यानंग जामोह लेगो
अरुणाचल प्रदेश। यानंग जामोह लेगो भारत के अरुणाचल प्रदेश की प्रसिद्ध हर्बल चिकित्सा विशेषज्ञ, कृषि वैज्ञानिक और जनजातीय ज्ञान की संरक्षक हैं। उन्हें “आदि क्वीन ऑफ हर्ब्स” (Adi Queen of Herbs) के नाम से जाना जाता है। उन्होंने अपना जीवन पारंपरिक आदि जनजातीय औषधीय ज्ञान को संरक्षित करने और लोगों तक पहुंचाने के लिए समर्पित किया है। वर्ष 2024 में भारत सरकार ने उन्हें चिकित्सा एवं सामाजिक सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए पद्मश्री सम्मान से अलंकृत किया।
जन्म एवं प्रारम्भिक जीवन
यानुंग जामोह लेगो का जन्म 9 जुलाई 1963 को अरुणाचल प्रदेश के ईस्ट सियांग जिले के सीका-टोडे (Sika Tode) गांव में हुआ था। बचपन से ही उनका झुकाव प्रकृति, वनस्पतियों और पारंपरिक चिकित्सा पद्धति की ओर था। उनके पिता समुदाय के प्रतिष्ठित लोक-चिकित्सक थे, जिनसे उन्होंने औषधीय पौधों और जड़ी-बूटियों का ज्ञान प्राप्त किया।
शिक्षा
पारंपरिक ज्ञान के साथ-साथ उन्होंने आधुनिक शिक्षा भी प्राप्त की। उन्होंने कृषि विज्ञान में उच्च शिक्षा हासिल की और बाद में Assam Agricultural University से कृषि विषय में अध्ययन किया। यही वैज्ञानिक दृष्टिकोण आगे चलकर उनके हर्बल चिकित्सा कार्यों का आधार बना।
सरकारी सेवा
वर्ष 1988 में उन्होंने अरुणाचल प्रदेश के कृषि विभाग में सेवा प्रारम्भ की। कृषि निरीक्षक से लेकर जिला कृषि अधिकारी तथा अन्य महत्वपूर्ण पदों पर कार्य करते हुए उन्होंने किसानों और ग्रामीण समुदायों के बीच कृषि एवं औषधीय पौधों के संरक्षण को बढ़ावा दिया। वर्ष 2023 में वे सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हुईं।
हर्बल चिकित्सा की यात्रा
हालाँकि वे सरकारी अधिकारी थीं, लेकिन उनकी वास्तविक पहचान एक हर्बल चिकित्सक के रूप में बनी। अपने पिता के मार्गदर्शन में लगभग 15 वर्षों तक प्रशिक्षण लेने के बाद उन्होंने 1995 से लोगों का उपचार करना शुरू किया। उन्होंने अरुणाचल प्रदेश के जंगलों में उपलब्ध औषधीय पौधों का अध्ययन कर विभिन्न रोगों के लिए पारंपरिक उपचार विकसित किए।
उनका दावा है कि उन्होंने कैंसर, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, किडनी रोग, त्वचा रोग तथा अन्य जटिल बीमारियों से पीड़ित हजारों लोगों का उपचार किया है। उनके क्लिनिक में देश के विभिन्न राज्यों से लोग परामर्श लेने आते हैं।
इंडिजिनस हर्बल हेरिटेज की स्थापना
वर्ष 2009 में उन्होंने “Indigenous Herbal Heritage” नामक संस्था की स्थापना की। इस संस्था का उद्देश्य पारंपरिक औषधीय ज्ञान का संरक्षण, औषधीय पौधों की खेती तथा नई पीढ़ी को हर्बल चिकित्सा के प्रति जागरूक करना है। संस्था के माध्यम से हजारों लोगों को प्रशिक्षण दिया गया और बड़ी संख्या में औषधीय पौधे लगाए गए।
जनसेवा और सामाजिक योगदान
यानुंग जामोह लेगो का मानना है कि प्रकृति में अधिकांश रोगों के उपचार की क्षमता मौजूद है। वे वर्षों से ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को कम लागत पर परामर्श और उपचार उपलब्ध कराती रही हैं। उनके प्रयासों से अरुणाचल प्रदेश की आदि जनजाति का पारंपरिक ज्ञान राष्ट्रीय स्तर पर पहचान प्राप्त कर सका।
पुरस्कार और सम्मान
उनकी सेवाओं के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए—
पद्मश्री (2024)
- अरुणाचल प्रदेश राज्य पुरस्कार
- एसआरआईएसटीआई सम्मान (SRISTI Samman)
- परम्परिका वैद्य रत्न पुरस्कार
- राज्य औषधीय पादप बोर्ड की सदस्यता
पद्मश्री सम्मान
भारत सरकार ने वर्ष 2024 में उन्हें पद्मश्री पुरस्कार प्रदान किया। यह सम्मान उन्हें पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली के संरक्षण, जनसेवा और हर्बल चिकित्सा के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए दिया गया। यह सम्मान न केवल उनके लिए बल्कि सम्पूर्ण अरुणाचल प्रदेश और पूर्वोत्तर भारत के लिए गौरव का विषय माना गया।
व्यक्तित्व और विचार
यानुंग जामोह लेगो का मानना है कि जंगल केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं बल्कि मानव स्वास्थ्य के सबसे बड़े संरक्षक हैं। वे औषधीय पौधों के संरक्षण, पर्यावरण सुरक्षा और पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक रूप से दस्तावेजीकृत करने की समर्थक हैं।
विरासत
आज यानुंग जामोह लेगो भारत की उन चुनिंदा महिलाओं में गिनी जाती हैं जिन्होंने जनजातीय परंपराओं को राष्ट्रीय पहचान दिलाई। वे हजारों लोगों के लिए प्रेरणा हैं और यह संदेश देती हैं कि पारंपरिक ज्ञान, यदि संरक्षित और विकसित किया जाए, तो समाज के लिए अमूल्य धरोहर बन सकता है।
संक्षेप में, पद्मश्री यानुंग जामोह लेगो एक ऐसी महिला हैं जिन्होंने आधुनिक शिक्षा और पारंपरिक जनजातीय ज्ञान का अद्भुत संगम प्रस्तुत किया। उनकी जीवन यात्रा सेवा, समर्पण, प्रकृति-प्रेम और मानवता की मिसाल है।