, रितेश जैन (अरिहंत ज्वेलर्स), पंडित संदीप जैन ‘सजल’, अनुबंध जैन, आयुष जैन, अनुज जैन एडवोकेट, सुदीप जैन सहित अन्य लोग मौजूद रहे।
बंदियों को मिला आत्मसुधार और सकारात्मक जीवन का संदेश
कार्यक्रम का मुख्य संदेश यही रहा कि जीवन में हुई गलतियों को लेकर व्यक्ति निराश होने के बजाय उनसे सीख लेकर अपने भविष्य को बेहतर बनाने का प्रयास करे। जैनाचार्य ने बंदियों को आत्मचिंतन, संयम, पश्चाताप और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि परिस्थितियां चाहे जैसी हों, मनुष्य अपने विचार और कर्म बदलकर जीवन को नई दिशा दे सकता है।