छात्राओं ने देखी जनजाति पर आधारित फिल्म
मेरठ। विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर रघुनाथ गर्ल्स पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज, मेरठ में आर. जी. रेंजर्स टीम द्वारा जनजातीय जीवन, संस्कृति और प्रकृति के साथ उनके संबंधों को समझने के उद्देश्य से विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के दौरान छात्राओं को छत्तीसगढ़ की कमार जनजाति के जीवन पर आधारित एक विशेष डॉक्यूमेंट्री दिखाई गई।
डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से छात्राओं को भारत की समृद्ध जनजातीय परंपराओं और सांस्कृतिक विविधता से परिचित कराया गया। छात्राओं ने कमार जनजाति के पारंपरिक रहन-सहन, खान-पान, वेशभूषा, सामाजिक जीवन, रीति-रिवाजों, लोक परंपराओं तथा प्रकृति के साथ उनके गहरे संबंध को करीब से समझा।
प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवनशैली की झलक
डॉक्यूमेंट्री में दिखाया गया कि कमार जनजाति का जीवन लंबे समय से जंगल, प्राकृतिक संसाधनों और स्थानीय पर्यावरण से जुड़ा रहा है। सीमित आधुनिक सुविधाओं के बावजूद समुदाय ने अपनी पारंपरिक पहचान, सामाजिक मूल्यों, ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत को काफी हद तक संरक्षित रखा है।

छात्राओं ने यह भी जाना कि जनजातीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान में प्रकृति और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीने की उनकी परंपराएं वर्तमान समय में पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण संदेश देती हैं।
छात्राओं को मिली भारत की जनजातीय विविधता को समझने की सीख
कार्यक्रम का उद्देश्य केवल जनजातीय जीवन की जानकारी देना ही नहीं, बल्कि छात्राओं में भारत की सांस्कृतिक विविधता के प्रति सम्मान और सामाजिक संवेदनशीलता विकसित करना भी रहा। डॉक्यूमेंट्री देखने के बाद छात्राओं ने जनजातीय समाज की जीवनशैली, परंपराओं और उनके सामने मौजूद सामाजिक एवं विकास संबंधी चुनौतियों को समझने का प्रयास किया।
इस अवसर पर कॉलेज की प्राचार्या प्रो. निवेदिता कुमारी ने कहा कि जनजातीय समुदाय भारतीय संस्कृति की महत्वपूर्ण धरोहर हैं। उनकी प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवनशैली और पारंपरिक ज्ञान आज के समय में भी प्रेरणा देने वाला है। उन्होंने कहा कि भारत की वास्तविक सांस्कृतिक विविधता को समझने के लिए जनजातीय समाज की परंपराओं और जीवन मूल्यों को जानना आवश्यक है।
सामाजिक संवेदनशीलता और प्रकृति संरक्षण का संदेश
आर. जी. रेंजर्स की लीडर प्रो. सुनीता सिंह ने कहा कि जनजातीय संस्कृति को समझने से विद्यार्थियों में विविधता के प्रति सम्मान की भावना विकसित होती है। उन्होंने कहा कि ऐसे कार्यक्रम छात्राओं को सामाजिक संवेदनशीलता, सांस्कृतिक सम्मान और प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरूक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज के पारंपरिक जीवन में प्रकृति के साथ संतुलन का विशेष महत्व रहा है। आज जब पर्यावरण संरक्षण पूरी दुनिया के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती है, तब जनजातीय समुदायों की प्रकृति-केंद्रित जीवनशैली से बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है।
सतत विकास लक्ष्यों से जोड़ा गया कार्यक्रम
कार्यक्रम के माध्यम से छात्राओं को संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के प्रति भी जागरूक किया गया। आयोजन में विशेष रूप से SDG-4 (गुणवत्तापूर्ण शिक्षा), SDG-10 (असमानताओं में कमी), SDG-11 (सतत एवं समावेशी समुदाय) और SDG-15 (स्थलीय पारिस्थितिकी एवं जैव विविधता का संरक्षण) से संबंधित संदेश दिया गया।
कार्यक्रम के माध्यम से यह समझाने का प्रयास किया गया कि शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि विभिन्न समुदायों, संस्कृतियों, परंपराओं और पर्यावरण के साथ उनके संबंधों को समझना भी शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर आयोजित यह कार्यक्रम छात्राओं के लिए ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायक रहा। डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से छात्राओं को भारत की जनजातीय संस्कृति की विविधता को समझने तथा उसके संरक्षण के महत्व पर विचार करने का अवसर मिला।
कार्यक्रम के आयोजन में डॉ. पूनमलता सिंह, मीडिया प्रभारी, तथा प्रो. सुनीता सिंह, आयोजन सचिव की महत्वपूर्ण भूमिका रही। कॉलेज प्रशासन ने कहा कि भविष्य में भी छात्राओं को सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय विषयों से जोड़ने वाले ऐसे जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहेंगे।