लोकधारा के रंगों से सजेगा उत्तर प्रदेश
लखनऊ, 24 सितंबर। उत्तर प्रदेश की समृद्ध कला, संस्कृति और जीवंत परंपराओं को नई पीढ़ी से जोड़ने तथा देशभर के कलाकारों को एक मंच उपलब्ध कराने के लिए प्रदेश में तीन प्रमुख कला आयोजन किए जाएंगे। अयोध्या, लखनऊ और वाराणसी में आयोजित होने वाले इन कला शिविरों में राम और रामायण की सांस्कृतिक परंपरा, देश की लोक एवं पारंपरिक चित्रकला तथा काशी और गंगा की आध्यात्मिक-सांस्कृतिक विरासत को कला के माध्यम से प्रस्तुत किया जाएगा।
राज्य ललित कला अकादमी और विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों के सहयोग से प्रस्तावित इन आयोजनों में वरिष्ठ कलाकारों के साथ युवा कलाकारों और कला विद्यार्थियों को भी संवाद, प्रशिक्षण और कला की विभिन्न विधाओं को करीब से समझने का अवसर मिलेगा।
अयोध्या में ‘राम, रामायण और अयोध्या’ राष्ट्रीय कार्यशाला
अयोध्या में 22 से 26 अक्टूबर तक डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के सहयोग से राम की पैड़ी और गुप्तार घाट पर ‘राम, रामायण और अयोध्या’ राष्ट्रीय कार्यशाला एवं व्याख्यान श्रृंखला आयोजित की जाएगी। इसमें करीब 25 कलाकारों और 10 विशेषज्ञों की भागीदारी प्रस्तावित है।
इस आयोजन का केंद्र राम, रामायण और अयोध्या की सांस्कृतिक विरासत होगी। कार्यशाला एवं व्याख्यान श्रृंखला के माध्यम से अयोध्या की जीवंत सांस्कृतिक परंपराओं को कला के माध्यम से अभिव्यक्त करने का प्रयास किया जाएगा। साथ ही कलाकारों, विशेषज्ञों और नई पीढ़ी के बीच संवाद स्थापित किया जाएगा।
लखनऊ में पांच दिवसीय ‘लोकधारा’ कला शिविर
राजधानी लखनऊ में 18 से 22 नवंबर तक राज्य ललित कला अकादमी की ओर से ‘लोकधारा’ लोक एवं पारंपरिक कला शिविर आयोजित किया जाएगा। इसका उद्देश्य देश की लोक एवं पारंपरिक कला शैलियों को जीवंत मंच उपलब्ध कराना और नई पीढ़ी को इन विधाओं से जोड़ना है।

शिविर में प्रसिद्ध कलाकारों, युवा विद्यार्थियों और कला प्रेमियों को एक साथ आने का अवसर मिलेगा। इसमें पद्मश्री सम्मानित कलाकारों, राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कलाकारों और पारंपरिक कला के वरिष्ठ साधकों के साथ करीब 35 से 40 लोक एवं पारंपरिक कला कलाकारों की भागीदारी प्रस्तावित है। इसके अलावा लखनऊ और आसपास के संस्थानों से 25 चयनित वरिष्ठ कला विद्यार्थी भी शिविर में शामिल होंगे।
गोंड से मधुबनी और भील से पिथौरा तक दिखेगा लोककला का वैविध्य
‘लोकधारा’ में देश की विभिन्न पारंपरिक कला शैलियों को एक मंच पर प्रस्तुत किया जाएगा। प्रस्तावित प्रतिभागियों में गोंड, भील, गोदना, पिथौरा, राजस्थानी, कोहबर और मधुबनी जैसी लोक एवं पारंपरिक कला विधाओं से जुड़े कलाकार शामिल होंगे।
पद्मश्री दुर्गाबाई, पद्मश्री भूरीबाई, पद्मश्री शिवम पासवान, पद्मश्री परेश रावुआ, पद्मश्री महावीर स्वामी और पद्मश्री श्याम शर्मा जैसे वरिष्ठ कलाकारों के साथ देश के विभिन्न हिस्सों के कलाकार तथा उत्तर प्रदेश के युवा कलाकार इसमें भाग लेंगे।
आयोजन का उद्देश्य केवल पारंपरिक कलाओं का प्रदर्शन करना नहीं, बल्कि उनके पीछे मौजूद तकनीक, प्रक्रिया और सांस्कृतिक संदर्भ को नई पीढ़ी तक पहुंचाना भी है। इसके माध्यम से युवा कलाकार वरिष्ठ कलाकारों से सीधे सीख सकेंगे और पारंपरिक कला विधाओं की समकालीन प्रासंगिकता को समझ सकेंगे।
लाइव प्रदर्शन और मास्टरक्लास होंगे आकर्षण
पांच दिवसीय ‘लोकधारा’ में विभिन्न गतिविधियां आयोजित की जाएंगी। 18 नवंबर को उद्घाटन और स्टूडियो की शुरुआत के साथ कलाकारों का परिचय तथा कला निर्माण शुरू होगा। 19 नवंबर को वरिष्ठ कलाकारों के लाइव प्रदर्शन और तकनीकी संवाद का आयोजन होगा।
20 नवंबर को मास्टरक्लास, रचनात्मक अभ्यास और मार्गदर्शन दिया जाएगा। 21 नवंबर को पारंपरिक तकनीकों पर प्रदर्शन, सवाल-जवाब और व्यावहारिक प्रशिक्षण होगा। 22 नवंबर को अंतिम कला प्रदर्शन, प्रदर्शनी की झलक और समापन कार्यक्रम प्रस्तावित है।
आयोजन में लखनऊ विश्वविद्यालय के ललित कला संकाय, डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय के ललित कला विभाग, एमिटी विश्वविद्यालय लखनऊ, गोयल इंस्टीट्यूट ऑफ हायर स्टडीज, टेक्नो इंस्टीट्यूट ऑफ हायर स्टडीज और वामसी इंस्टीट्यूट ऑफ फाइन आर्ट्स एंड डिजाइन समेत कई संस्थानों का सहयोग रहेगा।
काशी में गंगा की लहरों से प्रेरित होगा ‘काशी फ्लो’
वाराणसी में दिसंबर 2026 के दूसरे सप्ताह में गंगा तट पर चार दिवसीय ‘काशी फ्लो’ अंतरराष्ट्रीय कला शिविर एवं प्रदर्शनी आयोजित की जाएगी। इसका आयोजन गंगा महासभा और राज्य ललित कला अकादमी उत्तर प्रदेश के संयुक्त सहयोग से प्रस्तावित है।
‘काशी फ्लो’ में गंगा, काशी और उत्तर प्रदेश की आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत को कला की भाषा में अभिव्यक्त करने का प्रयास किया जाएगा। आयोजन में देश के अलग-अलग हिस्सों से कलाकारों की भागीदारी होगी। प्रस्तावित प्रतिभागियों में वाराणसी, वृंदावन, देहरादून, मथुरा, दिल्ली, जयपुर, भोपाल, ओडिशा, लखीमपुर, सिरसा, मऊ, मेरठ समेत अन्य स्थानों के कलाकार शामिल होंगे।
कला के माध्यम से जीवंत विरासत को दस्तावेजी रूप देने की पहल
‘काशी फ्लो’ के माध्यम से देश और विदेश के कलाकारों को उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत, उसके संरक्षण और समृद्ध परंपराओं को कला के माध्यम से समझने और प्रस्तुत करने का अवसर देने की परिकल्पना की गई है।
इस आयोजन में कला, आध्यात्मिकता, विरासत, स्थानीय लोगों और गंगा के बीच संबंध को केंद्र में रखा जाएगा। अयोध्या की राम परंपरा, काशी विश्वनाथ धाम और प्रयागराज की कुंभ परंपरा जैसे प्रमुख सांस्कृतिक प्रतीकों से जुड़ी विरासत को भी रचनात्मक अभिव्यक्ति देने का प्रयास किया जाएगा।
वरिष्ठ कलाकारों का अनुभव युवा प्रतिभाओं तक पहुंचाने पर जोर
पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने कहा कि उत्तर प्रदेश की कला और संस्कृति प्रदेश की पहचान के साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए महत्वपूर्ण विरासत है। सरकार का प्रयास है कि इस विरासत को केवल संग्रहालयों और अभिलेखों तक सीमित न रखते हुए कलाकारों, विद्यार्थियों और आम लोगों के जीवन से जोड़ा जाए।
उन्होंने कहा कि अयोध्या में राम और रामायण की सांस्कृतिक परंपरा, लखनऊ में लोक एवं पारंपरिक कलाओं तथा वाराणसी में गंगा और काशी की आध्यात्मिक विरासत को केंद्र में रखकर होने वाले ये आयोजन इसी दिशा में एक पहल हैं। वरिष्ठ और प्रसिद्ध कलाकारों के अनुभव को युवा प्रतिभाओं तक पहुंचाने, पारंपरिक कला विधाओं को समकालीन संदर्भ में आगे बढ़ाने और प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को नई रचनात्मक भाषा में प्रस्तुत करने पर जोर दिया जा रहा है।
परंपरा, रचनात्मकता और नई पीढ़ी के बीच संवाद पर जोर
अपर मुख्य सचिव पर्यटन, संस्कृति एवं धर्मार्थ कार्य विभाग अमृत अभिजात ने बताया कि तीनों आयोजनों का व्यापक उद्देश्य परंपरा, रचनात्मकता और नई पीढ़ी के बीच निरंतर संवाद स्थापित करना है।
उन्होंने बताया कि ‘लोकधारा’ के माध्यम से नए कलाकारों को पारंपरिक कला में व्यावहारिक प्रशिक्षण, वरिष्ठ कलाकारों से सीधे सीखने और नई कलाकृतियां तैयार करने का अवसर मिलेगा। कला तकनीकों और प्रक्रियाओं के दस्तावेजीकरण पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। कलाकारों, शिक्षण संस्थानों और समुदाय के बीच सहयोग को मजबूत करने के साथ भविष्य में इसे वार्षिक आयोजन के रूप में आगे बढ़ाने की संभावना भी रखी गई है।
अयोध्या और वाराणसी के आयोजन भी कला के माध्यम से उत्तर प्रदेश की जीवंत विरासत को नई पीढ़ी और व्यापक कला समुदाय तक पहुंचाने की दिशा में काम करेंगे। इन पहलों के जरिए कला, विरासत, सीख और रचनात्मकता को एक साथ जोड़ते हुए ‘हमारी संस्कृति, हमारी ताकत’ की भावना को आगे बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा।