भारतीय ज्ञान परंपरा पर सारगर्भित व्याख्यान संपन्न, पर्यावरण दिवस पर हवन एवं वृक्षारोपण
मेरठ। विद्या भारती द्वारा आयोजित दस दिवसीय “आचार्य दक्षता वर्ग” के पांचवें दिवस पर शास्त्री नगर स्थित बालेराम बृजभूषण सरस्वती शिशु मंदिर वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में भारतीय ज्ञान परंपरा विषय पर एक प्रेरणादायी एवं ज्ञानवर्धक व्याख्यान का आयोजन किया गया। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर कार्यक्रम की शुरुआत पर्यावरण शुद्धि हेतु वैदिक हवन एवं वृक्षारोपण के साथ हुई। इस अवसर पर प्रांत भर से आए 150 से अधिक आचार्यों ने सहभागिता कर भारतीय संस्कृति, शिक्षा और वैज्ञानिक परंपराओं के विविध आयामों पर चिंतन किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन एवं सामूहिक सरस्वती वंदना से हुआ। शिशु शिक्षा समिति के प्रदेश निरीक्षक श्री मदनपाल ने प्रस्तावना रखते हुए कहा कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में भारतीय ज्ञान परंपरा का समावेश समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को भारत के गौरवशाली ज्ञान-विज्ञान से परिचित कराना शिक्षकों का महत्वपूर्ण दायित्व है।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता विद्या भारती के प्रांतीय शैक्षिक प्रमुख श्री महेश शर्मा ने “भारतीय ज्ञान परंपरा : अतीत से वर्तमान तक” विषय पर विस्तृत व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि भारत केवल आध्यात्मिक चेतना का केंद्र नहीं रहा, बल्कि विज्ञान, गणित, खगोलशास्त्र और चिकित्सा विज्ञान का भी प्राचीन एवं समृद्ध स्रोत रहा है। उन्होंने अनेक ऐतिहासिक एवं वैज्ञानिक उदाहरणों के माध्यम से भारतीय मनीषियों के योगदान को रेखांकित किया।
श्री शर्मा ने महान गणितज्ञ एवं खगोलशास्त्री आर्यभट्ट के योगदान का उल्लेख करते हुए बताया कि उन्होंने पांचवीं शताब्दी में ही पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने की अवधारणा प्रस्तुत कर दी थी, जिससे दिन और रात होने का वैज्ञानिक आधार स्पष्ट होता है। उन्होंने कहा कि आर्यभटीय ग्रंथ में पाई के मान की सटीक व्याख्या तथा वर्गमूल और घनमूल निकालने की विधियां वर्णित हैं, जो भारत की वैज्ञानिक प्रतिभा का प्रमाण हैं।
उन्होंने ब्रह्मगुप्त के योगदान का उल्लेख करते हुए बताया कि शून्य को संख्या के रूप में स्थापित करने और ऋणात्मक संख्याओं के नियम निर्धारित करने का श्रेय उन्हें जाता है। उनके ग्रंथ “ब्राह्मस्फुट सिद्धांत” में वर्णित बीजगणितीय सिद्धांत आज भी गणित के क्षेत्र में महत्वपूर्ण माने जाते हैं। उन्होंने कहा कि दशमलव प्रणाली और स्थानमान पद्धति जैसी महत्वपूर्ण अवधारणाएं भारत की विश्व को अमूल्य देन हैं।
खगोल विज्ञान के क्षेत्र में भारतीय उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए श्री शर्मा ने कहा कि भारतीय कालगणना प्रणाली अत्यंत सूक्ष्म एवं वैज्ञानिक है। ग्रहों की स्थिति, नक्षत्रों की गणना तथा खगोलीय घटनाओं के अध्ययन में भारत सदैव अग्रणी रहा है। उन्होंने बताया कि आर्यभट्ट ने सूर्य एवं चंद्र ग्रहण का वैज्ञानिक कारण स्पष्ट करते हुए इसे पृथ्वी और चंद्रमा की छाया से उत्पन्न घटना बताया था।
व्याख्यान के दौरान उन्होंने आयुर्वेद एवं शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में आचार्य सुश्रुत के योगदान पर भी विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सुश्रुत संहिता में 300 प्रकार की शल्य क्रियाओं, 125 से अधिक शल्य उपकरणों तथा प्लास्टिक सर्जरी जैसी उन्नत चिकित्सा पद्धतियों का वर्णन मिलता है। राइनोप्लास्टी अर्थात नाक की पुनर्रचना की तकनीक का विकास भारत में लगभग 600 ईसा पूर्व ही हो चुका था।
उन्होंने वराहमिहिर की “पंचसिद्धांतिका” तथा भास्कराचार्य द्वितीय के “सिद्धांत शिरोमणि” का उल्लेख करते हुए बताया कि इनमें ग्रहों की गति, खगोलीय गणनाओं तथा गुरुत्वाकर्षण संबंधी सिद्धांतों का वर्णन मिलता है। उन्होंने कहा कि ये सभी वैज्ञानिक अवधारणाएं यूरोप में स्थापित होने से कई शताब्दियों पूर्व भारत में प्रतिपादित की जा चुकी थीं।
अपने संबोधन के समापन में श्री महेश शर्मा ने कहा कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था को अपनी जड़ों से जोड़ने की आवश्यकता है। उन्होंने आचार्यों का आह्वान किया कि वे गणित पढ़ाते समय आर्यभट्ट और ब्रह्मगुप्त, विज्ञान में कणाद और नागार्जुन तथा चिकित्सा विज्ञान में चरक और सुश्रुत जैसे महान विद्वानों का उल्लेख अवश्य करें, ताकि विद्यार्थियों में राष्ट्रीय गौरव और अनुसंधान की भावना विकसित हो सके।
कार्यक्रम के अंत में कमला देवी सरस्वती शिशु मंदिर की प्रधानाचार्या श्रीमती गीता अग्रवाल ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने घोषणा की कि आगामी शैक्षिक सत्र से प्रत्येक विद्यालय में “भारतीय ज्ञान परंपरा कोना” स्थापित किया जाएगा, जिसके माध्यम से विद्यार्थियों को भारतीय ज्ञान-विज्ञान की समृद्ध विरासत से परिचित कराया जाएगा।
इस अवसर पर विद्यालय के प्रधानाचार्य श्री प्रभात गुप्ता, मनोहर देवी शिशु वाटिका की प्रधानाचार्या श्रीमती सीमा श्रीवास्तव, वर्ग संयोजक श्री हरिशंकर सहित अनेक शिक्षाविद् एवं आचार्य उपस्थित रहे।