आचार्य हिमांशु गेरोला (श्रीमद्भागवत भागवत पुराण कथा व्यास)
पांडव नगर में महोत्सव का चतुर्थ दिवस; शिव पुराण में अहंकार त्याग, देवी भागवत में मातृशक्ति के सम्मान और भागवत कथा में आस्था, सत्य व धर्म के मार्ग पर चलने का आह्वान
मेरठ । सामुदायिक केंद्र, पांडव नगर में गढ़वाल सभा मेरठ के तत्वावधान में आयोजित श्री पंच महापुराण कथा ज्ञान महोत्सव के चतुर्थ दिवस भक्ति, अध्यात्म और सामाजिक संदेशों की त्रिवेणी देखने को मिली। विभिन्न कथा प्रसंगों के माध्यम से श्रद्धालुओं को सत्य, विनम्रता, मातृशक्ति के सम्मान, करुणा, धैर्य, आस्था और धर्म के मार्ग पर चलने का संदेश दिया गया। शिवलिंग की उत्पत्ति से लेकर मां की महिमा और भगवान श्रीकृष्ण के जन्म तक के प्रसंगों ने श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया।
शिवलिंग की उत्पत्ति के प्रसंग से दिया अहंकार त्यागने का संदेश
शिव पुराण कथा व्यास आचार्य विवेकानंद ढौंडियाल ने शिवलिंग की उत्पत्ति के प्रसंग का वर्णन करते हुए इसके आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व को समझाया। उन्होंने शिवपुराण के लिंगोद्भव प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद होने पर भगवान शिव अनंत ज्योतिर्मय अग्निस्तंभ के रूप में प्रकट हुए, जिसका न आदि दिखाई देता था और न अंत। कथा प्रसंग में ब्रह्मा उस ज्योति का ऊपरी छोर और विष्णु निचला छोर खोजने के लिए गए, लेकिन दोनों उसकी सीमा तक नहीं पहुंच सके। कथा व्यास ने कहा कि यह प्रसंग मनुष्य को केवल शिवलिंग की उत्पत्ति से परिचित नहीं कराता, बल्कि अहंकार से ऊपर उठकर सत्य स्वीकार करने की महत्वपूर्ण शिक्षा भी देता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य कितना भी ज्ञानी, शक्तिशाली अथवा बड़े पद पर क्यों न हो, उसे अहंकार से दूर रहना चाहिए। जहां अहंकार समाप्त होता है, वहीं से शिवत्व की शुरुआत होती है। जीवन में ज्ञान बढ़ने के साथ विनम्रता भी बढ़नी चाहिए। उन्होंने श्रद्धालुओं से विवाद में व्यक्तिगत विजय के बजाय सत्य को महत्व देने, असत्य और झूठी प्रतिष्ठा से बचने तथा एक-दूसरे के ज्ञान, पद और सामर्थ्य का सम्मान करने का आह्वान किया। संदेश दिया गया कि ‘मैं श्रेष्ठ हूं’ की भावना के स्थान पर ‘हम सभी समाज के लिए हैं’ की भावना विकसित होनी चाहिए।
शिवलिंग केवल पूजा का प्रतीक नहीं, आत्मचिंतन का भी संदेश
कथा में बताया गया कि शिवलिंग का अनंत स्वरूप मनुष्य को अपनी सोच व्यक्तिगत स्वार्थ तक सीमित नहीं रखने, बल्कि समाज और मानवता के कल्याण तक विस्तृत करने की प्रेरणा देता है। शिवलिंग को सत्य, अनंतता, सृजन, संतुलन और आत्मचिंतन के संदेश के रूप में समझाया गया।
संकट में सबसे पहले याद आती है मां: आचार्य अनिल मलासी
देवी भागवत पुराण कथा व्यास आचार्य अनिल मलासी ने मां की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि जब मनुष्य जीवन में संकट, पीड़ा या कठिन परिस्थितियों से घिरता है तो उसकी जुबान पर सबसे पहले ‘मां’ का नाम आता है। उन्होंने कहा कि मां केवल जन्म देने वाली नहीं, बल्कि ममता, करुणा, शक्ति और संरक्षण का स्वरूप हैं। जिस प्रकार बच्चा किसी संकट में बिना संकोच अपनी मां को पुकारता है, उसी प्रकार भक्त भी जीवन की कठिन परिस्थितियों में जगदम्बा की शरण में जाता है।
देवी उपासना के साथ नारी शक्ति का सम्मान भी जरूरी
आचार्य अनिल मलासी ने देवी उपासना के सामाजिक पक्ष पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इसका वास्तविक अर्थ केवल मंदिर में पूजा-अर्चना करना नहीं है। नारी शक्ति का सम्मान, माता-पिता की सेवा, जरूरतमंद की सहायता और समाज में करुणा का भाव विकसित करना भी देवी उपासना की भावना का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि जिस समाज में मातृशक्ति का सम्मान होता है, वहां संस्कार, सुरक्षा और समृद्धि का वास होता है। मनुष्य को केवल संकट के समय ही भगवान और मां का स्मरण नहीं करना चाहिए, बल्कि सुख के समय भी ईश्वर के प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए। साथ ही अपने आसपास संकट में फंसे लोगों के लिए सहारा बनने का प्रयास करना चाहिए।
श्रीकृष्ण जन्म प्रसंग सुन भाव-विभोर हुए श्रद्धालु
चतुर्थ दिवस भागवत कथा व्यास आचार्य हिमांशु गैरोला ने भगवान श्रीकृष्ण के जन्म प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का अवतार धर्म की स्थापना, अधर्म के विनाश और मानवता को सत्य एवं सदाचार का मार्ग दिखाने के लिए हुआ। उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण जन्म का प्रसंग केवल धार्मिक उत्सव का विषय नहीं है, बल्कि जीवन में आशा, विश्वास और धैर्य बनाए रखने की प्रेरणा देता है। मनुष्य के जीवन में कितना भी कठिन समय क्यों न आए, उसे धैर्य नहीं खोना चाहिए।
विपरीत परिस्थितियों में भी बनाए रखें ईश्वर पर विश्वास
आचार्य हिमांशु गैरोला ने देवकी और वसुदेव के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में भी भगवान पर अपना विश्वास बनाए रखा। इसी प्रकार मनुष्य को संकट के समय घबराने के बजाय ईश्वर में आस्था रखते हुए सत्य और धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ते रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि वर्तमान समाज को भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से धैर्य, कर्म, सत्य, प्रेम, कर्तव्य और धर्मनिष्ठा की शिक्षा लेने की आवश्यकता है। कठिन परिस्थितियां हमेशा नहीं रहतीं। मनुष्य का विश्वास और संकल्प मजबूत हो तो अंधकार के बाद प्रकाश का मार्ग अवश्य खुलता है। भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का प्रसंग आते ही कथा स्थल का वातावरण भक्तिमय हो गया। श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे और पूरा पंडाल “नंद के घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की” के जयघोष से गूंज उठा। महोत्सव के चतुर्थ दिवस की कथाओं ने धार्मिक प्रसंगों के साथ समाज में सत्य, विनम्रता, नारी सम्मान, सेवा, धैर्य और मानव कल्याण की भावना अपनाने का संदेश दिया।