थापर नगर स्थित आर्य समाज मंदिर में प्रवचन करते गुरु राजेश सेठी जी
मेरठ। आर्य समाज थापर नगर में आयोजित रविवारीय सत्संग में ‘वैदिक शिक्षा पद्धति ही श्रेष्ठ क्यों’ विषय पर विस्तार से विचार रखे गए। इस अवसर पर राजेश सेठी ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल विद्यार्थियों को जीविका कमाने के लिए किसी व्यवसाय के योग्य बनाना नहीं होना चाहिए, बल्कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिससे बालक का शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक विकास हो सके। उन्होंने कहा कि वैदिक शिक्षा पद्धति में शिक्षा को व्यक्ति के सर्वांगीण विकास का माध्यम माना गया है।
शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण और राष्ट्र सेवा
राजेश सेठी ने कहा कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में विद्यार्थियों को मुख्य रूप से रोजगार और व्यवसाय के लिए तैयार करने पर जोर दिया जाता है, जबकि वैदिक शिक्षा पद्धति का उद्देश्य इससे कहीं व्यापक था। वैदिक शिक्षा के माध्यम से बालक को समाज की उन्नति, राष्ट्र की रक्षा और पारिवारिक दायित्वों के निर्वहन के योग्य बनाने पर विशेष ध्यान दिया जाता था। उन्होंने कहा कि शिक्षा का मूल उद्देश्य ऐसा मनुष्य तैयार करना होना चाहिए, जो ज्ञान के साथ-साथ संस्कार, अनुशासन, कर्तव्यबोध और चरित्र से भी संपन्न हो।
उन्होंने वैदिक विचारधारा में वर्णित ‘मनुर्भव’ अर्थात श्रेष्ठ मनुष्य बनने की भावना का उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षा का लक्ष्य केवल ज्ञान अर्जित करना नहीं, बल्कि व्यक्ति को एक आदर्श एवं जिम्मेदार नागरिक के रूप में विकसित करना होना चाहिए।
गुरुकुल में मिलता था प्राकृतिक और आध्यात्मिक वातावरण
राजेश सेठी ने वैदिक काल की गुरुकुल व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय विद्यार्थी अपने पारिवारिक और सांसारिक उलझनों से दूर रहकर गुरु के सानिध्य में शिक्षा ग्रहण करते थे। गुरुकुलों का वातावरण प्राकृतिक एवं आध्यात्मिक होता था, जहां विद्यार्थियों के मानसिक, शारीरिक और बौद्धिक विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध रहती थीं।
उन्होंने कहा कि आचार्य अपने शिष्यों को केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं देते थे, बल्कि उनके व्यक्तित्व के प्रत्येक पक्ष के विकास पर ध्यान केंद्रित करते थे। गुरु और शिष्य के बीच आत्मीय संबंध होता था तथा ब्रह्मचारी गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए शिक्षा और ज्ञान को ग्रहण करने के लिए सदैव तत्पर रहता था। इस व्यवस्था का परिणाम चरित्रवान, अनुशासित और जिम्मेदार युवाओं के रूप में सामने आता था।
शिक्षा को व्यवसाय नहीं, समाज और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य माना गया
उद्बोधन में कहा गया कि वैदिक काल में शिक्षा प्रदान करना केवल व्यवसाय नहीं माना जाता था, बल्कि इसे समाज और राष्ट्र के प्रति एक महत्वपूर्ण कर्तव्य समझा जाता था। आचार्य अपने शिष्यों के ज्ञान, संस्कार और व्यक्तित्व निर्माण को अपनी जिम्मेदारी मानकर कार्य करते थे। वहीं ब्रह्मचारी भी ज्ञान प्राप्ति के प्रति समर्पित रहते थे।
उन्होंने कहा कि वैदिक गुरुकुल व्यवस्था में शिक्षा के साथ अनुशासन, संयम, सेवा, कर्तव्य और संस्कारों को विशेष महत्व दिया जाता था। यही कारण था कि गुरुकुल से शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थी जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में सक्षम बनते थे।
गुरुकुल और वैदिक शिक्षा को बढ़ावा देने का आह्वान
राजेश सेठी ने कहा कि वर्तमान समय में विद्यार्थियों के सामने शिक्षा के साथ अनेक सामाजिक और अन्य प्रकार की चुनौतियां भी हैं। ऐसे में वैदिक शिक्षा पद्धति में निहित संस्कार, अनुशासन और चरित्र निर्माण के तत्वों को समझना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि समाज के सभी लोगों को मिलकर वैदिक शिक्षा पद्धति और गुरुकुलों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने आह्वान किया कि वैदिक शिक्षा के प्रचार-प्रसार और गुरुकुलों के विकास के लिए समाज को तन, मन और धन से सहयोग करना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियों को ज्ञान के साथ संस्कार और जिम्मेदारी का बोध भी कराया जा सके।
भजनों से भक्तिमय हुआ सत्संग
रविवारीय सत्संग के दौरान प्रीति सेठी, धर्मवीर, चांद ग्रोवर, ऋचा सेठी और सुधा सिंह सहित अन्य ने सुंदर भजनों की प्रस्तुति दी। भजनों के दौरान वातावरण भक्तिमय हो गया और उपस्थित श्रद्धालुओं ने आध्यात्मिक भाव के साथ कार्यक्रम में सहभागिता की।
आचार्य सत्य प्रकाश शास्त्री के ब्रह्मत्व में देवयज्ञ संपन्न
कार्यक्रम में आचार्य सत्य प्रकाश शास्त्री के ब्रह्मत्व में देवयज्ञ भी संपन्न कराया गया। देवयज्ञ में श्री धर्मवीर और लोकेंद्र सिंह यजमान रहे। वैदिक मंत्रोच्चार और यज्ञ की विधि के माध्यम से उपस्थित लोगों ने आध्यात्मिक वातावरण में सहभागिता की।
बड़ी संख्या में लोग रहे मौजूद
कार्यक्रम में नरेन्द्र कालरा, विक्रम सोंधी, करुणा सागर बाली, आशीष सेठी, विजय बंसल, डॉ. प्रवीण चोपड़ा, प्रदीप सिंघल सहित अन्य लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम के दौरान वैदिक शिक्षा, संस्कार और गुरुकुल परंपरा को आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।