शिशु मंदिर में गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते वक्ता
मेरठ। भारतीय संस्कृति में गुरु को ईश्वर से भी उच्च स्थान दिया गया है। इसी परंपरा को जीवंत बनाए रखते हुए बालेराम बृजभूषण सरस्वती शिशु मंदिर वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, मेरठ में गुरु पूर्णिमा का पर्व अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया गया। विद्यालय परिसर पूरे दिन गुरु वंदना, वैदिक मंत्रोच्चार और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से गूंजता रहा। कार्यक्रम के माध्यम से विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति में गुरु के महत्व, गुरु-शिष्य परंपरा और जीवन में संस्कारों की आवश्यकता से परिचित कराया गया।
विद्यालय में आयोजित कार्यक्रम का शुभारंभ प्रधानाचार्य श्री प्रभात कुमार गुप्ता एवं मुख्य वक्ता श्री यशपाल सिंह द्वारा महर्षि वेदव्यास के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित कर किया गया। दीप प्रज्ज्वलन के साथ ही पूरे वातावरण में आध्यात्मिकता और अनुशासन का भाव दिखाई दिया। इसके बाद वैदिक मंत्रोच्चार एवं सरस्वती वंदना प्रस्तुत की गई, जिससे कार्यक्रम का वातावरण भक्तिमय हो गया।
महर्षि वेदव्यास के योगदान पर डाला प्रकाश
मुख्य वक्ता श्री यशपाल सिंह ने अपने प्रेरणादायी संबोधन में गुरु पूर्णिमा के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा इसलिए मनाई जाती है क्योंकि इसी दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। महर्षि वेदव्यास ने चारों वेदों का वर्गीकरण कर मानव समाज को ज्ञान का अमूल्य उपहार दिया, इसलिए इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।
उन्होंने कहा कि गुरु केवल शिक्षा देने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह जीवन का मार्गदर्शक, चरित्र निर्माता और संस्कारों का संवाहक होता है। आधुनिक युग में तकनीक चाहे कितनी भी विकसित हो जाए, गुरु का स्थान कभी कम नहीं हो सकता।
ऐतिहासिक और पौराणिक उदाहरणों से किया प्रेरित
अपने संबोधन के दौरान श्री यशपाल सिंह ने गुरु द्रोणाचार्य और अर्जुन, एकलव्य की गुरु भक्ति तथा महर्षि वशिष्ठ और भगवान श्रीराम के गुरु-शिष्य संबंधों का उल्लेख करते हुए विद्यार्थियों को बताया कि सफलता के लिए गुरु के प्रति समर्पण, अनुशासन और निष्ठा अत्यंत आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि गुरु वह दीपक है जो स्वयं जलकर दूसरों के जीवन को प्रकाशित करता है। विद्यार्थियों को उन्होंने स्वाध्याय, अनुशासन, सेवा और संस्कारों को जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाने का संदेश दिया।
उन्होंने यह भी कहा कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में माता-पिता प्रथम गुरु, शिक्षक द्वितीय गुरु और पुस्तकें तृतीय गुरु होती हैं। इन तीनों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का भाव ही व्यक्ति को श्रेष्ठ नागरिक बनाता है।
सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने बांधा समा
कार्यक्रम के दौरान विद्यालय के कक्षा 6 से 12 तक के छात्र-छात्राओं ने गुरु स्तुति, देशभक्ति गीत, प्रेरणादायक कविताएं तथा लघु नाटिका प्रस्तुत कर सभी का मन मोह लिया।
विशेष रूप से प्रस्तुत की गई गुरु-शिष्य परंपरा पर आधारित नाटिका ने दर्शकों को भारतीय संस्कृति की गौरवशाली विरासत का संदेश दिया। विद्यार्थियों की भावपूर्ण प्रस्तुतियों को उपस्थित शिक्षकों एवं अभिभावकों ने खूब सराहा।
शिक्षकों का तिलक कर लिया आशीर्वाद
कार्यक्रम का सबसे भावुक और आकर्षक क्षण तब आया जब सभी विद्यार्थियों ने मंच पर पहुंचकर अपने-अपने कक्षा शिक्षकों का तिलक किया, पुष्प अर्पित किए तथा चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया।
कई विद्यार्थियों ने अपने प्रिय शिक्षकों के सम्मान में स्वयं लिखी कविताएं और पत्र भी पढ़े। इस भावनात्मक दृश्य ने पूरे सभागार को भावुक कर दिया और गुरु-शिष्य के अटूट संबंध की गरिमा को साकार रूप में प्रस्तुत किया।
प्रधानाचार्य ने संस्कारयुक्त शिक्षा पर दिया बल
विद्यालय के प्रधानाचार्य श्री प्रभात कुमार गुप्ता ने सभी विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं अभिभावकों को गुरु पूर्णिमा की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि सरस्वती शिशु मंदिर में शिक्षा के साथ-साथ संस्कारों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है।
उन्होंने कहा कि गुरु पूर्णिमा हमें यह स्मरण कराती है कि किसी भी समाज की उन्नति शिक्षक और विद्यार्थी के मजबूत एवं सम्मानपूर्ण संबंधों पर निर्भर करती है। उन्होंने विद्यार्थियों से नियमित अध्ययन, समय की पाबंदी, अनुशासन और राष्ट्र सेवा का संकल्प लेने का आह्वान किया तथा शिक्षकों के समर्पण और परिश्रम की भी सराहना की।
प्रभावी संचालन और आकर्षक सजावट बनी विशेष आकर्षण
कार्यक्रम का संचालन विद्यालय के वरिष्ठ शिक्षक श्री सुरेंद्र कुमार शर्मा ने प्रभावी एवं सहज शैली में किया। उन्होंने गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व को सरल शब्दों में समझाते हुए कार्यक्रम की विभिन्न प्रस्तुतियों के बीच उत्कृष्ट समन्वय स्थापित किया।
विद्यालय परिसर को रंगोली, आकर्षक बैनरों एवं महर्षि वेदव्यास के चित्रों से सजाया गया था, जिससे पूरा वातावरण भारतीय संस्कृति की झलक प्रस्तुत कर रहा था।
राष्ट्रगान एवं प्रसाद वितरण के साथ हुआ समापन
कार्यक्रम के समापन पर राष्ट्रगान एवं शांति पाठ का आयोजन किया गया। इसके बाद सभी विद्यार्थियों, शिक्षकों एवं उपस्थित अतिथियों को प्रसाद वितरित किया गया।
विद्यालय परिवार ने संकल्प लिया कि गुरु पूर्णिमा का यह पावन पर्व प्रत्येक वर्ष इसी श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जाएगा, ताकि नई पीढ़ी भारतीय संस्कृति, गुरु-शिष्य परंपरा और अपने नैतिक मूल्यों से सदैव जुड़ी रहे।