युवा रचनाकार निकाशा लूथरा
चंडीगढ़। महज 19 वर्ष की उम्र में अभिनय, फिल्म निर्माण और लेखन के क्षेत्र में अपनी पहचान बना चुकी युवा रचनाकार निकाशा लूथरा ने अपने नए उपन्यास ‘लॉस्ट एंड फाउंड इन कश्मीर’ के प्रकाशन की घोषणा की है। कश्मीर की पृष्ठभूमि पर आधारित यह उपन्यास पहलगाम आतंकी हमले और उसके बाद लोगों के जीवन पर पड़े भावनात्मक प्रभावों से प्रेरित है।
चंडीगढ़ प्रेस क्लब में आयोजित मीडिया संवाद कार्यक्रम में निकाशा लूथरा ने बताया कि 270 पृष्ठों के इस उपन्यास को पूरा करने में लगभग दो वर्ष का समय लगा। पुस्तक में दुख, साहस, प्रेम, उम्मीद और भावनात्मक पुनर्निर्माण जैसे विषयों को संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया गया है। इस उपन्यास का प्रकाशन अनंता प्रेस पब्लिशिंग द्वारा किया गया है।
निकाशा पहले भी साहित्य और सिनेमा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर चुकी हैं। उन्होंने कविता संग्रह ‘डार्क ट्यूलिप्स’ तथा लघु नाटक संकलन ‘फ्लावर्स इन हर रूम’ का लेखन किया है। इसके अलावा वह ‘अनकहे ख्वाब’ और ‘सेहर की तलाश में’ जैसी फिल्मों का लेखन और निर्देशन भी कर चुकी हैं।
पहलगाम हमले ने दी कहानी को दिशा
उपन्यास की प्रेरणा के बारे में बात करते हुए निकाशा ने कहा कि पहलगाम में हुए आतंकी हमले ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। इस घटना ने उन्हें उन मानवीय कहानियों पर विचार करने के लिए प्रेरित किया जो अक्सर हिंसा और त्रासदी के बाद अनकही रह जाती हैं।
उन्होंने कहा, “यह कहानी भले ही काल्पनिक हो, लेकिन इसमें व्यक्त भावनाएं पूरी तरह वास्तविक हैं। मैं उन लोगों के जीवन को समझना चाहती थी जिनकी दुनिया किसी त्रासदी के कारण अचानक बदल जाती है। हिंसा के बाद जो भावनात्मक संघर्ष सामने आते हैं, वे अक्सर चर्चा का हिस्सा नहीं बन पाते।”
हीर और कबीर की भावनात्मक यात्रा
कश्मीर की खूबसूरत लेकिन संघर्षपूर्ण पृष्ठभूमि में रचा गया यह उपन्यास दो मुख्य पात्रों हीर और कबीर की कहानी को सामने लाता है। दोनों पात्र हिंसा के बाद उत्पन्न हुए नुकसान, बिछड़न, अनिश्चितता और मानसिक संघर्षों का सामना करते हैं।
यादों, संवादों और आत्ममंथन के माध्यम से कहानी यह दर्शाती है कि असाधारण परिस्थितियां किस प्रकार सामान्य लोगों के जीवन को हमेशा के लिए बदल देती हैं। उपन्यास में मानवीय रिश्तों की गहराई और विपरीत परिस्थितियों में उम्मीद की तलाश को विशेष रूप से उभारा गया है।
कहानी का महत्वपूर्ण किरदार है कश्मीर
निकाशा ने कहा कि कश्मीर केवल कहानी का स्थान नहीं, बल्कि एक जीवंत किरदार की तरह उपन्यास का हिस्सा है। घाटी की प्राकृतिक सुंदरता, उसका इतिहास और वहां का दर्द—इन सभी तत्वों ने कहानी को गहराई प्रदान की है।
उन्होंने कहा, “मेरा उद्देश्य हिंसा को सनसनीखेज बनाना नहीं था। मैं उन लोगों की भावनाओं और मानवीय अनुभवों को सामने लाना चाहती थी जो ऐसी घटनाओं से प्रभावित होते हैं। लेखन के दौरान सबसे बड़ी चुनौती संवेदनशीलता बनाए रखते हुए दुख और संघर्ष की सच्चाई को ईमानदारी से प्रस्तुत करना था।”
उपन्यास पर आधारित सिनेमाई प्रस्तुति भी तैयार
इस परियोजना की एक विशेषता यह भी है कि निकाशा लूथरा ने उपन्यास के कुछ चुनिंदा अध्यायों पर आधारित एक सिनेमाई रूपांतरण भी तैयार किया है। मीडिया संवाद के दौरान उपस्थित पत्रकारों और अतिथियों को इस लघु फिल्म की विशेष झलक दिखाई गई।
इस प्रस्तुति का उद्देश्य दर्शकों को पुस्तक के भावनात्मक संसार से दृश्यात्मक रूप में जोड़ना है। कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने इस प्रयास की सराहना की और इसे साहित्य तथा सिनेमा के प्रभावी समन्वय का उदाहरण बताया।
9 जून को होगा आधिकारिक विमोचन
युवा लेखिका निकाशा लूथरा का यह नया उपन्यास कश्मीर के सामाजिक और भावनात्मक परिदृश्य को मानवीय दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने का प्रयास है। साहित्य प्रेमियों और युवा पाठकों के बीच इस पुस्तक को लेकर विशेष उत्सुकता देखी जा रही है।