बाबा महेंद्र सिंह टिकैत (किसानों के मसीहा)
जन्म से लेकर भारतीय किसान यूनियन के नेतृत्व, करमूखेड़ी, मेरठ और दिल्ली के ऐतिहासिक किसान आंदोलनों तक—सादगी, पंचायत परंपरा और किसान हितों के संघर्ष ने महेंद्र सिंह टिकैत को दिलाई अलग पहचान
विशेष आलेख। भारतीय किसान आंदोलनों के इतिहास में चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत का नाम प्रमुख किसान नेताओं में लिया जाता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के छोटे से कस्बे सिसौली से निकलकर उन्होंने किसानों की समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनाया। समर्थकों के बीच ‘बाबा टिकैत’ और ‘किसानों के मसीहा’ के नाम से लोकप्रिय महेंद्र सिंह टिकैत ने बिजली दर, गन्ना मूल्य, कृषि ऋण, सिंचाई और किसानों से जुड़े अन्य मुद्दों पर अनेक आंदोलनों का नेतृत्व किया। उनका जन्म 6 अक्टूबर 1935 को सिसौली में हुआ और 15 मई 2011 को उनका निधन हुआ।
सिसौली में जन्म, कम उम्र में मिली सामाजिक जिम्मेदारी
महेंद्र सिंह टिकैत का जन्म बालियान खाप के मुखिया चौहल सिंह टिकैत और मुख्त्यारी देवी के परिवार में हुआ था। पिता के निधन के बाद बहुत कम उम्र में ही उन्हें बालियान खाप से जुड़ी जिम्मेदारी संभालनी पड़ी। विभिन्न विवरणों के अनुसार वह करीब आठ वर्ष की उम्र में खाप के चौधरी बने। ग्रामीण परिवेश और पंचायत व्यवस्था से उनका जुड़ाव आगे चलकर उनके किसान नेतृत्व की महत्वपूर्ण विशेषता बना।
टिकैत की पहचान केवल किसान समस्याओं को उठाने तक सीमित नहीं रही। वह पंचायतों के माध्यम से दहेज प्रथा, मृत्यु भोज, नशाखोरी और अन्य सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ भी आवाज उठाते रहे। उनकी कार्यशैली में गांव की चौपाल और पंचायत का विशेष महत्व था।

भारतीय किसान यूनियन और टिकैत का नेतृत्व
1980 के दशक के मध्य में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कृषि बिजली दरों और किसानों की दूसरी समस्याओं को लेकर असंतोष बढ़ रहा था। इसी दौर में भारतीय किसान यूनियन के संगठन को टिकैत के नेतृत्व में व्यापक किसान आधार मिला। उपलब्ध विवरणों के अनुसार 17 अक्टूबर 1986 को सिसौली में हुई पंचायत में महेंद्र सिंह टिकैत को संगठन का अध्यक्ष बनाया गया। इसके बाद किसानों की स्थानीय समस्याओं को संगठित तरीके से उठाने का सिलसिला तेज हुआ।
टिकैत के नेतृत्व की एक खास बात किसान संगठन को दलगत राजनीति से अलग रखने पर उनका जोर था। आंदोलन में किसान की पहचान को प्राथमिकता दी जाती थी और पंचायतों के माध्यम से सामूहिक निर्णय लेने की परंपरा को महत्व मिला।
करमूखेड़ी आंदोलन से मिली बड़ी पहचान
वर्ष 1987 टिकैत के किसान आंदोलन के लिए निर्णायक साबित हुआ। बिजली से जुड़ी समस्याओं और बढ़ी दरों के विरोध में किसानों ने करमूखेड़ी बिजलीघर को केंद्र बनाकर आंदोलन किया। 1 मार्च 1987 की महापंचायत के दौरान स्थिति तनावपूर्ण हुई और पुलिस फायरिंग में दो किसानों की मौत हुई। इस घटनाक्रम के बाद भारतीय किसान यूनियन और महेंद्र सिंह टिकैत का आंदोलन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तेजी से व्यापक हुआ।
इसके बाद किसान आंदोलन में बिजली के साथ गन्ना मूल्य, कृषि ऋण, सिंचाई और दूसरी आर्थिक मांगें भी प्रमुखता से शामिल होती चली गईं।
मेरठ कमिश्नरी आंदोलन ने दिखाई किसान एकता
महेंद्र सिंह टिकैत के राजनीतिक-सामाजिक जीवन में 1988 का मेरठ आंदोलन विशेष महत्व रखता है। जनवरी 1988 में बड़ी संख्या में किसान मेरठ पहुंचे और कमिश्नरी क्षेत्र में लंबे समय तक धरना दिया। किसानों की मांगों में गन्ने का लाभकारी मूल्य, बिजली संबंधी समस्याएं, कृषि ऋण और खेती से जुड़े दूसरे विषय शामिल थे। यह आंदोलन कई सप्ताह चला और टिकैत की पहचान उत्तर भारत के बड़े किसान नेता के रूप में मजबूत हुई।
इस आंदोलन की एक खासियत यह थी कि बड़ी संख्या में किसान लंबे समय तक धरनास्थल पर डटे रहे। किसानों ने वहीं भोजन की व्यवस्था की और ग्रामीण जीवन की पंचायत शैली आंदोलन स्थल पर भी दिखाई दी।
1988 का दिल्ली बोट क्लब आंदोलन बना ऐतिहासिक पड़ाव
मेरठ के बाद महेंद्र सिंह टिकैत ने दिल्ली में किसानों की ताकत दिखाई। 25 अक्टूबर 1988 से दिल्ली के बोट क्लब क्षेत्र में विशाल किसान आंदोलन शुरू हुआ। उपलब्ध स्रोतों के अनुसार इसमें लाखों किसानों ने हिस्सा लिया और विजय चौक से इंडिया गेट तक का इलाका किसान आंदोलन का केंद्र बन गया। यह धरना 31 अक्टूबर तक चला।
इस आंदोलन के दौरान गन्ने के बेहतर मूल्य, बिजली बिल और किसानों की अन्य आर्थिक मांगें प्रमुखता से उठाई गईं। बोट क्लब आंदोलन ने महेंद्र सिंह टिकैत को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित कर दिया और यह भारतीय किसान आंदोलनों के महत्वपूर्ण अध्यायों में शामिल हो गया।

गन्ना मूल्य, बिजली और कृषि ऋण बने संघर्ष के प्रमुख मुद्दे
टिकैत ने अपने किसान आंदोलनों में उन समस्याओं पर जोर दिया जिनका सीधा संबंध खेती की लागत और किसान की आमदनी से था। इनमें गन्ने के बेहतर मूल्य, बिजली दरों में राहत, कृषि ऋण, सिंचाई और अधिग्रहीत कृषि भूमि के उचित मुआवजे जैसे मुद्दे शामिल रहे।
1990 में लखनऊ में भी उनके नेतृत्व में बड़ा किसान आंदोलन हुआ। भारतीय किसान यूनियन के अनुसार इस आंदोलन में गन्ने के अधिक मूल्य और बिजली देयों में राहत जैसी मांगें उठाई गईं। 1992 में कृषि ऋण माफी तथा गाजियाबाद में भूमि अधिग्रहण के बेहतर मुआवजे से संबंधित आंदोलन भी किए गए।
सादगी बनी बाबा टिकैत की पहचान
बड़े किसान नेता बनने के बावजूद महेंद्र सिंह टिकैत की सार्वजनिक छवि ग्रामीण सादगी से जुड़ी रही। सामान्य पहनावा, कंधे पर चादर, हवाई चप्पल और हुक्का उनकी पहचान के रूप में चर्चित रहे। वह अपनी बात ग्रामीण बोलचाल की सहज भाषा में रखते थे, जिसके कारण किसान उनसे सीधे जुड़ाव महसूस करते थे।
उनके आंदोलनों की शक्ति बड़ी सभाओं के साथ गांव-गांव फैली पंचायत व्यवस्था थी। किसानों को संगठित करने के लिए चौपाल, पंचायत और महापंचायत जैसे परंपरागत माध्यमों का उन्होंने व्यापक इस्तेमाल किया।
सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ भी उठाई आवाज
किसान हितों के अतिरिक्त टिकैत सामाजिक सुधार से जुड़े विषयों को भी पंचायतों में उठाते रहे। दहेज प्रथा, नशाखोरी, मृत्यु भोज और भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध अभियानों का उल्लेख उनके जीवन से जुड़े विवरणों में मिलता है। इस कारण उनका प्रभाव केवल खेती-किसानी से जुड़े आर्थिक आंदोलनों तक सीमित नहीं रहा।
परिवार और किसान आंदोलन की विरासत
महेंद्र सिंह टिकैत का विवाह बलजोरी देवी से हुआ था और उनके छह बच्चे थे। उनके निधन के बाद परिवार के सदस्य भी किसान संगठन से जुड़े रहे। वर्तमान भारतीय किसान यूनियन की आधिकारिक जानकारी में नरेश टिकैत और राकेश टिकैत संगठन से जुड़े प्रमुख नामों के रूप में सामने आते हैं।
15 मई 2011 को हुआ निधन
करीब छह दशकों तक सामाजिक और किसान गतिविधियों से जुड़े रहे महेंद्र सिंह टिकैत का 15 मई 2011 को मुजफ्फरनगर में निधन हो गया। वह 75 वर्ष के थे। उनके निधन के साथ भारतीय किसान आंदोलन के एक महत्वपूर्ण दौर का अंत हुआ, लेकिन उनके नेतृत्व में विकसित महापंचायत और सामूहिक किसान आंदोलन की शैली बाद के वर्षों में भी दिखाई देती रही।
क्यों आज भी याद किए जाते हैं बाबा टिकैत?
महेंद्र सिंह टिकैत की विरासत को केवल उनके द्वारा किए गए आंदोलनों की संख्या से नहीं समझा जा सकता। उनकी बड़ी भूमिका गांवों में रहने वाले किसानों की आर्थिक समस्याओं को सार्वजनिक और राष्ट्रीय विमर्श तक पहुंचाने में थी। उन्होंने किसान पंचायतों को संगठन का माध्यम बनाया और खेती की लागत, फसल मूल्य, बिजली, ऋण तथा भूमि जैसे विषयों को बड़े आंदोलनों से जोड़ा।
6 अक्टूबर 1935 को सिसौली में जन्मे महेंद्र सिंह टिकैत की जीवनयात्रा 15 मई 2011 को समाप्त हुई, लेकिन सिसौली से मेरठ और दिल्ली तक उनके नेतृत्व में हुए किसान आंदोलन आज भी उत्तर भारत के किसान आंदोलन के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यही कारण है कि उनके समर्थक आज भी उन्हें सम्मान से ‘बाबा टिकैत’ और ‘किसानों का मसीहा’ कहकर याद करते हैं।