40 वर्षों से पेंटिंग के सहारे परिवार पाल रहे हरीश कुमार
मेरठ। कभी शहर की दीवारों, दुकानों के बोर्डों और चुनावी बैनरों पर अपनी कला के रंग बिखेरने वाले 60 वर्षीय हरीश कुमार आज जीवन के उस मोड़ पर खड़े हैं, जहां मेहनत तो उतनी ही है, लेकिन काम पहले जैसा नहीं रहा। मेरठ के कंकरखेड़ा निवासी हरीश कुमार पिछले लगभग 40 वर्षों से पेंटिंग का कार्य कर रहे हैं। सातवीं कक्षा तक पढ़े हरीश ने यह कला किसी गुरु से नहीं सीखी, बल्कि अपने संघर्ष और लगन के दम पर खुद ही सीखी और उसे आजीविका का साधन बनाया।
एक समय था जब बाजार में दुकानों के साइन बोर्ड, होर्डिंग और प्रचार सामग्री हाथों से बनाई जाती थी। तब हरीश कुमार जैसे कलाकारों की खूब मांग रहती थी। उनकी कला ही उनकी पहचान थी और उसी से परिवार की रोजी-रोटी चलती थी। लेकिन समय बदला, तकनीक आई और कंप्यूटराइज्ड डिजाइन तथा फ्लेक्स प्रिंटिंग ने पारंपरिक पेंटिंग को लगभग हाशिए पर पहुंचा दिया।
हरीश कुमार बताते हैं कि जब से फ्लेक्स और कंप्यूटर डिजाइन का दौर शुरू हुआ है, तब से उनके काम में लगातार गिरावट आई है। लोग कम समय और कम लागत में तैयार होने वाले फ्लेक्स बैनरों को प्राथमिकता देने लगे हैं। ऐसे में हाथों से पेंटिंग करने वाले कलाकारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
वह कहते हैं, “पहले काम की कोई कमी नहीं थी। अब कई-कई दिन काम नहीं मिलता। अगर किसी महीने काम मिल भी जाए तो 10 से 12 हजार रुपये तक कमा लेते हैं, लेकिन यह आय पूरे परिवार के लिए पर्याप्त नहीं है। किसी तरह घर का खर्च चल रहा है।”
हरीश कुमार के परिवार में उनकी पत्नी सुधा और तीन बेटे हैं। बड़े बेटे अमन और हनी बेरोजगार हैं, जबकि तीसरा बेटा मनगू अभी पढ़ाई कर रहा है। एक पिता होने के नाते उनकी सबसे बड़ी चिंता अपने बच्चों का भविष्य है। आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने अपने बेटों को पेंटिंग का काम नहीं सिखाया। इसके पीछे भी एक दर्द छिपा है।
वे भावुक होकर कहते हैं, “जब मुझे ही काम नहीं मिल रहा, तो बच्चों को यह काम सिखाकर उनके भविष्य को अंधेरे में क्यों डालूं? चाहता हूं कि उन्हें कोई अच्छी नौकरी या रोजगार मिल जाए, ताकि उनका जीवन संघर्षों में न बीते।”
हरीश कुमार का पूरा कार्यक्षेत्र केवल मेरठ तक सीमित है। बढ़ती उम्र और घटते काम के बीच वह रोज सुबह इस उम्मीद के साथ निकलते हैं कि शायद आज कोई काम मिल जाए। उनके लिए हर दिन एक नई उम्मीद और नई चिंता लेकर आता है।
तकनीकी विकास ने जहां अनेक नए अवसर पैदा किए हैं, वहीं हरीश कुमार जैसे हजारों पारंपरिक कलाकारों की जीविका भी प्रभावित की है। आधुनिक मशीनों और डिजिटल तकनीक के सामने उनकी कला धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच रही है। वर्षों की मेहनत और अनुभव के बावजूद आज वे असुरक्षा और आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं।
सरकार और समाज से उनकी अपेक्षा बहुत बड़ी नहीं है। उनकी सबसे बड़ी मांग केवल इतनी है कि उनके बच्चों को रोजगार का कोई अवसर मिल जाए, ताकि परिवार का भविष्य सुरक्षित हो सके। वे चाहते हैं कि सरकार पारंपरिक कलाकारों और हस्तकला से जुड़े लोगों के लिए ऐसी योजनाएं बनाए, जिससे उनकी कला भी जीवित रहे और उनका जीवन भी सम्मानपूर्वक चल सके।
हरीश कुमार की कहानी केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि उन हजारों पारंपरिक कलाकारों का दर्द है, जिनकी कला को कभी समाज ने सराहा था, लेकिन आज वे बदलते समय की दौड़ में पीछे छूटते जा रहे हैं। उनके हाथों में आज भी रंग हैं, लेकिन भविष्य की तस्वीर धुंधली होती जा रही है।