लीवर की बीमारियां: शुरुआत, चरण, लक्षण, इलाज और बचाव की संपूर्ण जानकारी
मधुमेह और उच्च रक्तचाप हैं प्रमुख जोखिम; शुरुआती बीमारी में लक्षण न होना भी संभव
किडनी यानी गुर्दे शरीर से अपशिष्ट पदार्थ और अतिरिक्त पानी बाहर निकालने, रक्त में पोटैशियम व सोडियम जैसे खनिजों का संतुलन बनाए रखने और रक्तचाप नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। वे लाल रक्त कोशिकाएं बनाने में मदद करने वाले हार्मोन और हड्डियों के स्वास्थ्य से जुड़े विटामिन-डी के सक्रिय रूप के निर्माण में भी योगदान देते हैं। जब किडनी की छनन क्षमता या संरचना प्रभावित होती है, तब शरीर में पानी, नमक और अपशिष्ट पदार्थ जमा हो सकते हैं। किडनी की बीमारी अचानक भी हो सकती है और धीरे-धीरे वर्षों में बढ़ भी सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया में अनुमानित 67.4 करोड़ लोग क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) से प्रभावित हैं।
किडनी रोग के मुख्य प्रकार
किडनी की समस्याएं एक ही तरह की नहीं होतीं। सही उपचार इस बात पर निर्भर करता है कि बीमारी अचानक शुरू हुई है या लंबे समय से है, उसका कारण क्या है और किडनी की कार्यक्षमता कितनी प्रभावित हुई है।
एक्यूट किडनी इंजरी (AKI): इसमें किडनी की कार्यक्षमता घंटों या कुछ दिनों में अचानक कम हो जाती है। गंभीर उल्टी-दस्त या रक्तस्राव से शरीर में पानी की कमी, गंभीर संक्रमण, बड़े ऑपरेशन या चोट, कुछ दवाएं और मूत्र के रास्ते में रुकावट इसके कारण हो सकते हैं। समय पर कारण का उपचार मिलने पर कई लोगों में किडनी की कार्यक्षमता सुधर सकती है। फिर भी AKI के बाद आगे चलकर CKD का जोखिम बढ़ सकता है।
क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD): इसमें किडनी की संरचना या कार्यक्षमता में गड़बड़ी कम-से-कम तीन महीने बनी रहती है। इसका बढ़ना अक्सर धीरे होता है। CKD शुरुआती चरणों में बिना लक्षण के रह सकती है और कई बार जांच के बाद ही पता चलती है।
ग्लोमेरुलर रोग: किडनी के सूक्ष्म फिल्टरों में सूजन या दूसरी क्षति के कारण पेशाब में प्रोटीन या खून आ सकता है। कुछ मामलों में इसका संबंध प्रतिरक्षा तंत्र, संक्रमण या अन्य बीमारियों से होता है।
किडनी स्टोन और मूत्र मार्ग की रुकावट: पथरी, बढ़े हुए प्रोस्टेट या अन्य रुकावटों से पेशाब का प्रवाह बाधित हो सकता है। रुकावट लंबे समय तक रहे या दोनों किडनियों को प्रभावित करे तो किडनी को नुकसान हो सकता है।
पॉलीसिस्टिक और आनुवंशिक रोग: कुछ लोगों में जन्मजात या परिवार से जुड़े कारणों से किडनी में बदलाव होते हैं और समय के साथ उनकी कार्यक्षमता कम हो सकती है।

किसे किडनी रोग का खतरा अधिक रहता है और क्यों?
मधुमेह और उच्च रक्तचाप वयस्कों में CKD के प्रमुख कारण हैं। लगातार बढ़ी हुई रक्त शर्करा किडनी के फिल्टरों को नुकसान पहुंचा सकती है। अनियंत्रित रक्तचाप किडनी की रक्त वाहिकाओं पर दबाव डालता है; किडनी की क्षति बढ़ने पर रक्तचाप और बिगड़ सकता है।
जोखिम अधिक हो सकता है यदि किसी व्यक्ति को मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, मोटापा या पहले AKI हो चुका हो; परिवार में किडनी रोग का इतिहास हो; या वह ऐसी दवाएं लंबे समय तक लेता हो जो किडनी को नुकसान पहुंचा सकती हैं। उम्र बढ़ने के साथ किडनी की कार्यक्षमता घट सकती है, इसलिए बुजुर्गों में नियमित जांच का महत्व बढ़ जाता है। संक्रमण, गुर्दे की सूजन, पथरी से रुकावट और कुछ प्रतिरक्षा संबंधी रोग भी किडनी को प्रभावित कर सकते हैं।
भारत के ICMR-INDIAB अध्ययन में 25,408 वयस्कों के नमूने में अनुमानित eGFR के आधार पर impaired kidney function की दर 3.2 प्रतिशत पाई गई। यह एक विशेष जांच-आधारित आकलन है; इसे CKD की राष्ट्रीय दर का सीधा पर्याय नहीं मानना चाहिए, क्योंकि CKD की पुष्टि के लिए बदलाव का बने रहना और अन्य जांचें भी महत्वपूर्ण हैं। अध्ययन में मधुमेह और उच्च रक्तचाप दोनों साथ होने पर जोखिम अधिक था।
लक्षण: किन संकेतों पर ध्यान दें?
शुरुआती CKD में अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते। बीमारी बढ़ने पर ये संकेत दिखाई दे सकते हैं:
- पैरों, टखनों, हाथों या चेहरे पर सूजन
- पेशाब में झाग, खून या सामान्य से अलग बदलाव
- पेशाब की मात्रा या बारंबारता में बदलाव
- थकान, कमजोरी, भूख कम लगना
- मतली, उल्टी, नींद या एकाग्रता में परेशानी
- त्वचा में खुजली, सूखापन या मांसपेशियों में ऐंठन
- सांस फूलना या सीने में असहजता
- बिना स्पष्ट कारण वजन घटना
इनमें से कोई लक्षण अपने आप में किडनी रोग की पुष्टि नहीं करता। सूजन, थकान या पेशाब में बदलाव के अन्य कारण भी हो सकते हैं; डॉक्टर की जांच और आवश्यक परीक्षण से ही कारण पता चलता है।
किडनी रोग की पहचान कैसे होती है?
किडनी की बीमारी का पता लगाने और उसकी प्रगति देखने के लिए डॉक्टर आमतौर पर खून और पेशाब की जांच करवाते हैं। जोखिम वाले लोगों में लक्षण न होने पर भी जांच उपयोगी हो सकती है।
सीरम क्रिएटिनिन और eGFR: खून में क्रिएटिनिन के आधार पर estimated glomerular filtration rate (eGFR) निकाला जाता है। इससे अनुमान मिलता है कि किडनी रक्त को कितनी अच्छी तरह छान रही है।
पेशाब में एल्ब्यूमिन या प्रोटीन: पेशाब में एल्ब्यूमिन आना किडनी के फिल्टर में क्षति का संकेत हो सकता है। इसके लिए urine albumin-to-creatinine ratio (UACR) किया जा सकता है।
अन्य जांचें: जरूरत के अनुसार डॉक्टर रक्तचाप, रक्त शर्करा, इलेक्ट्रोलाइट्स—जैसे पोटैशियम और सोडियम—हीमोग्लोबिन, कैल्शियम-फॉस्फोरस, अल्ट्रासाउंड, पेशाब की माइक्रोस्कोपी या किडनी बायोप्सी की सलाह दे सकते हैं। हर मरीज को सभी जांचों की जरूरत नहीं पड़ती।
एक बार असामान्य रिपोर्ट आने से हमेशा CKD सिद्ध नहीं होती। बीमारी की अवधि और कारण स्पष्ट करने के लिए डॉक्टर जांच दोहरा सकते हैं। WHO और NIDDK भी eGFR तथा पेशाब में एल्ब्यूमिन की जांच को CKD की पहचान और निगरानी के प्रमुख तरीके बताते हैं।
CKD के चरण क्या होते हैं?
डॉक्टर CKD की अवस्था eGFR के साथ पेशाब में एल्ब्यूमिन और बीमारी के कारण को देखकर तय करते हैं। मोटे तौर पर eGFR की श्रेणियां इस प्रकार हैं:
- G1: eGFR 90 या अधिक; किडनी क्षति के अन्य प्रमाण भी हों तो CKD माना जा सकता है।
- G2: eGFR 60–89; साथ में किडनी क्षति का प्रमाण जरूरी है।
- G3a: eGFR 45–59।
- G3b: eGFR 30–44।
- G4: eGFR 15–29।
- G5: eGFR 15 से कम; इसे किडनी फेल्योर की अवस्था कहा जाता है।
G1 या G2 की संख्या मात्र से CKD घोषित नहीं की जाती—पेशाब में एल्ब्यूमिन, स्कैन या दूसरे परीक्षणों में क्षति के प्रमाण और बीमारी की अवधि भी देखी जाती है। eGFR 15 या उससे कम होने पर डायलिसिस या प्रत्यारोपण पर विचार किया जा सकता है, लेकिन उपचार का समय केवल एक आंकड़े से तय नहीं होता। लक्षण, खून में पोटैशियम, शरीर में पानी का जमाव और अन्य जटिलताएं भी देखी जाती हैं।
उपचार: बीमारी के कारण और अवस्था के अनुसार योजना
हर किडनी रोगी को डायलिसिस की जरूरत नहीं होती। शुरुआती और मध्यम CKD में लक्ष्य बीमारी की रफ्तार घटाना, कारणों को नियंत्रित करना और जटिलताओं से बचाव करना होता है। डॉक्टर मधुमेह और रक्तचाप के नियंत्रण, किडनी के लिए सुरक्षित दवाओं, नियमित जांच, आहार और जीवनशैली पर योजना बनाते हैं। कुछ स्थितियों में कारण का इलाज—जैसे संक्रमण, सूजन या मूत्र मार्ग की रुकावट दूर करना—विशेष रूप से जरूरी होता है।
किडनी रोग की देखभाल में नेफ्रोलॉजिस्ट (किडनी रोग विशेषज्ञ), प्राथमिक चिकित्सक, आहार विशेषज्ञ और जरूरत पड़ने पर अन्य विशेषज्ञ शामिल हो सकते हैं। दवा या आहार योजना समय के साथ रिपोर्टों के अनुसार बदल सकती है।

किडनी रोग में दी जाने वाली दवाएं
दवाएं बीमारी के कारण, eGFR, रक्तचाप, पेशाब में प्रोटीन और खून में पोटैशियम सहित कई बातों पर निर्भर करती हैं। नीचे दिए गए नाम उपचार की श्रेणियों के उदाहरण हैं—ये स्वयं दवा शुरू करने की सलाह नहीं हैं।
रक्तचाप और पेशाब में प्रोटीन कम करने वाली दवाएं: ACE inhibitor या ARB समूह की दवाएं कुछ मरीजों में रक्तचाप और पेशाब में एल्ब्यूमिन कम करने के लिए दी जा सकती हैं। इनके बाद क्रिएटिनिन और पोटैशियम की निगरानी जरूरी हो सकती है; इन्हें डॉक्टर की सलाह के बिना शुरू, बंद या आपस में मिलाकर नहीं लेना चाहिए।
SGLT2 inhibitor दवाएं: कुछ CKD रोगियों—विशेषकर कुछ मधुमेह या हृदय रोग वाले मरीजों—में dapagliflozin या empagliflozin जैसी दवाएं किडनी और हृदय संबंधी जोखिम घटाने की उपचार योजना का हिस्सा हो सकती हैं। पात्रता, eGFR, अन्य दवाओं और संक्रमण या निर्जलीकरण जैसे जोखिमों को डॉक्टर देखते हैं। इनका उपयोग हर व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं होता।
मधुमेह और कोलेस्ट्रॉल की दवाएं: मधुमेह और हृदय रोग के जोखिम के अनुसार शुगर नियंत्रित करने वाली दवाएं तथा statin वर्ग की दवाएं दी जा सकती हैं। किडनी की कार्यक्षमता कम होने पर कुछ दवाओं की मात्रा या विकल्प बदलने पड़ सकते हैं।
एनीमिया और हड्डियों से जुड़ी जटिलताओं का उपचार: CKD में एनीमिया हो सकता है। जांच के बाद आयरन या erythropoiesis-stimulating agent जैसी दवाएं दी जा सकती हैं। कैल्शियम-फॉस्फोरस या विटामिन-डी का संतुलन बिगड़ने पर डॉक्टर संबंधित दवाएं, vitamin D या phosphate binder लिख सकते हैं। सभी मरीजों को इनकी जरूरत नहीं होती।
सूजन और शरीर में पानी जमा होने पर: कुछ लोगों को मूत्रवर्धक यानी diuretic दवा दी जा सकती है। दवा का चयन और मात्रा रक्तचाप, सूजन, पेशाब और खून की रिपोर्ट के आधार पर होता है।
एक्यूट किडनी इंजरी में: उपचार कारण के मुताबिक होता है—जैसे गंभीर निर्जलीकरण में उचित तरल, संक्रमण में उसका उपचार, रुकावट में उसे हटाना या नुकसान पहुंचाने वाली दवा की समीक्षा। जरूरत पड़ने पर अस्पताल में निगरानी और कुछ समय के लिए डायलिसिस भी करना पड़ सकता है। हर AKI में एक जैसा उपचार नहीं होता।
किन दवाओं से सावधानी जरूरी है?
ibuprofen, diclofenac और naproxen जैसी कुछ दर्द निवारक दवाएं—विशेषकर निर्जलीकरण, पहले से CKD, बुजुर्ग अवस्था या कुछ अन्य दवाओं के साथ—किडनी को नुकसान पहुंचा सकती हैं। बिना सलाह लंबे समय तक दर्द की दवाएं लेना, अज्ञात सामग्री वाली जड़ी-बूटी या “किडनी साफ करने” के उत्पाद इस्तेमाल करना जोखिम भरा हो सकता है। किसी भी दवा को अपने आप बंद करना भी ठीक नहीं, क्योंकि रक्तचाप या मधुमेह की जरूरी दवा बंद करने से नुकसान हो सकता है। डॉक्टर या फार्मासिस्ट से दवा की समीक्षा करवाएं।
आहार और बचाव
किडनी रोग में सभी लोगों के लिए एक जैसा आहार या पानी की मात्रा तय नहीं की जा सकती। बीमारी का चरण, खून में पोटैशियम और फॉस्फोरस, सूजन, डायलिसिस और अन्य बीमारियों के अनुसार आहार बदलता है।
सामान्य तौर पर नमक और बहुत अधिक प्रसंस्कृत भोजन कम रखना, स्वस्थ वजन बनाए रखना, नियमित शारीरिक गतिविधि करना, धूम्रपान से बचना तथा मधुमेह और रक्तचाप को नियंत्रित रखना लाभकारी कदम हैं। प्रोटीन, पोटैशियम, फॉस्फोरस और पानी को सीमित करना है या नहीं—यह रिपोर्ट देखकर नेफ्रोलॉजिस्ट या किडनी आहार विशेषज्ञ तय करें। बहुत कम पानी पीना या बहुत अधिक पानी पीना, दोनों कुछ मरीजों के लिए हानिकारक हो सकते हैं। WHO स्वस्थ जीवनशैली और जोखिम वाले लोगों में नियमित eGFR व एल्ब्यूमिन जांच को रोकथाम और शीघ्र पहचान का हिस्सा बताता है।
डायलिसिस क्या है और कब किया जाता है?
डायलिसिस वह उपचार है जिसमें मशीन या पेट की झिल्ली की मदद से रक्त से अपशिष्ट और अतिरिक्त तरल हटाया जाता है। यह किडनी फेल्योर का पूरा इलाज नहीं है, लेकिन शरीर का संतुलन बनाए रखने और जीवन बढ़ाने में मदद कर सकता है। डायलिसिस शुरू करने का निर्णय केवल eGFR संख्या पर आधारित नहीं होता। सांस फूलना या सूजन, खून में खतरनाक रूप से पोटैशियम बढ़ना, शरीर में अम्लता, मतली-उल्टी या अन्य गंभीर लक्षण और जांचों के परिणाम भी महत्वपूर्ण होते हैं। इलाज करने वाला नेफ्रोलॉजिस्ट मरीज और परिवार के साथ विकल्पों पर चर्चा करता है।
हेमोडायलिसिस
हेमोडायलिसिस में मरीज के रक्त को एक विशेष फिल्टर, जिसे dialyzer कहते हैं, से गुजारा जाता है। मशीन अपशिष्ट और अतिरिक्त पानी हटाकर रक्त को शरीर में वापस भेजती है। इसके लिए हाथ में नस और धमनी को जोड़कर AV fistula बनाया जा सकता है; कुछ मरीजों में graft या अस्थायी catheter की जरूरत पड़ती है। फिस्टुला को पहले से तैयार करना कई बार उपयोगी होता है।
केंद्र में होने वाला सामान्य हेमोडायलिसिस अक्सर सप्ताह में तीन बार और हर बार लगभग चार घंटे होता है, लेकिन वास्तविक कार्यक्रम मरीज की स्थिति और डॉक्टर के निर्देश के अनुसार अलग हो सकता है। उपचार के बाद थकान, रक्तचाप में बदलाव या ऐंठन हो सकती है। डायलिसिस की आवृत्ति खुद से घटाना या सत्र छोड़ना खतरनाक हो सकता है।
पेरिटोनियल डायलिसिस
पेरिटोनियल डायलिसिस में पेट की अंदरूनी झिल्ली रक्त छानने में मदद करती है। पेट में एक नरम कैथेटर लगाया जाता है और उसके जरिए विशेष द्रव पेट में डाला जाता है। कुछ समय बाद द्रव, जिसमें अपशिष्ट और अतिरिक्त पानी आ जाता है, बाहर निकाला जाता है। यह प्रक्रिया दिन में कई बार हाथ से या रात में मशीन की सहायता से की जा सकती है। इसे स्वच्छता और प्रशिक्षित देखभाल के साथ करना जरूरी है; संक्रमण इसका एक संभावित जोखिम है।
डायलिसिस के अलावा सहायक देखभाल
कुछ मरीजों में बीमारी की अवस्था, दूसरी गंभीर बीमारियों और मरीज की प्राथमिकताओं के आधार पर डॉक्टर लक्षणों को नियंत्रित करने वाली सहायक देखभाल पर भी बात कर सकते हैं। यह निर्णय मरीज, परिवार और चिकित्सा टीम के बीच होना चाहिए।
किडनी प्रत्यारोपण कब किया जाता है?
जब दोनों किडनियों की कार्यक्षमता स्थायी रूप से बहुत कम हो जाती है और बीमारी अंतिम अवस्था तक पहुंचती है, तब पात्र मरीज के लिए किडनी प्रत्यारोपण एक विकल्प हो सकता है। किसी जीवित पात्र दाता से या मस्तिष्क-मृत/मृत दाता से मिली किडनी का प्रत्यारोपण किया जा सकता है। प्रत्यारोपण से पहले मरीज और संभावित दाता की स्वास्थ्य जांच, रक्त समूह व ऊतक संबंधी जांच और cross-match किया जाता है। हर मरीज या हर संभावित दाता प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त नहीं होता।
प्रत्यारोपण होने तक कुछ मरीजों को डायलिसिस की जरूरत पड़ सकती है। सफल ऑपरेशन के बाद भी नियमित जांच, संक्रमण से बचाव और लंबे समय तक—अक्सर जीवनभर—anti-rejection यानी immunosuppressant दवाएं लेना आवश्यक हो सकता है। इन दवाओं से संक्रमण और कुछ अन्य दुष्प्रभावों का जोखिम बढ़ सकता है; इसलिए दवा का स्तर और किडनी की कार्यक्षमता नियमित रूप से जांची जाती है।
किडनी प्रत्यारोपण कब शुरू हुआ?
किडनी प्रत्यारोपण का इतिहास कई दशकों की चिकित्सा खोजों से जुड़ा है। 1954 में डॉक्टर जोसेफ ई. मरे और उनकी टीम ने अमेरिका में समान जुड़वां भाइयों के बीच पहला सफल मानव किडनी प्रत्यारोपण किया। समान जुड़वां होने से प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा अंग को अस्वीकार किए जाने का जोखिम कम था। बाद में tissue matching और प्रतिरक्षा प्रणाली को नियंत्रित करने वाली दवाओं में प्रगति ने असंबंधित दाता से प्रत्यारोपण को भी संभव बनाया।
भारत में AIIMS दिल्ली के नेफ्रोलॉजी विभाग के अनुसार वहां पहला किडनी प्रत्यारोपण अप्रैल 1972 में हुआ था। PGIMER चंडीगढ़ अपने पहले रीनल ट्रांसप्लांट की तारीख जून 1973 बताता है।
प्रत्यारोपण कितना सफल होता है?
किडनी प्रत्यारोपण की सफलता को एक ही प्रतिशत से बताना उचित नहीं होगा। इसमें मरीज की जीवित रहने की संभावना, प्रत्यारोपित किडनी का काम करते रहना, अस्वीकृति की आशंका और मरीज के जीवन की गुणवत्ता—सभी शामिल हैं। परिणाम दाता के प्रकार और स्वास्थ्य, मरीज की उम्र, मधुमेह, संक्रमण, ऑपरेशन के बाद की देखभाल और दवाओं को नियमित लेने पर निर्भर करते हैं।
एक बड़े अमेरिकी OPTN/SRTR रजिस्ट्री की 2024 रिपोर्ट में 2017–2019 में प्रत्यारोपित किडनियों के पांच-वर्षीय graft survival में जीवित दाता की किडनी के परिणाम सामान्यतः मृत दाता की किडनी से बेहतर रहे; उम्र और बीमारी के अनुसार अंतर भी था। ये अमेरिकी आंकड़े हैं, भारत या किसी एक मरीज के परिणाम का सीधा अनुमान नहीं। भारत में मृत दाता से प्रत्यारोपण पर एक छोटे केंद्र-आधारित अध्ययन ने भी मरीज और graft survival में समय व जोखिम के अनुसार अंतर दिखाया; छोटे अध्ययन को पूरे देश पर लागू नहीं किया जाना चाहिए। इसलिए अपने मामले में संभावित लाभ और जोखिम transplant team से पूछना चाहिए।
भारत में प्रत्यारोपण और किडनी रोग से मौतों के आंकड़े
NOTTO की 2024 वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में वर्ष 2024 के दौरान कुल 13,476 किडनी प्रत्यारोपण दर्ज हुए—इनमें 11,558 जीवित दाता और 1,918 मृत दाता से हुए प्रत्यारोपण शामिल थे।
किडनी रोग से होने वाली मौतों की गणना अलग-अलग डेटाबेस और परिभाषाओं के अनुसार बदल सकती है। GBD 2021 पर आधारित भारत के एक अध्ययन ने 2021 में CKD से 1,75,637 मौतों का मॉडल-आधारित अनुमान दिया। यह प्रत्यक्ष रूप से दर्ज की गई हर मौत की सरकारी गिनती नहीं, बल्कि उपलब्ध आंकड़ों से निकाला गया अनुमान है। उसी अध्ययन में जोखिम कारकों पर बेहतर नियंत्रण से भविष्य का बोझ घट सकने की संभावना बताई गई।
भारत में किडनी जांच, डायलिसिस और प्रत्यारोपण केंद्र
मरीज को अपने नजदीकी सरकारी मेडिकल कॉलेज या ऐसे अस्पताल में नेफ्रोलॉजी विभाग तलाशना चाहिए जहां किडनी जांच, डायलिसिस और जरूरत पड़ने पर transplant evaluation उपलब्ध हो। प्रत्यारोपण के लिए केंद्र की वर्तमान सरकारी अनुमति और पंजीकरण की पुष्टि NOTTO या संबंधित राज्य प्राधिकरण से करना जरूरी है। NOTTO देश में अंग प्रत्यारोपण संबंधी जानकारी और पंजीकृत केंद्रों का नेटवर्क संचालित करता है।
उदाहरण के तौर पर, AIIMS नई दिल्ली का नेफ्रोलॉजी विभाग डायलिसिस और किडनी प्रत्यारोपण सेवाओं का उल्लेख करता है; PGIMER चंडीगढ़ में रीनल ट्रांसप्लांट केंद्र है; और अहमदाबाद का IKDRC-ITS किडनी रोग तथा प्रत्यारोपण सेवाएं प्रदान करता है। यह उदाहरण मात्र हैं—किसी मरीज के लिए उपयुक्त अस्पताल उसके स्थान, रोग की गंभीरता, उपलब्ध सेवाओं और चिकित्सकीय सलाह पर निर्भर करेगा।
कब तुरंत चिकित्सा सहायता लें?
यदि पेशाब अचानक बहुत कम हो जाए या बंद हो जाए, सांस लेने में परेशानी हो, तेजी से सूजन बढ़े, लगातार उल्टी हो, भ्रम या अत्यधिक उनींदापन हो, सीने में दर्द हो, या गंभीर संक्रमण के लक्षण दिखें तो तुरंत अस्पताल या आपातकालीन सेवा से संपर्क करें। किडनी रोग में कुछ जटिलताएं तेजी से बिगड़ सकती हैं।
निष्कर्ष
किडनी रोग कई बार बिना लक्षण के बढ़ता है, इसलिए मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग या परिवार में किडनी रोग का इतिहास रखने वाले लोगों के लिए नियमित जांच महत्वपूर्ण है। शुरुआती पहचान, कारण का उपचार, रक्तचाप और रक्त शर्करा पर नियंत्रण तथा डॉक्टर द्वारा तय दवा और आहार योजना से बीमारी की प्रगति धीमी की जा सकती है। उन्नत अवस्था में डायलिसिस और प्रत्यारोपण जीवनरक्षक विकल्प हैं, लेकिन दोनों के लिए नियमित विशेषज्ञ देखभाल आवश्यक है।
यह आलेख जन-जागरूकता के लिए है। यह व्यक्तिगत जांच, दवा के चुनाव या उपचार योजना का विकल्प नहीं है। किडनी रोग की आशंका या रिपोर्ट में बदलाव होने पर नेफ्रोलॉजिस्ट से परामर्श करें।