कथाव्यास प्रो. पूनम लखनपाल
मेरठ, 18 अगस्त 2026। शास्त्रीनगर में प्रो. सुधाकराचार्य त्रिपाठी जी की प्रेरणा से उनके निज निवास पर सामवेद की नवमी कथा का शुभारंभ हुआ। सात दिवसीय इस कथा के प्रथम दिन कथाव्यास प्रो. पूनम लखनपाल ने सामवेद के सप्तम एवं अष्टम प्रपाठक से संबंधित मंत्रों की व्याख्या करते हुए दैनिक जीवन और दिनचर्या से जुड़े विभिन्न आध्यात्मिक विषयों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
कथा के प्रथम दिवस सामवेद के मंत्र “अञ्जते व्यञ्जते समञ्जते क्रतुं रिहन्ति मध्वाभ्यञ्जते” का गुञ्जार हुआ। वैदिक मंत्रों के गायन और व्याख्या के बीच उपस्थित श्रद्धालुओं एवं श्रोताओं ने भी स्वर मिलाकर वातावरण को आध्यात्मिक बना दिया।
पुनर्जन्म के रहस्य से लेकर दिनचर्या तक सामवेद का संदेश
कथाव्यास प्रो. पूनम लखनपाल ने कहा कि सामवेद केवल आध्यात्मिक और दार्शनिक रहस्यों का प्रतिपादन करने वाला ग्रंथ ही नहीं है, बल्कि इसमें मानव जीवन से जुड़े अनेक सामान्य दिखाई देने वाले, लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण विषयों का भी विवेचन मिलता है। सामवेद पुनर्जन्म जैसे गूढ़ विषयों पर प्रकाश डालने के साथ-साथ मनुष्य की दैनिक दिनचर्या को भी व्यवस्थित और सार्थक बनाने का संदेश देता है।
उन्होंने बताया कि सामवेद की इस सप्तदिवसीय नवमी कथा में मुख्य रूप से दिनचर्या के विषय पर चर्चा की जाएगी। प्रथम दिवस इन्द्र, पवमान सोम, अग्नि और विश्वेदेवा से संबंधित मंत्रों के माध्यम से दिनचर्या के विभिन्न पक्षों को समझाया गया।
बारह आदित्य और समय विभाजन को चित्रों से समझाया
कथा के दौरान डॉ. पूनम ने श्रीमद्भागवत पुराण में वर्णित बारह आदित्यों और सप्तगणों की अवधारणा को चित्रों के माध्यम से समझाया। उन्होंने बताया कि बारह आदित्यों और सूर्य की बारह संक्रांतियों के आधार पर चैत्र, वैशाख आदि बारह मासों की संरचना को समझा जा सकता है।
उन्होंने सूर्य के 360 डिग्री के चक्र को दिन और रात के समय विभाजन से जोड़ते हुए बताया कि 180 डिग्री का चक्र दिन तथा 180 डिग्री का चक्र रात्रि से संबंधित माना गया है। दिन को पूर्वाह्न, मध्याह्न, अपराह्न और सायंकाल तथा रात्रि को प्रदोष, निशीथ, त्रियामा और उषा काल में विभाजित करते हुए कुल आठ प्रहरों की अवधारणा समझाई गई।
कथा में बताया गया कि इस प्रकार समय की विभिन्न अवस्थाओं को आदित्यों के क्रम से भी जोड़ा गया है। प्रथम दिवस धाता और अर्यमन नामक दो आदित्यों तथा उनसे जुड़े गणों—ऋषि, यक्ष, गंधर्व, नाग, राक्षस और अप्सरा—के संबंध में भी विस्तार से जानकारी दी गई।
सूर्य को बताया दिनचर्या का आधार
कथाव्यास ने सूर्य के विभिन्न नामों की व्युत्पत्ति समझाते हुए सूर्य को मानव जीवन की दिनचर्या का प्रमुख आधार बताया। उन्होंने “अग्नि सूर्य है और सूर्य अग्नि है” की वैदिक अवधारणा को समझाते हुए सूर्य और अग्नि के संबंध पर प्रकाश डाला।
पूर्वाह्न के समय में आकाश और सूर्य के बदलते स्वरूप का वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि प्रकृति में होने वाले परिवर्तन मानव की दिनचर्या को भी प्रभावित करते हैं। इस दौरान उन्होंने विभिन्न लौकिक उदाहरणों के माध्यम से वैदिक अवधारणाओं को सरल और सहज ढंग से श्रोताओं के सामने प्रस्तुत किया।
वैदिक मंत्रों को दैनिक जीवन से जोड़ा
सप्तम प्रपाठक के प्रथम भाग के मंत्रों में आए विभिन्न पदों और अवधारणाओं की व्याख्या करते हुए प्रो. पूनम ने उन्हें दैनिक जीवन से जोड़ने का प्रयास किया। उन्होंने अरुषी, ईशान, सविता, सूर्य, रत्न, मणि और वरेण्य जैसे शब्दों के अर्थ एवं संदर्भ को समझाया तथा बताया कि वैदिक साहित्य में वर्णित प्रतीकों को मानव जीवन और उसकी दिनचर्या के साथ किस प्रकार जोड़ा जा सकता है।
उनकी व्याख्या के दौरान श्रोताओं ने वैदिक मंत्रों के आध्यात्मिक एवं व्यवहारिक पक्ष को समझा। कथा में मंत्रों और स्तुतियों का सामूहिक गान भी हुआ, जिसमें सभा में उपस्थित श्रोताओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।
मंत्रों के गान से आध्यात्मिक वातावरण
कथा के दौरान विभिन्न वैदिक मंत्रों का गान किया गया। इनमें इन्द्र, अग्नि, सोम और अन्य देवताओं की स्तुतियों से संबंधित मंत्र शामिल रहे। मंत्रोच्चार के साथ उपस्थित श्रोताओं की सहभागिता ने कार्यक्रम को भक्तिमय और आध्यात्मिक स्वरूप प्रदान किया।
कथा में प्रस्तुत मंत्रों के माध्यम से सत्य, प्रकाश, शक्ति, ज्ञान, कर्म और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा जैसे विषयों पर भी संकेतात्मक रूप से चर्चा की गई। वैदिक मंत्रों के गान और उनकी व्याख्या के माध्यम से श्रोताओं को सामवेद की विशिष्ट गायन परंपरा और उसके दार्शनिक पक्ष से परिचित कराया गया।
सामवेद की ‘पाञ्चजनी’ परंपरा की झलक
आयोजकों के अनुसार प्रथम दिवस की कथा में सामवेद की नवीन और पाञ्चजनी कथा का स्वरूप देखने को मिला। वैदिक मंत्रों की व्याख्या को दैनिक जीवन की परिस्थितियों से जोड़कर प्रस्तुत किए जाने से कथा का स्वरूप श्रोताओं के लिए सहज और रोचक बना रहा।
सात दिवसीय इस नवमी कथा के आगामी दिनों में भी सामवेद के विभिन्न मंत्रों और उनके जीवनोपयोगी पक्षों पर विस्तार से चर्चा की जाएगी। आयोजन का उद्देश्य वैदिक ज्ञान को सरल भाषा में समाज तक पहुंचाना और प्राचीन वैदिक परंपराओं के जीवनोपयोगी संदेशों से नई पीढ़ी को परिचित कराना है।
कथा में प्रस्तुत प्रमुख मंत्र
कथा के प्रथम दिवस इन्द्र, अग्नि, सोम और पवमान से संबंधित अनेक मंत्रों का गान और व्याख्या की गई। इनमें प्रमुख रूप से “अभि प्र गोपतिं गिरा इन्द्रमर्च यथा सुविदे…”, “अहमिद्धि पितुष्परि मेधामृतस्य जग्रहे…”, “अग्ने विश्वेभिरग्निभिर्जोषि ब्रह्म सहस्कृत…”, “त्वं सोम प्रथमा वृक्तबर्हिषो महे वाजाय…”, “ऋषिरग्निः पवमानः पाञ्चजन्यः पुरोहितः…” तथा “अग्निं हिन्वन्तु नो धियः सप्तिमाशुमिवाजिषु…” जैसे मंत्रों का पाठ किया गया।
सामवेद की नवमी कथा के प्रथम दिवस वैदिक मंत्रों के गान, उनकी व्याख्या और दैनिक जीवन से उनके संबंध को समझाने के माध्यम से श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ज्ञान के साथ जीवनचर्या को अनुशासित और सार्थक बनाने का संदेश दिया गया।