राज्यसभा सांसद डॉ लक्ष्मीकांत वाजपेई
मेरठ/नई दिल्ली। भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सदैव सर्वोच्च माना गया है। गुरु केवल शिक्षा देने वाले व्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा दिखाने वाले मार्गदर्शक होते हैं। गुरु पूर्णिमा का पर्व इसी गुरु-शिष्य परंपरा, ज्ञान, संस्कार, अनुशासन और आत्मविकास के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का पावन अवसर है। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता, राज्यसभा सांसद एवं भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत बाजपेयी ने गुरु पूर्णिमा के अवसर पर सभी देशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए इस पर्व के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला गुरु पूर्णिमा पर्व भारतीय संस्कृति की प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा का प्रतीक है। यह दिन प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है।
महर्षि वेदव्यास की स्मृति में मनाई जाती है गुरु पूर्णिमा
डॉ. बाजपेयी ने बताया कि गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है, क्योंकि इसी दिन महान ऋषि महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। महर्षि वेदव्यास ने चारों वेदों का संकलन किया तथा महाभारत, श्रीमद्भागवत महापुराण सहित अनेक महान ग्रंथों की रचना कर भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध किया। उनके अतुलनीय योगदान के कारण यह दिन उनके सम्मान में मनाया जाता है। उन्होंने कहा कि वेदव्यास ने भारतीय संस्कृति, दर्शन और आध्यात्मिक ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया। इसलिए गुरु पूर्णिमा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि ज्ञान और संस्कृति के संरक्षण का भी उत्सव है।
गुरु का स्थान ईश्वर से भी श्रेष्ठ
डॉ. लक्ष्मीकांत बाजपेयी ने कहा कि भारतीय संस्कृति में गुरु को ईश्वर से भी श्रेष्ठ स्थान दिया गया है, क्योंकि गुरु ही मनुष्य को सत्य, धर्म और ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग दिखाते हैं।
उन्होंने प्रसिद्ध संस्कृत श्लोक का उल्लेख करते हुए कहा—
“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥”
अर्थात गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं, गुरु ही महेश्वर हैं और गुरु ही साक्षात् परब्रह्म हैं। ऐसे गुरु को बार-बार प्रणाम है।
संत कबीर ने भी बताया गुरु का महत्व उन्होंने संत कबीरदास के प्रसिद्ध दोहे का उल्लेख करते हुए कहा—
“गुरु गोविन्द दोउ खड़े, काके लागू पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय॥”
डॉ. बाजपेयी ने कहा कि कबीरदास का यह दोहा गुरु की महिमा को अत्यंत सरल और प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करता है। यदि गुरु न हों तो ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग भी कठिन हो जाता है। केवल आध्यात्मिक गुरु ही नहीं, जीवन के हर मार्गदर्शक का सम्मान उन्होंने कहा कि गुरु पूर्णिमा का संदेश केवल आध्यात्मिक गुरुओं तक सीमित नहीं है। माता-पिता, शिक्षक, आचार्य, प्रशिक्षक, समाज के मार्गदर्शक तथा जीवन में सही दिशा दिखाने वाले सभी व्यक्ति गुरु के समान सम्मान के अधिकारी हैं। उनके मार्गदर्शन से ही व्यक्ति का चरित्र निर्माण होता है और समाज मजबूत बनता है।
भगवान बुद्ध और भगवान महावीर से भी जुड़ा है इतिहास
डॉ. बाजपेयी ने बताया कि गुरु पूर्णिमा का ऐतिहासिक महत्व भी अत्यंत व्यापक है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान बुद्ध ने सारनाथ में अपने पाँच शिष्यों को प्रथम उपदेश देकर धर्मचक्र प्रवर्तन किया था। वहीं जैन परंपरा में इसी दिन भगवान महावीर के प्रथम शिष्य गौतम स्वामी को गुरु पद प्राप्त हुआ था। इस प्रकार गुरु पूर्णिमा बौद्ध, जैन और सनातन परंपराओं में समान रूप से श्रद्धा और सम्मान का पर्व माना जाता है।
ज्ञान, संस्कार और आत्मविकास का उत्सव
डॉ. लक्ष्मीकांत बाजपेयी ने कहा कि गुरु पूर्णिमा केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह ज्ञान, संस्कार, अनुशासन, कृतज्ञता और आत्मविकास का महापर्व है। यह पर्व हमें अपने गुरुओं के प्रति सम्मान व्यक्त करने, उनके आदर्शों पर चलने और समाज में सकारात्मक मूल्यों को आगे बढ़ाने की प्रेरणा देता है। उन्होंने सभी नागरिकों से आग्रह किया कि वे अपने जीवन में गुरुजनों का सम्मान करें, उनके बताए मार्ग पर चलें तथा ज्ञान और संस्कार की इस महान परंपरा को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का संकल्प लें। गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति की उस अमूल्य विरासत का प्रतीक है, जिसमें गुरु को जीवन का प्रकाश स्तंभ माना गया है। यह पर्व केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं, बल्कि ज्ञान, विनम्रता, कृतज्ञता और आत्मोन्नति का संदेश देता है। ऐसे पावन अवसर पर अपने गुरुजनों के प्रति सम्मान प्रकट करना ही इस पर्व की सबसे बड़ी सार्थकता है।