परम पूज्य आचार्य श्री सौरभ सागर जी
मेरठ। गुरुवर परम पूज्य आचार्य श्री सौरभ सागर जी महामुनिराज के मेरठ आगमन के बाद जैन समाज में धार्मिक उत्साह और भक्ति का वातावरण बना हुआ है। आचार्य श्री के चरण कमल मेरठ की पावन धरा पर पड़ने के बाद से ही धर्मानुरागियों में उत्साह के साथ संस्कार और आध्यात्मिक चेतना का वातावरण दिखाई दे रहा है। प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु आचार्य श्री के दर्शन एवं आशीर्वाद के लिए पहुंच रहे हैं। मंगलवार को भी प्रातःकालीन और सायंकालीन गुरु भक्ति के दौरान सैकड़ों श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की चरण वंदना कर भक्ति भाव से उनका आशीर्वाद प्राप्त किया।
आचार्य श्री सौरभ सागर जी महाराज ने अपने आशीर्वचन में श्रद्धालुओं को शुभ उपयोग और शुद्ध उपयोग का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि गृहस्थ जीवन में शुभ उपयोग का विशेष महत्व है और इसके साधन साधुओं के चातुर्मास अथवा उनके प्रवास के दौरान किसी न किसी रूप में प्राप्त होते हैं। जब मुनिराज हमारे बीच नहीं होते, तब परमात्मा की प्रतिमा भी शुभ उपयोग का माध्यम बनती है। यदि मुनिराज भी आसपास न हों और परमात्मा की प्रतिमा भी उपलब्ध न हो, तब व्यक्ति के भीतर विद्यमान अच्छे संकल्पों का ईमानदारी से पालन करना भी शुभ उपयोग का माध्यम बन सकता है।
आचार्य श्री ने समझाया कि शुभ उपयोग का अर्थ है अपने तन, वचन और मन का अच्छे कार्यों में उपयोग करना। उन्होंने कहा कि जब तन का अच्छा उपयोग भगवान की सेवा में होता है, वचन का अच्छा उपयोग जिनवाणी के उच्चारण में होता है और मन में अच्छे एवं पवित्र विचार उत्पन्न होते हैं, तब व्यक्ति शुभ उपयोग की ओर बढ़ता है। इसके आगे जब मनुष्य की रुचि अपनी आत्मा के प्रति जागृत होती है और वह आत्मचिंतन की ओर बढ़ता है, तब शुद्ध उपयोग की स्थिति प्रारंभ होती है।
उन्होंने कहा कि पंचम काल में गृहस्थों के लिए शुभ उपयोग और आत्मा के प्रति अभिरुचि महत्वपूर्ण है। उन्होंने उपयोग को तीन प्रकार का बताते हुए कहा कि अशुभ उपयोग, शुभ उपयोग और शुद्ध उपयोग—ये तीन अवस्थाएं हैं। पूजा, विधान, भक्ति और परमात्मा की आराधना जैसे धार्मिक कार्यों के माध्यम से व्यक्ति शुभ उपयोग की ओर बढ़ता है। वहीं जब व्यक्ति परिग्रह से पूरी तरह मुक्त होने की दिशा में आगे बढ़ता है तो शुद्ध उपयोग का मार्ग प्रशस्त होता है।
आचार्य श्री ने परिग्रह के अर्थ को भी विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि धन-दौलत और वस्तुओं का संग्रह ही परिग्रह नहीं है, बल्कि परिवार के प्रति अत्यधिक मोह, आसक्ति और ममत्व तथा विषय, भोग और उपभोग के भाव भी परिग्रह के ही रूप हैं। जब मनुष्य इन भावों से भीतर से मुक्त होने लगता है तो अशुभ उपयोग समाप्त होता है और धीरे-धीरे शुभ उपयोग से आगे बढ़ते हुए शुद्ध उपयोग की अवस्था की ओर अग्रसर होता है।
इस अवसर पर मेरठ जैन समाज के अध्यक्ष एवं श्री पुष्प वर्षा योग समिति के चेयरमैन श्री सुरेश जैन रितुराज ने बताया कि 19 अगस्त को परम पूज्य आचार्य श्री 108 सौरभ सागर जी महाराज के मंगल सानिध्य में जैन धर्मशाला, रेलवे रोड पर आयोजित होने वाले श्री 1008 पार्श्वनाथ निर्वाण महामहोत्सव की सभी तैयारियां पूर्ण कर ली गई हैं। उन्होंने बताया कि आयोजन स्थल पर श्री सम्मेद शिखरजी पर्वत की भव्य एवं सुंदर रचना भी तैयार कर ली गई है।
उन्होंने बताया कि 19 अगस्त को प्रातः 6:30 बजे से श्री विधान का आयोजन किया जाएगा। इसके बाद श्री पारसनाथ भगवान की टोंक पर 23 किलो का निर्वाण लाडू समर्पित किया जाएगा। इसके साथ ही सम्मेद शिखरजी पर्वत की अन्य 23 टोंकों पर भी धर्मानुरागियों द्वारा निर्वाण लाडू समर्पित किए जाएंगे। महामहोत्सव को लेकर जैन समाज में विशेष उत्साह और श्रद्धा का वातावरण बना हुआ है।
कार्यक्रम के दौरान श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री के प्रवचनों को श्रद्धापूर्वक सुना और गुरु भक्ति में सहभागिता की। समिति की ओर से बताया गया कि आचार्य श्री के सानिध्य में होने वाले धार्मिक आयोजनों में लगातार धर्मानुरागियों की सहभागिता बढ़ रही है।
आज के कार्यक्रम में समिति के मुख्य संयोजक श्री सुरेन्द्र जैन, संयोजक श्री प्रवीन जैन, श्री संजय जैन, श्री रितेश जैन, श्री विजय जैन एडवोकेट, श्री अनिल जैन दास, श्री प्रमोद जैन एडवोकेट, श्री रामेन्द्र जैन, श्री राजीव जैन, श्री नितिन जैन सहित समाज के अन्य श्रेष्ठीगण उपस्थित रहे।