आचार्य श्री आर्जवसागर महाराज
श्री अजितनाथ सभागार मंडी बड़ौत में विराजमान आचार्य श्री आर्जवसागर महाराज ने अपने प्रवचन के दौरान बताया कि मनुष्य जिन वस्तुओं, संबंधों और सुख-सुविधाओं को अपना मानकर उनसे गहरा लगाव बना लेता है, कई बार वही उसके दुःख और चिंता का कारण बन जाते हैं। इच्छाओं की पूर्ति के लिए निरंतर प्रयास करने के बाद भी मन की तृष्णा समाप्त नहीं होती। जीवन में वास्तविक संतुलन तब आता है, जब व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं और अनावश्यक लालसाओं के बीच अंतर समझता है तथा बदलती परिस्थितियों को सहजता से स्वीकार करना सीखता है। उन्होंने अनावश्यक आसक्ति छोड़ने, वर्तमान को समझने और विवेकपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा भी दी।
आचार्य श्री ने कहा कि मनुष्य अक्सर वस्तुओं और संबंधों को स्थायी मानकर उनसे अत्यधिक अपेक्षाएँ जोड़ लेता है। जब परिस्थितियाँ उसकी इच्छा के अनुरूप नहीं रहतीं, तब निराशा, क्रोध और मानसिक तनाव उत्पन्न हो सकते हैं। जीवन में संतुलन बनाए रखने के लिए यह समझना आवश्यक है कि प्रत्येक वस्तु और परिस्थिति परिवर्तनशील है।
उन्होंने कहा कि मोह से मुक्त होने का अर्थ अपने कर्तव्यों या संबंधों से विमुख होना नहीं है। इसका आशय है कि व्यक्ति अपने दायित्वों का निर्वाह करते हुए अनावश्यक अधिकार-भाव और आसक्ति से बचे। दूसरों के प्रति सम्मान बनाए रखना, परिस्थितियों को स्वीकार करना और अपनी इच्छाओं पर विवेकपूर्ण नियंत्रण रखना जीवन को अधिक सहज बनाता है।

शरीर और जीवन के प्रति अत्यधिक मोह भी मनुष्य को वास्तविकता से दूर कर सकता है। स्वास्थ्य, आयु और परिस्थितियाँ सदैव एक जैसी नहीं रहतीं। इस सत्य को समझने का उद्देश्य भय उत्पन्न करना नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करना, अपने आचरण को बेहतर बनाना और अनावश्यक अहंकार से बचना है।
भौतिक सुखों की इच्छा मनुष्य को लगातार नए साधन जुटाने के लिए प्रेरित करती है। एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा जन्म ले सकती है। यदि प्रसन्नता को केवल वस्तुओं की प्राप्ति से जोड़ दिया जाए, तो संतोष दूर होता जाता है। इसलिए आवश्यकताओं की पहचान करना और लालसाओं को सीमित रखना मानसिक शांति के लिए महत्त्वपूर्ण है।
सच्चा संतोष प्रयास छोड़ देने में नहीं, बल्कि विवेक के साथ प्रयास करने और परिणामों के प्रति अनावश्यक आसक्ति से बचने में है। व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार कार्य करे, अपनी जिम्मेदारियों को निभाए और उपलब्ध साधनों का उचित उपयोग करे—यही संतुलित जीवन की पहचान है।
सभा का संचालन ब्रह्मचारिणी ऋषिका दीदी ने किया।
सभा में मुकेश जैन,प्रदीप जैन,वरदान जैन,नवीन जैन,ऋषभ जैन,विकास जैन,अनुज जैन,इंद्राणी जैन,ऊषा जैन,डिंपल जैन,रश्मि जैन आदि उपस्थित थे।
मीडिया प्रभारी वरदान जैन ने बताया की 25 अक्टूबर को दिल्ली के लाल किला मैदान में दिगंबर जैन इंटर कॉलेज बड़ौत के पूर्व प्राचार्य श्री वकील चंद जैन सहित 6 दीक्षार्थी भाइयों की दिगंबर मुनि दीक्षा, आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज ससंघ के सानिध्य में संपन्न होगी जिसमें बड़ौत से भी लगभग 1000 से अधिक जैन लोगों के जाने की संभावना है।