मेरठ के गुजरी बाज़ार स्थित प्राचीन शिव मंदिर में मौजूद पीपल का सूखा पेड़ जिस पर अंग्रेजों ने क्रान्तिकारियों को दी थी फांसी
‘सेवा संकल्प अभियान’ के तहत मरम्मत, कमरे की छत और रंगाई-पुताई का काम प्रारम्भ; मंदिर का शिखर ऊंचा करने पर भी विचार
मेरठ । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रशासनिक प्रमुख के रूप में 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर चलाए जा रहे ‘सेवा संकल्प अभियान’ के तहत ‘सेवा मेरा योगदान’ पहल में मंदिर के जीर्णोद्धार का संकल्प लिया गया। इसके लिए गुजरी बाजार स्थित छत्ता अनंतराम के श्री विश्वनाथ महादेव मंदिर, जिसे बाबा विश्वनाथ मंदिर भी कहा जाता है, को चुना गया। मंदिर में आवश्यक मरम्मत, एक कमरे की छत ठीक कराने और रंगाई-पुताई का काम 12 अक्टूबर 2026 को शुरू किया गया। मंदिर के मौजूदा शिखर को ऊंचा बनाने की योजना पर भी विचार किया जा रहा है।

मंदिर के जीर्णोद्धार का यह काम केवल मरम्मत तक सीमित नहीं है। यह उस परिसर को सहेजने का प्रयास भी है, जिसे मेरठ की 1857 की क्रांति की स्मृतियों से जोड़ा जाता है। मंदिर के आंगन में मौजूद एक पुराने पीपल के पेड़ के बारे में स्थानीय परंपरा है कि क्रांति के बाद अंग्रेजों ने उसकी शाखाओं पर स्वतंत्रता सेनानियों को फांसी दी थी। पेड़ अब सूख चुका है, लेकिन परिसर में प्रतीक और स्मृति के रूप में मौजूद है। मंदिर में लगा शिलालेख भी शहीदों को याद करता है: “वे न हिन्दू थे, न मुसलमान थे, वे तो आजादी के दीवाने थे।”

मंदिर और 1857 की क्रांति से जुड़ी स्थानीय कथा
मेरठ विकास प्राधिकरण की ‘हेरिटेज मेरठ’ वेबसाइट पर छत्ता अनंतराम के बाबा विश्वनाथ मंदिर का उल्लेख है। उसके अनुसार, मंदिर का 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से गहरा संबंध रहा। वेबसाइट पर दर्ज स्थानीय ऐतिहासिक विवरण के मुताबिक, पेशवा नाना साहब के नेतृत्व में क्रांति की योजना का प्रचार मेरठ के सैनिक और गैर-सैनिक इलाकों में किया जाता था। मंदिर के पुजारी हरिदास वेश बदलकर लोगों को क्रांति के प्रति जागरूक करते थे। मंदिर परिसर का पीपल का पेड़ भी इसी स्मृति से जुड़ा बताया गया है।
मेरठ जिला प्रशासन के इतिहास-विवरण के अनुसार, 10 मई 1857 को मेरठ में ब्रिटिश शासन के खिलाफ भारतीय सैनिकों का विद्रोह भड़का। सैनिकों ने शहर पर नियंत्रण किया और दिल्ली की ओर कूच किया; रास्ते में आम लोग भी उनके साथ जुड़ते गए। इस घटना ने देश के अन्य हिस्सों में फैले स्वतंत्रता संग्राम को प्रेरित किया।

निर्माण काल पर स्रोतों में अंतर
मंदिर को 16वीं शताब्दी का बताया गया है और कहा गया है कि खुदाई के दौरान शिवलिंग प्रकट हुए थे। हालांकि, मेरठ विकास प्राधिकरण की हेरिटेज वेबसाइट मंदिर के निर्माण की सटीक अवधि के बारे में स्पष्ट जानकारी उपलब्ध न होने की बात कहती है। इसलिए 16वीं शताब्दी में निर्माण और खुदाई में शिवलिंग मिलने का विवरण आयोजकों की ओर से दिया गया है; इसे स्वतंत्र रूप से पुष्ट ऐतिहासिक तथ्य के रूप में स्थापित नहीं किया जा सका है।
मंदिर के इतिहास में समय-समय पर आए उतार-चढ़ाव के बाद वर्ष 1973 में इसके जीर्णोद्धार के लिए ‘श्री विश्वनाथ महादेव मंदिर समिति’ का गठन किया गया था। 1974 में ज्योतिर्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज अपने मेरठ के प्रथम आगमन पर इस शिवालय में भगवान शिव की उपासना के लिए आए थे।

हर वर्ष 10 मई को शहीदों को दी जाती है श्रद्धांजलि
मंदिर परिसर में हर वर्ष 10 मई को 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के अमर शहीदों को पुष्पांजलि अर्पित की जाती है। इस आयोजन में मंदिर और उससे जुड़ी क्रांतिकारी स्मृतियों को याद किया जाता है। जीर्णोद्धार के साथ परिसर की ऐतिहासिक पहचान को भी सुरक्षित रखने का प्रयास किया जा रहा है।
कार्यक्रम में राजकिशोर रस्तोगी, विवेक बाजपेयी, नरेंद्र उपाध्याय, संजय शर्मा, रिजवान, राजीव काले, बलराज गुप्ता, आकाश धवन, रविंद्र कौशिक, कुलदीप वाल्मीकि, संदीप रेवड़ी, गौरव शर्मा, निशांत धवन, विजय गुप्ता, आदित्य नागर, शादाब, विकास मित्तल, नितिन गोस्वामी और शिवा वैद्य सहित अन्य लोग मौजूद रहे।