गन्ने के रस से 99.5% शुद्ध इथेनॉल बनने की तकनीक और किस तरह यह पेट्रोल का विकल्प बनकर मोटरसाइकिल, कार और बसों को चलाने की प्रक्रिया
बायो-इथेनॉल और हरित ऊर्जा का उदय
वर्तमान समय में बढ़ते प्रदूषण और कच्चे तेल (पेट्रोल/डीजल) की सीमित उपलब्धता को देखते हुए दुनिया भर में स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) के विकल्पों पर जोर दिया जा रहा है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में गन्ने से इथेनॉल (Sugarcane Ethanol) का निर्माण एक अत्यंत क्रांतिकारी और टिकाऊ कदम साबित हो रहा है। बायो-इथेनॉल एक हरित ईंधन (Green Fuel) है, जो पारंपरिक जीवाश्म ईंधनों की तुलना में कार्बन उत्सर्जन को काफी हद तक कम करता है। गन्ने से इथेनॉल बनाने से न केवल विदेशों से कच्चे तेल के आयात पर देश की निर्भरता कम होती है, बल्कि देश के लाखों गन्ना किसानों को उनकी फसल का बेहतर और सही समय पर मूल्य भी मिलता है। गन्ने के रस को वाहन चलाने योग्य निर्जल इथेनॉल (Anhydrous Ethanol) में बदलने की प्रक्रिया एक सुनियोजित जैव-रासायनिक (Biochemical) तकनीक पर आधारित है।
इसे मुख्य रूप से चार प्रमुख चरणों में पूरा किया जाता है:
चरण 1: पेराई एवं रस निष्कर्षण (Crushing & Juice Extraction)
खेतों से काटे गए गन्ने को चीनी मिलों व डिस्टिलरी में लाकर हैवी क्रशर मशीनों द्वारा पेरा जाता है। इससे मीठा गन्ने का रस अलग हो जाता है। रस निकालने के बाद जो सूखा रेशेदार छिलका बचता है, उसे ‘खोई’ (Bagasse) कहते हैं। इस खोई का उपयोग बॉयलरों में ईंधन के रूप में किया जाता है, जिससे उत्पन्न भाप से टर्बाइन चलाकर बिजली बनाई जाती है।
चरण 2: किण्वन प्रक्रिया (Fermentation)
गन्ने के रस या चीनी बनाने के दौरान बनने वाले गाढ़े उपोत्पाद ‘शीरे’ (Molasses) को फर्मेंटेशन टैंकों में एकत्र किया जाता है। इसमें विशेष प्रकार का यीस्ट (Saccharomyces cerevisiae) मिलाया जाता है। यह यीस्ट शर्करा (Sucrose/Glucose) को खाकर उसे एथिल अल्कोहल (इथेनॉल) और कार्बन डाइऑक्साइड (CO_2) में बदल देता है। इस प्रक्रिया में लगभग 24 से 72 घंटे का समय लगता है।
आसवन (Distillation)
किण्वन के बाद प्राप्त घोल (Wash) में इथेनॉल की मात्रा केवल 8% से 12% होती है, जबकि शेष पानी और अन्य घटक होते हैं। इसे डिस्टिलेशन कॉलम में ले जाकर उबाला जाता है। चूंकि इथेनॉल का क्वथनांक (Boiling Point) पानी से कम (लगभग 78.37°C) होता है, इसलिए इथेनॉल की भाप पहले बनकर ऊपर उठती है। इसे ठंडा करके एकत्र कर लिया जाता है। इस चरण में 95% शुद्ध इथेनॉल (Rectified Spirit) प्राप्त होता है।
निर्जलीकरण (Dehydration to Anhydrous Ethanol)
वाहनों में ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने के लिए इथेनॉल का पूरी तरह से पानी से मुक्त होना अनिवार्य है। इसके लिए ‘मॉलेक्यूलर सीव डिहाइड्रेशन टेक्नोलॉजी’ (MSDH) का प्रयोग किया जाता है, जो बचे हुए 5% पानी को भी सोख लेती है। इसके बाद 99.5%+ शुद्ध निर्जल इथेनॉल (Anhydrous Ethanol) प्राप्त होता है, जो पेट्रोल में मिलाने के लिए तैयार होता है।
वाहनों में इथेनॉल का प्रयोग (बाइक, कार और बसें)
वाहनों में इथेनॉल का प्रयोग मुख्य रूप से दो रूपों में होता है — इथेनॉल ब्लेंडिंग (मिश्रण) और फ्लेक्स-फ्यूल (Flex-Fuel) तकनीक।
इथेनॉल मिश्रण और वाहन अनुकूलता सारणी:
| ईंधन का प्रकार | इथेनॉल का अनुपात | वाहनों में उपयोगिता | तकनीकी आवश्यकता |
|---|---|---|---|
| E10 | 10% इथेनॉल + 90% पेट्रोल | पुरानी व नई सभी गाड़ियों में उपयुक्त | किसी बदलाव की आवश्यकता नहीं |
| E20 | 20% इथेनॉल + 80% पेट्रोल | आधुनिक BS6 एवं E20-Compliant वाहन | रबर व मेटल पार्ट्स में सामान्य बदलाव |
| E85 / E100 | 85% से 100% शुद्ध इथेनॉल | फ्लेक्स-फ्यूल (Flex-Fuel) गाड़ियां | विशेष फ्लेक्स-फ्यूल इंजन एवं सेंसर |
| क. मोटरसाइकिलों व स्कूटरों में उपयोग | |||
| भारत में E20 (20% इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल) वर्तमान में पेट्रोल पंपों पर उपलब्ध है और सभी नई BS6 Phase-2 मोटरसाइकिलें इसके लिए पूरी तरह उपयुक्त हैं। इसके अलावा टीवीएस (TVS Apache RTE), बजाज और होंडा जैसी कंपनियाँ 100% इथेनॉल से चलने वाली Flex-Fuel Bikes भी पेश कर रही हैं, जिनमें इंजन कंट्रोल यूनिट (ECU) स्वतः ईंधन का अनुपात समझकर इग्निशन को एडजस्ट कर लेती है। | |||
| ख. कारों और पैसेंजर गाड़ियों में उपयोग | |||
| E20 पेट्रोल पर आज की आधुनिक कारें बिना किसी समस्या के चल रही हैं। वहीं फ्लेक्स-फ्यूल कारों में विशेष ‘फ्यूल फ्लेक्स सेंसर’ लगे होते हैं। यदि आप कार में पेट्रोल डालें या 100% इथेनॉल, गाड़ी का ECU इंजन के एयर-फ्यूल मिक्सचर को तुरंत बदल देता है, जिससे गाड़ी बिना झटके के स्मूथ चलती है। | |||
| ग. बसों और भारी व्यावसायिक वाहनों में उपयोग | |||
| बसों और ट्रकों जैसे भारी वाहनों में इथेनॉल का उपयोग दो तरह से हो रहा है: |
- स्पार्क इग्निशन इथेनॉल इंजन: बस में विशेष रूप से डिजाइन किया गया इथेनॉल इंजन लगाया जाता है। भारत के नागपुर शहर में 100% इथेनॉल पर चलने वाली सिटी बसों का सफल संचालन किया जा चुका है।
- डीजल-इथेनॉल ब्लेंडिंग: डीजल इंजनों में भी 10-15% तक इथेनॉल का मिश्रण करके चलाया जा रहा है।
इथेनॉल ईंधन के मुख्य लाभ और तकनीकी चुनौतियाँ
प्रमुख लाभ:
- पर्यावरण के अनुकूल: इथेनॉल का उच्च ऑक्टेन नंबर (108+) ईंधन के पूर्ण दहन (Complete Combustion) में मदद करता है, जिससे कार्बन मोनोऑक्साइड और जहरीले धुएं में 30% से 50% तक की कमी आती है।
- इंजन की बेहतर परफॉर्मेंस: उच्च ऑक्टेन रेट के कारण इंजन में नॉकिंग (Knocking) कम होती है और पावर डिलीवरी बेहतर मिलती है।
- अर्थव्यवस्था को मजबूती: आयातित कच्चे तेल पर भारत की निर्भरता घटती है और देश का पैसा देश के किसानों एवं चीनी मिलों तक पहुँचता है।
तकनीकी चुनौतियाँ और सावधानियाँ: - संक्षारण (Corrosion) की समस्या: इथेनॉल में हवा से नमी (पानी) सोखने का गुण होता है। यदि साधारण पेट्रोल इंजन में अत्यधिक इथेनॉल डाला जाए तो यह इंजन की रबर पाइपों और धातु के पुर्जों को नुकसान पहुँचा सकता है। इसीलिए फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों में जंग-रोधी (Anti-corrosive) सामग्री का प्रयोग किया जाता है।
- माइलेज में मामूली कमी: इथेनॉल की ऊर्जा घनत्व (Energy Density) पेट्रोल की तुलना में लगभग 25-30% कम होती है, जिससे 100% इथेनॉल पर चलने वाली गाड़ियों के माइलेज में थोड़ी गिरावट देखी जा सकती है।
गन्ने से इथेनॉल बनाने और उसे परिवहन क्षेत्र में ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने की प्रक्रिया भारत के ऊर्जा भविष्य का आधार स्तंभ है। यह तकनीक न केवल हमारी सड़कों को स्वच्छ हवा देती है, बल्कि देश को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर (Atmanirbhar) बनाती है। आने वाले समय में फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों का बढ़ता प्रचलन प्रदूषण को कम करने और अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार देने में मील का पत्थर साबित होगा।