आचार्य श्री सौरभ सागर जी मुनिराज
असौड़ा हाउस स्थित श्री 1008 शांतिनाथ दिगंबर जैन पंचायत मंदिर में रविवार, 25 अक्टूबर 2026 को परम पूज्य ज्ञानयोगी आचार्य श्री सौरभ सागर जी मुनिराज के मंगल सान्निध्य एवं पावन मुखारविंद से भव्य श्री शांति विधान का आयोजन श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ संपन्न हुआ। कार्यक्रम में श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता कर धर्मलाभ प्राप्त किया।

विधानाचार्य पंडित श्री संदीप शास्त्री जी के निर्देशन में विधान की धार्मिक क्रियाएं विधिपूर्वक संपन्न कराई गईं। विधान के अंतर्गत श्रद्धालुओं द्वारा क्रमशः 8, 16, 32 एवं 64 अर्घ्य समर्पित कर जिनेंद्र भगवान की आराधना की गई। पूरे आयोजन के दौरान मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण से सराबोर रहा।
इस अवसर पर परम पूज्य ज्ञानयोगी आचार्य श्री सौरभ सागर जी मुनिराज ने धर्म, संस्कार एवं भारतीय संस्कृति के महत्व पर प्रकाश डालते हुए प्रेरणा दी कि धर्म केवल मंदिर जाने और पूजा-पाठ करने तक सीमित नहीं है, बल्कि धर्म का वास्तविक स्वरूप हमारे आचरण, व्यवहार और विचारों में दिखाई देना चाहिए। जिस जीवन में सत्य, अहिंसा, क्षमा, करुणा और विनम्रता का वास है, वही जीवन सच्चे अर्थों में धर्ममय है।

आचार्य श्री ने संस्कारों की महत्ता बताते हुए कहा कि बच्चों को केवल शिक्षित करना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उनमें अच्छे संस्कार, बड़ों के प्रति सम्मान, माता-पिता के प्रति कृतज्ञता तथा जीवमात्र के प्रति दया और करुणा का भाव जागृत करना भी आवश्यक है। संस्कार ही व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करते हैं और चरित्र ही समाज एवं राष्ट्र की वास्तविक पहचान बनता है।

भारतीय संस्कृति की विशेषता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति त्याग, तप, संयम, सहिष्णुता और परस्पर सद्भाव की संस्कृति है। हमें अपनी धार्मिक परंपराओं एवं नैतिक मूल्यों को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का संकल्प लेना चाहिए। जैन धर्म का अहिंसा सिद्धांत हमें सिखाता है कि मन, वचन और कर्म से किसी भी जीव को पीड़ा न पहुँचाएँ तथा अपने जीवन में प्रेम, शांति और सद्भाव को स्थान दें।
आचार्य श्री ने श्रद्धालुओं को प्रेरित किया कि धार्मिक आयोजनों की सार्थकता तभी है, जब उनसे प्रेरणा लेकर हम अपने जीवन में सद्गुणों को अपनाएँ। धर्म को अपने जीवन का आधार, संस्कारों को अपनी पहचान और संस्कृति को अपनी धरोहर बनाकर ही हम एक आदर्श समाज का निर्माण कर सकते हैं।