अध्यक्षीय उद्बोधन करती चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर संगीता शुक्ला
रामदत्त चक्रधर बोले—विकसित भारत का आधार केवल आर्थिक समृद्धि नहीं, ज्ञान, चरित्र और कौशल से युक्त नागरिक निर्माण है
डॉ. अतुल कोठारी ने कहा—जड़ों से जोड़ने वाली शिक्षा विश्व की चुनौतियों का समाधान देने में सक्षम बनाए, प्रो. संगीता शुक्ला बोलीं—ज्ञान के साथ विनम्रता और सफलता के साथ संवेदनशीलता जरूरी
मेरठ । चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय और शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, पश्चिमी उत्तर प्रदेश क्षेत्र के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय ‘ज्ञानसभा मेरठ-2026’ का शुभारंभ हुआ। उद्घाटन सत्र में विकसित भारत के निर्माण में शिक्षा की भूमिका, भारतीय ज्ञान परंपरा, चरित्र निर्माण, कौशल विकास, नैतिक मूल्यों और युवा पीढ़ी की जिम्मेदारी जैसे विषयों पर व्यापक मंथन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सर कार्यवाह रामदत्त चक्रधर, बीज वक्ता डॉ. अतुल कोठारी तथा अध्यक्षता कर रहीं चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. संगीता शुक्ला ने शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का प्रमुख माध्यम बताते हुए समग्र, मूल्य आधारित और कौशलयुक्त शिक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया।

अतीत के गौरव, वर्तमान की चुनौतियों और भविष्य के सपनों से बनता है विकसित राष्ट्र : रामदत्त चक्रधर
मुख्य अतिथि रामदत्त चक्रधर ने कहा कि किसी भी देश को आगे बढ़ाने के लिए उसके नागरिकों के मन में अतीत के गौरव का बोध, वर्तमान की चुनौतियों की पीड़ा और भविष्य के सपने होने चाहिए। विकसित भारत की कल्पना स्पष्ट होनी चाहिए और भारत के विकास का मॉडल उसकी अपनी जीवन-दृष्टि तथा भारतीय मूल्यों पर आधारित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत का विकास मॉडल केवल भौतिक समृद्धि और भोग पर आधारित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसमें संयम और मानवीय मूल्यों का भी स्थान होना चाहिए। भारतीय चिंतन में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ जैसी अवधारणाएं समाज और विश्व के प्रति जिम्मेदारी की भावना को दर्शाती हैं। रामदत्त चक्रधर ने कहा कि भारत ने संकट के समय मानवता को प्राथमिकता दी है। कोरोना काल में विभिन्न देशों को वैक्सीन और आवश्यक दवाओं की सहायता उपलब्ध कराने जैसे उदाहरण भारत की मानवीय दृष्टि को दर्शाते हैं। उन्होंने कहा कि भारत की शक्ति केवल आर्थिक या सैन्य सामर्थ्य में नहीं, बल्कि नैतिकता, चरित्र और मानवीय मूल्यों में भी है। विकसित भारत का लक्ष्य ऐसा राष्ट्र बनाना होना चाहिए जो अपनी शक्ति का उपयोग मानवता के कल्याण के लिए करे।
शिक्षा का लक्ष्य केवल डिग्री और रोजगार नहीं, चरित्रवान नागरिक निर्माण भी
रामदत्त चक्रधर ने कहा कि विकसित भारत के निर्माण का सबसे बड़ा माध्यम शिक्षा है। शिक्षा व्यवस्था के सामने यह प्रश्न भी होना चाहिए कि क्या हम केवल वैज्ञानिक, इंजीनियर, चिकित्सक और विशेषज्ञ तैयार कर रहे हैं या अच्छे और चरित्रवान नागरिक भी बना रहे हैं। उन्होंने शिक्षकों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि संस्कार केवल किताबों और पाठ्यक्रमों से नहीं आते, बल्कि शिक्षक के जीवन और आचरण से भी विद्यार्थी सीखते हैं। शिक्षकों को ईमानदारी, अनुशासन, संवेदनशीलता और कर्तव्यनिष्ठा का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश को प्रति व्यक्ति आय के साथ-साथ प्रति व्यक्ति चरित्र की दिशा में भी विचार करना होगा। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों को ऐसे मॉडल विकसित करने चाहिए, जिनमें विद्यार्थी ज्ञान और कौशल के साथ समाज, राष्ट्र और मानवता के प्रति अपने दायित्व को भी समझें।

भौतिक विकास के साथ आध्यात्मिक और नैतिक विकास जरूरी : डॉ. अतुल कोठारी
बीज वक्ता डॉ. अतुल कोठारी ने कहा कि भारत अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, जैव प्रौद्योगिकी, मोबाइल निर्माण सहित अनेक क्षेत्रों में आगे बढ़ रहा है, लेकिन केवल भौतिक प्रगति को विकास मानना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि आर्थिक विकास के साथ यदि पर्यावरण संकट, नैतिक मूल्यों में गिरावट, चरित्र संकट और सामाजिक समस्याएं बढ़ रही हैं तो विकास की दिशा पर भी विचार करना होगा। विकास के भौतिक और आध्यात्मिक दोनों पक्षों के बीच संतुलन जरूरी है। डॉ. कोठारी ने कहा कि भारतीय दृष्टि में धर्म केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह कर्तव्य और सामाजिक दायित्व की भावना से भी जुड़ा रहा है। अर्जित संपत्ति के उपयोग में भी समाज के हित की भावना भारतीय परंपरा का हिस्सा रही है। उन्होंने कहा कि देश का विकास केवल सरकार के प्रयासों से संभव नहीं है। उद्योग, शिक्षा, पत्रकारिता, प्रशासन, विद्यार्थी और समाज के प्रत्येक वर्ग की अपनी भूमिका है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी और निष्ठा से निभानी होगी। उन्होंने कहा कि विकसित भारत का अर्थ दुनिया पर प्रभुत्व स्थापित करना नहीं, बल्कि ऐसा राष्ट्र बनना है जो विश्व में संकटग्रस्त मानवता के उत्थान में सहयोग कर सके। भारत की विश्वगुरु की संकल्पना ज्ञान, चरित्र और कौशल के त्रिवेणी संगम पर आधारित होनी चाहिए।
मानव निर्माण से होगा विकसित भारत का वास्तविक निर्माण : प्रो. संगीता शुक्ला
चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. संगीता शुक्ला ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि भारत का भविष्य आने वाली पीढ़ियों के निर्माण से जुड़ा है और इसका सबसे महत्वपूर्ण माध्यम शिक्षा है। उन्होंने कहा कि 2047 के विकसित भारत का वास्तविक निर्माण मानव निर्माण से होगा। शिक्षा में कौशल के साथ संस्कार, अधिकारों के साथ कर्तव्यबोध और ज्ञान के साथ जिम्मेदारी की भावना विकसित करनी होगी। कुलपति ने बताया कि चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में वैदिक गणित, भारतीय दर्शन, स्वास्थ्य विज्ञान, पारंपरिक ज्ञान, शोध और नवाचार जैसे क्षेत्रों को शिक्षा से जोड़ने की दिशा में कार्य किया जा रहा है। क्रिएटर, इनोवेशन लैब, इन्क्यूबेशन सेंटर, उद्योगों के साथ सहभागिता और कौशल विकास जैसी पहल विद्यार्थियों को समस्या समाधान और नवाचार की दिशा में आगे बढ़ा रही हैं।
मातृभाषा संस्कृति और चिंतन की वाहक
प्रो. संगीता शुक्ला ने कहा कि मातृभाषा केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, पहचान और चिंतन प्रक्रिया की वाहक है। भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण पाठ्य सामग्री, डिजिटल लर्निंग तथा वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली को सहज रूप में उपलब्ध कराने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान को शोध एवं नवाचार की आधुनिक पद्धतियों के साथ जोड़कर ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित करनी होगी, जो विद्यार्थियों को राष्ट्रीय और वैश्विक अवसरों से जोड़े। उन्होंने कहा कि भविष्य का विश्वविद्यालय केवल डिग्री प्रदान करने वाला संस्थान नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे ज्ञान का सृजनकर्ता, तकनीकी समाधान विकसित करने वाला तथा सक्षम और जिम्मेदार नागरिक तैयार करने वाला केंद्र बनना होगा। कुलपति ने कहा कि विकसित भारत की संकल्पना में ज्ञान के साथ विनम्रता, सफलता के साथ संवेदनशीलता और प्रतिस्पर्धा के साथ सहयोग की भावना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि विकसित भारत केवल सरकार का लक्ष्य नहीं, बल्कि युवाओं और प्रत्येक नागरिक का भी संकल्प होना चाहिए। उन्होंने संदेश दिया कि “ज्ञान हमारा पथ, संस्कार हमारी शक्ति, नवाचार हमारी गति और राष्ट्रसेवा हमारा संकल्प” बने। इसी भावना के साथ शिक्षित भारत से सक्षम भारत, सक्षम भारत से समृद्ध भारत और समृद्ध भारत से विकसित भारत की यात्रा को आगे बढ़ाया जा सकता है।

युवाओं से संवाद में शिक्षा, नवाचार और उद्यमिता पर चर्चा
ज्ञानसभा के दौरान युवाओं के साथ संवाद का विशेष सत्र आयोजित किया गया। एक सत्र में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के कार्यकर्ताओं के साथ रामदत्त चक्रधर ने ‘ज्ञान से जीवन तक—ऐसी शिक्षा जो बच्चों को पढ़ाए ही नहीं, जीना भी सिखाए’ विषय पर संवाद किया। वहीं अटल सभागार में चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं के साथ ‘युवा संवाद : युवा, नवाचार, उद्यमिता—विकसित भारत 2047 की ओर’ विषय पर चर्चा हुई। इस दौरान विद्यार्थियों ने विभिन्न विषयों पर अपनी जिज्ञासाएं रखीं, जिनका वक्ताओं ने समाधान किया।
चार समूहों में हुई विषय आधारित चर्चा
भोजन के बाद ज्ञानसभा के सत्रों को चार समूहों में विभाजित किया गया। पहले समूह में विद्यार्थियों के लिए ‘विद्यार्थी से व्यक्तित्व तक—कैसी शिक्षा बनाएगी आत्मविश्वासी, चरित्रवान और जिम्मेदार’ विषय पर विद्या भारती के अखिल भारतीय महामंत्री देशराज शर्मा ने संबोधन किया। इसके बाद प्रश्नोत्तरी और जिज्ञासा समाधान सत्र हुआ। दूसरे समूह में स्कूल शिक्षकों के लिए ‘गुरु से राष्ट्र-निर्माता तक—21वीं सदी का शिक्षक कैसा हो’ विषय पर मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के पूर्व निदेशक उमेश सिंह ने विचार रखे। इसके बाद शिक्षकों की जिज्ञासाओं और प्रश्नों का समाधान किया गया। तीसरे समूह में प्रोफेसरों के लिए ‘स्कूल अकेला नहीं बना सकता संस्कार—परिवार, विद्यालय और समाज की साझी जिम्मेदारी’ विषय पर मध्य प्रदेश के राज्य सूचना आयुक्त उमाशंकर पचौरी ने संबोधन किया। इस सत्र में भी प्रश्नोत्तर और जिज्ञासा समाधान हुआ। चौथे समूह में ‘व्यवस्था, तकनीक एवं राष्ट्र’ विषय पर प्रो. सचिन माहेश्वरी ने विचार रखे। इसके बाद संवाद और समाधान सत्र आयोजित किया गया। शाम के सत्रों में भी प्रतिभागियों को चार समूहों में विभाजित कर विभिन्न विषयों पर विद्वानों के संबोधन और संवाद कार्यक्रम आयोजित किए गए।
विश्वविद्यालय के शिक्षक, अधिकारी और विद्यार्थी रहे मौजूद
कार्यक्रम का संचालन प्रोफेसर कृष्णकांत शर्मा ने किया, जबकि अतिथियों का परिचय प्रोफेसर अनिल मलिक ने कराया। स्वागत उद्बोधन प्रोफेसर शिवराज पुंडीर ने दिया। इस अवसर पर प्रोफेसर इंचार्ज मीडिया सेल प्रो. मुकेश कुमार शर्मा, प्रेस प्रवक्ता मितेंद्र कुमार गुप्ता, इंजीनियर प्रवीण पवार सहित विश्वविद्यालय के शिक्षक, अधिकारी, कर्मचारी और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं मौजूद रहे। ज्ञानसभा में शिक्षा के माध्यम से ज्ञानवान, चरित्रवान, कौशलयुक्त और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी युवा तैयार करने तथा भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा, शोध और नवाचार से जोड़ने की आवश्यकता पर व्यापक विचार-विमर्श किया गया।