परमपूज्य आचार्य श्री आर्जव सागर जी महाराज
बड़ौत के श्री अजितनाथ मंदिर में शांति विधान का आयोजन, आचार्य श्री ने मन, वचन और कर्म से अहिंसा अपनाने का दिया संदेश
बड़ौत । नगर के श्री अजितनाथ मंदिर में परम पूज्य आचार्य श्री आर्जवसागर जी महाराज के सानिध्य में श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ शांति विधान का आयोजन किया गया। विधान में श्रद्धालुओं ने विधि-विधान एवं भक्तिभाव के साथ पूजन-अर्चन किया। कार्यक्रम के दौरान धर्मसभा का आयोजन भी हुआ, जिसमें आचार्य श्री आर्जवसागर जी महाराज ने अहिंसा, जीवदया, संयम, क्षमा और सद्भाव जैसे विषयों पर श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन किया।
शांति विधान में इंद्र-इंद्राणियों ने किया भक्तिभाव से पूजन
शांति विधान में सौधर्म इंद्र बनने का सौभाग्य श्री राजीव कुमार संजीव जैन, छपरौली वाले को प्राप्त हुआ। ब्रह्मचारी गौरव भैया के सानिध्य में इंद्र-इंद्राणियों ने भक्तिभाव के साथ शांति विधान की पूजन संपन्न की। धार्मिक अनुष्ठान के दौरान मंदिर परिसर में श्रद्धा और भक्ति का वातावरण बना रहा।
अहिंसा जैन धर्म का मूल आधार : आचार्य श्री
विधान के मध्य मंगल प्रवचन करते हुए आचार्य श्री आर्जवसागर जी महाराज ने कहा कि अहिंसा जैन धर्म का मूल आधार है। अहिंसा का अर्थ केवल किसी जीव को शारीरिक पीड़ा न पहुंचाना नहीं है, बल्कि मन, वचन और काय से किसी भी जीव के प्रति हिंसक भावना से बचना भी अहिंसा का महत्वपूर्ण स्वरूप है। उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति के मन में क्रोध, द्वेष या वैर की भावना बनी हुई है तो अहिंसा का वास्तविक पालन अभी अधूरा है। अहिंसा व्यक्ति के बाहरी व्यवहार के साथ-साथ उसके विचारों और भावनाओं में भी दिखाई देनी चाहिए।
प्रत्येक जीव को अपना जीवन प्रिय होता है
आचार्य श्री ने कहा कि प्रत्येक जीव अपने जीवन को प्रिय मानता है। जिस प्रकार मनुष्य को अपना जीवन प्रिय है, उसी प्रकार छोटे से छोटे जीव को भी अपना जीवन प्रिय होता है। इसलिए व्यक्ति को अपने दैनिक व्यवहार में विवेक और सावधानी रखनी चाहिए, ताकि उसकी असावधानी के कारण किसी जीव को अनावश्यक कष्ट न पहुंचे। उन्होंने कहा कि अहिंसा के लिए हमेशा बड़े संकल्पों की आवश्यकता नहीं होती। दैनिक जीवन में छोटी-छोटी सावधानियां अपनाकर भी अहिंसा की भावना को मजबूत किया जा सकता है।
दैनिक जीवन की सावधानियां भी अहिंसा का हिस्सा
आचार्य श्री ने श्रद्धालुओं से कहा कि चलते, बैठते, उठते, भोजन करते और पानी का उपयोग करते समय जीवों के प्रति सावधानी रखना भी अहिंसक जीवन का हिस्सा है। अपने घर और आसपास स्वच्छता बनाए रखने के साथ-साथ इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि अनावश्यक रूप से किसी जीव को कष्ट न पहुंचे। उन्होंने कहा कि अहिंसा केवल बाहरी आचरण तक सीमित नहीं है। व्यक्ति के विचार और वाणी भी अहिंसक होनी चाहिए। कई बार मनुष्य किसी को शारीरिक चोट नहीं पहुंचाता, लेकिन उसके कटु शब्द दूसरे व्यक्ति के मन को पीड़ा पहुंचा सकते हैं। इसलिए बोलने से पहले यह विचार करना चाहिए कि हमारी वाणी से किसी को अनावश्यक कष्ट तो नहीं होगा।
सत्य के साथ मधुरता और हित की भावना जरूरी
आचार्य श्री ने कहा कि व्यक्ति को सत्य बोलना चाहिए, लेकिन सत्य के साथ मधुरता और हित की भावना भी होनी चाहिए। कटुता, अपमान और द्वेष से भरी वाणी सामाजिक संबंधों में तनाव पैदा कर सकती है। इसके विपरीत संयमित और मधुर वाणी आपसी सद्भाव को बढ़ावा देती है। उन्होंने कहा कि मन में किसी के प्रति वैर, ईर्ष्या, बदले की भावना या द्वेष रखना भी व्यक्ति को हिंसा की ओर ले जाता है। इसलिए दूसरों की सफलता से ईर्ष्या करने के बजाय प्रसन्नता व्यक्त करनी चाहिए और किसी की परेशानी देखकर उसका उपहास करने के स्थान पर सहायता और करुणा का भाव रखना चाहिए।
मैत्री, करुणा और क्षमा को जीवन में अपनाने का आह्वान
आचार्य श्री ने मैत्री, करुणा और क्षमा को अहिंसक जीवन के महत्वपूर्ण आधार बताया। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति हमारे साथ अनुचित व्यवहार करता है तो उसके प्रति उसी प्रकार प्रतिक्रिया देना समस्या का समाधान नहीं है। क्रोध के बदले क्रोध देने से विवाद बढ़ता है, जबकि क्षमा और संयम से विवाद को समाप्त करने का मार्ग प्रशस्त होता है। उन्होंने कहा कि क्षमा कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मबल की पहचान है। जो व्यक्ति अपने क्रोध पर नियंत्रण पाने का प्रयास करता है, वही अहिंसा के वास्तविक स्वरूप को समझ सकता है।
जीवदया और संयम के संस्कार बच्चों में डालने पर जोर
आचार्य श्री ने भोजन के चयन में भी जीवदया और संयम का ध्यान रखने की बात कही। उन्होंने बताया कि जैन परंपरा में शाकाहार को अहिंसामय जीवन का महत्वपूर्ण अंग माना गया है। उन्होंने बच्चों को बचपन से ही जीवों के प्रति दया, करुणा और संवेदनशीलता के संस्कार देने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि चींटी, पक्षी या कोई अन्य जीव हो, प्रत्येक अपने जीवन को प्रिय मानता है। इसलिए मनुष्य को अपने व्यवहार में सभी जीवों के प्रति संवेदनशीलता और करुणा का भाव रखना चाहिए।
धर्मसभा से जीवन में अहिंसा अपनाने का आह्वान
आचार्य श्री ने श्रद्धालुओं से कहा कि अहिंसा को केवल धर्मसभा में सुनने का विषय न बनाया जाए, बल्कि इसे जीवन का संस्कार बनाया जाए। उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि वे अपने जीवन में ऐसा संकल्प लें कि उनकी वाणी से किसी को अनावश्यक पीड़ा न पहुंचे, उनके व्यवहार से किसी जीव को कष्ट न हो और उनके मन में किसी के प्रति द्वेष की भावना न रहे। उन्होंने कहा कि यदि परिवार का प्रत्येक सदस्य अहिंसा को अपने जीवन का नियम बना ले तो घर में शांति बढ़ सकती है और समाज में प्रेम, करुणा एवं सद्भाव का वातावरण मजबूत हो सकता है।
आंतरिक विकारों पर विजय का भी संदेश
आचार्य श्री ने कहा कि अहिंसा केवल दूसरों को कष्ट न पहुंचाने की शिक्षा नहीं देती, बल्कि व्यक्ति को अपने भीतर मौजूद क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे विकारों को पहचानने और उन पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा भी देती है। आत्मसंयम और सकारात्मक सोच के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन को अधिक शांत और संतुलित बना सकता है।
श्रद्धालुओं ने लिया धार्मिक आयोजन में हिस्सा
शांति विधान के अवसर पर मुकेश जैन, प्रदीप जैन, नवीन जैन, वरदान जैन, राकेश जैन, ऋषभ जैन, विकास जैन, संजीव जैन, सुरेश जैन, वकील चंद जैन सहित अन्य श्रद्धालु उपस्थित रहे। सभी ने धार्मिक आयोजन में सहभागिता करते हुए आचार्य श्री का आशीर्वाद प्राप्त किया