बड़ौत के श्री अजीतनाथ सभागार में मंगल प्रवचन करते आचार्य श्री आर्जर्व सागर जी महाराज
बड़ौत के श्री अजितनाथ सभागार में आचार्य श्री ने धर्म, संयम, अहिंसा, सत्य और आत्मचिंतन का दिया संदेश
बड़ौत । नगर के श्री अजितनाथ सभागार में विराजमान परम पूज्य आचार्य श्री आर्जवसागर महाराज ने मंगल प्रवचन में श्रद्धालुओं को धर्म के वास्तविक स्वरूप और मनुष्य जीवन के महत्व का संदेश दिया। धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ है। चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के पश्चात प्राप्त यह मनुष्य भव आत्मकल्याण का श्रेष्ठ अवसर है। इसलिए मनुष्य को अपना जीवन केवल सांसारिक सुख-सुविधाओं को प्राप्त करने में नहीं लगाना चाहिए, बल्कि धर्म, संयम, सदाचार और आत्मचिंतन के माध्यम से इसे सार्थक बनाना चाहिए।
आचरण में दिखाई देना चाहिए धर्म
आचार्य श्री आर्जवसागर महाराज ने कहा कि धर्म केवल मंदिर जाने, पूजा-पाठ करने अथवा धार्मिक क्रियाएं करने तक सीमित नहीं है। धर्म का वास्तविक स्वरूप व्यक्ति के आचरण में दिखाई देना चाहिए। यदि हमारे विचार, वाणी और व्यवहार किसी जीव को पीड़ा पहुंचाते हैं तो हमें स्वयं के भीतर झांककर आत्मचिंतन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि सच्चा धर्म वही है, जो व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाए, उसे बुराइयों से दूर करे और आत्मा को निर्मल बनाने की प्रेरणा दे। धार्मिकता का प्रभाव व्यक्ति के व्यवहार, विचार और जीवनशैली में दिखाई देना चाहिए।
पांच पापों से बचने का लिया जाए संकल्प
आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य के जीवन में अनेक प्रकार के विकार आते हैं। इन विकारों पर विजय पाने के लिए सबसे पहले पांच पापों का त्याग करने का संकल्प लेना आवश्यक है। उन्होंने हिंसा, असत्य, चोरी, कुशील और परिग्रह को पाप बताते हुए श्रद्धालुओं से इनसे दूर रहने का आह्वान किया। साथ ही सप्त व्यसनों का त्याग करने की भी प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि इन बुराइयों से दूरी बनाकर व्यक्ति अपने जीवन को अधिक शांत, संयमित और संस्कारित बना सकता है। आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने के लिए बाहरी दिखावे से अधिक जरूरी अपने आचरण में सुधार करना है।
अहिंसा और करुणा को जीवन में दें स्थान
आचार्य श्री ने कहा कि किसी भी जीव को मन, वचन अथवा काय से पीड़ा पहुंचाना हिंसा है। इसलिए मनुष्य को अपने व्यवहार में अधिक से अधिक अहिंसा और करुणा को स्थान देना चाहिए। छोटे से छोटे जीव के प्रति भी दया और संवेदना का भाव रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि क्रोध, द्वेष और कटुता भी हिंसक प्रवृत्तियों को जन्म देती हैं। इसलिए मनुष्य को अपने मन को शांत रखने और दूसरों के प्रति प्रेम, करुणा तथा सद्भाव की भावना विकसित करने का प्रयास करना चाहिए।
सत्य और हितकारी वाणी का करें प्रयोग
असत्य के संबंध में आचार्य श्री ने कहा कि झूठ बोलना केवल किसी दूसरे व्यक्ति को धोखा देना नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति को उसके आत्मस्वरूप से भी दूर करता है। परिस्थितियां कैसी भी हों, मनुष्य को सत्य और हितकारी वाणी का आश्रय लेना चाहिए। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि हमारी वाणी ऐसी होनी चाहिए जिससे किसी के मन को अनावश्यक पीड़ा न पहुंचे। सत्य बोलने के साथ यह भी आवश्यक है कि हमारी भाषा में विनम्रता और हित की भावना बनी रहे।
ईमानदारी और संतोष से जीवन बने सुखद
चोरी के विषय में आचार्य श्री ने कहा कि जो वस्तु हमें स्वेच्छा से प्राप्त नहीं हुई है, उसे लेना चोरी है। व्यक्ति को किसी दूसरे के धन, वस्तु अथवा अधिकार पर अपना अधिकार नहीं समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि ईमानदारी और संतोष से अर्जित जीवन ही वास्तव में सुखद और सम्मानपूर्ण होता है। दूसरे के अधिकार का सम्मान करना और अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप जीवन जीना व्यक्ति को मानसिक शांति प्रदान करता है।
इंद्रियों पर संयम और विचारों में पवित्रता जरूरी
आचार्य श्री ने श्रद्धालुओं को इंद्रियों पर संयम रखने की प्रेरणा देते हुए कहा कि मनुष्य को अपने विचारों और व्यवहार में पवित्रता बनाए रखनी चाहिए। विषय-वासनाओं में उलझने के बजाय आत्मचिंतन, स्वाध्याय और सदाचार की ओर बढ़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि संयमित जीवन व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाता है और वास्तविक शांति की अनुभूति कराता है। आत्मसंयम केवल धार्मिक जीवन का हिस्सा नहीं, बल्कि स्वस्थ और संस्कारित जीवन की आधारशिला भी है।
आवश्यकता से अधिक संग्रह बढ़ाता है चिंता
परिग्रह के संबंध में आचार्य श्री ने कहा कि आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह मनुष्य को वस्तुओं का स्वामी कम और उनका दास अधिक बना देता है। जैसे-जैसे संग्रह बढ़ता है, वैसे-वैसे चिंता और मोह भी बढ़ता जाता है। उन्होंने श्रद्धालुओं को आवश्यकता के अनुसार जीवन जीने और परिग्रह को कम करने की प्रेरणा दी। आचार्य श्री ने कहा कि संतोष और त्याग से मन हल्का होता है तथा व्यक्ति आत्मिक शांति का अनुभव कर सकता है।
समाज में बदलाव के लिए पहले स्वयं को बदलना होगा
आचार्य श्री ने कहा कि आज समाज में अशांति का एक बड़ा कारण यह है कि मनुष्य बाहर की दुनिया को बदलना चाहता है, लेकिन स्वयं के भीतर परिवर्तन करने का प्रयास कम करता है। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन से बुराइयों को दूर करने का संकल्प ले तो परिवार, समाज और राष्ट्र का वातावरण स्वतः सकारात्मक हो सकता है। उन्होंने कहा कि दूसरों की गलतियां देखने के बजाय मनुष्य को सबसे पहले अपने भीतर झांकना चाहिए। आत्मसुधार की शुरुआत स्वयं से होती है। व्यक्ति अपने आचरण को सुधार ले तो उसका प्रभाव उसके परिवार और समाज पर भी पड़ता है।
बच्चों को धर्म और संस्कारों की शिक्षा देने पर जोर
आचार्य श्री ने परिवारों से बच्चों को धर्म, संस्कार, अहिंसा, सत्य और संयम की शिक्षा देने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि संस्कारित बालक ही आगे चलकर संस्कारित समाज का निर्माण करते हैं। बच्चों को केवल पुस्तकीय शिक्षा देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके भीतर अच्छे संस्कार और मानवीय मूल्यों का विकास करना भी आवश्यक है।
प्रतिदिन करें आत्मनिरीक्षण
आचार्य श्री ने श्रद्धालुओं को प्रतिदिन आत्मनिरीक्षण करने की प्रेरणा देते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं से पूछना चाहिए कि उसने दिनभर में किसी जीव को कितना सुख दिया, कितने असत्य से बचा, किसी दूसरे की वस्तु या अधिकार पर अनुचित दृष्टि तो नहीं रखी, अपने आचरण को कितना संयमित रखा और अनावश्यक संग्रह की प्रवृत्ति को कितना कम किया। उन्होंने कहा कि इसी प्रकार का नियमित आत्मनिरीक्षण धीरे-धीरे व्यक्ति के जीवन को धर्ममय बनाने में सहायक होता है।
मनुष्य जीवन क्षणभंगुर, आत्मकल्याण का अवसर न गंवाएं
आचार्य श्री ने कहा कि जीवन क्षणभंगुर है और समय निरंतर निकलता जा रहा है। इसलिए जब तक मनुष्य भव प्राप्त है, तब तक धर्म का आश्रय लेकर आत्मा के कल्याण की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। पांच पापों से बचने का संकल्प केवल धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण, संयमित और सदाचारपूर्ण जीवन की आधारशिला है।
प्रवचन के दौरान आचार्य श्री ने कहा—
“चिंता चिता समान है, बिंदु मात्र का भेद।
एक दहे निर्जीव को, एक जीव समेत॥”
मंगल प्रवचन के अंत में आचार्य श्री आर्जवसागर महाराज ने श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन, स्वाध्याय, संयम, अहिंसा, सत्य और सदाचार को अपने जीवन का हिस्सा बनाने की प्रेरणा दी।
श्रद्धालुओं की रही उपस्थिति
धर्मसभा में मुकेश जैन, प्रदीप जैन, वरदान जैन, नवीन जैन, राकेश जैन, अनिल जैन, महेंद्र जैन, वकील चंद जैन, संजीव जैन सहित अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे। कार्यक्रम के संबंध में जानकारी वरदान जैन, मीडिया प्रभारी द्वारा दी गई।