कृषि नवाचार से स्टार्टअप तक की संभावनाओं पर राष्ट्रीय सम्मेलन
सीसीएसयू में विद्यार्थियों ने नौ कृषि आधारित विचार किए प्रस्तुत; एआई, जैव कीटनाशक, स्मार्ट ट्रैप और डिजिटल परामर्श सेवाओं पर हुई चर्चा
मेरठ । चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय (सीसीएसयू) के अटल सभागार में शुक्रवार को पादप संरक्षण विभाग की ओर से कृषि उद्यमिता, नवाचार और स्टार्टअप की संभावनाओं पर एक दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया। सम्मेलन में कृषि क्षेत्र की समस्याओं के तकनीकी समाधान विकसित करने, फसलों में रोगों और कीटों की समय रहते पहचान करने तथा शोध आधारित विचारों को व्यावसायिक उद्यमों में बदलने के तरीकों पर मंथन हुआ।
सम्मेलन में विद्यार्थियों के नौ समूहों ने अपने नवाचारी विचार और प्रस्तावित स्टार्टअप मॉडल प्रस्तुत किए। इनमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) से कीटों और पादप रोगों की पहचान, डिजिटल पादप स्वास्थ्य परामर्श, जैव कीटनाशक, नैनो-जैव कवकनाशक, लाभकारी सूक्ष्मजीवों का उपयोग और स्मार्ट निगरानी प्रणालियों जैसे विषय शामिल रहे।
कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. संगीता शुक्ला ने की। भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के पादप संरक्षण सलाहकार डॉ. जे.पी. सिंह मुख्य अतिथि रहे। महाराजा सुहेल देव विश्वविद्यालय, आजमगढ़ के पूर्व कुलपति प्रो. प्रदीप कुमार शर्मा, सीसीएसयू के निदेशक शोध प्रो. बीर पाल सिंह, प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा, डॉ. अजय कुमार सहित शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी भी उपस्थित रहे।
विशेषज्ञ वक्ताओं में राष्ट्रीय कृषि विपणन संस्थान, जयपुर के उपनिदेशक (मार्केटिंग) डॉ. एस.आर. सिंह, कृषि विज्ञान केंद्र-द्वितीय, सीतापुर के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. दया शंकर श्रीवास्तव तथा राष्ट्रीय कृषि विपणन संस्थान, जयपुर के सहायक प्रोफेसर डॉ. सुरेश चंद्र शर्मा शामिल रहे।
विद्यार्थियों को किसानों की वास्तविक समस्याओं पर काम करने का संदेश
कुलपति प्रो. संगीता शुक्ला ने कहा कि कृषि क्षेत्र में शोध और उद्यमिता का उद्देश्य किसानों की वास्तविक समस्याओं का व्यावहारिक समाधान तलाशना होना चाहिए। विद्यार्थियों को अकादमिक ज्ञान तक सीमित रहने के बजाय समाज और किसानों की जरूरतों को समझकर काम करना चाहिए। उन्होंने कहा कि तकनीक का उपयोग तभी सार्थक होगा, जब उससे किसानों को आसानी से उपलब्ध और प्रभावी लाभ मिले।
उन्होंने विद्यार्थियों को अपने विचारों को शोध, प्रयोग और नवाचार के जरिए विकसित करने तथा उन्हें स्टार्टअप के रूप में आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। मुख्य अतिथि डॉ. जे.पी. सिंह ने पादप संरक्षण में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आधुनिक तकनीकों के उपयोग पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि फसलों को कीटों और रोगों से बचाने के लिए नए विचारों को किसानों की जरूरतों के अनुसार उपयोगी समाधानों में बदलना जरूरी है।
विश्वविद्यालय के निदेशक शोध प्रो. बीर पाल सिंह ने विद्यार्थियों को कृषि एवं पादप संरक्षण के क्षेत्र में शोध की संभावनाओं पर काम करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने विश्वविद्यालय की शोध सुविधाओं का लाभ उठाकर शोध को व्यावहारिक समाधान, पेटेंट और नवाचार में बदलने का आह्वान किया।
कृषि विपणन और ग्रामीण उद्यमिता पर डॉ. एस.आर. सिंह का व्याख्यान
राष्ट्रीय कृषि विपणन संस्थान, जयपुर के उपनिदेशक (मार्केटिंग) डॉ. एस.आर. सिंह ने कृषि विपणन, नवाचार और उद्यमिता के बदलते स्वरूप पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि भारतीय कृषि जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव, उत्पादन लागत में वृद्धि, उपभोक्ताओं की बदलती प्राथमिकताओं, गुणवत्ता संबंधी अपेक्षाओं और कटाई के बाद होने वाले नुकसान जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है। इन चुनौतियों के बीच कृषि क्षेत्र में युवाओं, शोधार्थियों, किसानों और ग्रामीण उद्यमियों के लिए नए अवसर भी बन रहे हैं।
डॉ. सिंह ने कहा कि कृषि उद्यमिता का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं है। भंडारण, प्रसंस्करण, परिवहन, विपणन और आपूर्ति शृंखला में आने वाली समस्याओं का समाधान करना भी इसका अहम हिस्सा है। उनके अनुसार, कोई नवाचार तभी उपयोगी है, जब वह व्यावहारिक समस्या का समाधान करे और आर्थिक या सामाजिक मूल्य पैदा करे। उन्होंने उत्पाद, प्रक्रिया, व्यवसाय मॉडल, विपणन, आपूर्ति शृंखला तथा वित्तीय एवं संस्थागत नवाचार की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।
उदाहरण देते हुए उन्होंने समझाया कि केवल टमाटर उगाना सामान्य कृषि गतिविधि है, जबकि सौर ऊर्जा से चलने वाले शीत भंडारण के जरिए टमाटर की बर्बादी कम करना, उसकी गुणवत्ता बनाए रखना और किसानों को बेहतर बाजार से जोड़ना नवाचार आधारित उद्यमिता का उदाहरण है। उन्होंने स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान के साथ आधुनिक तकनीक का उपयोग कर ऐसे ग्रामीण व्यावसायिक मॉडल बनाने की जरूरत पर भी जोर दिया, जिन्हें आगे बड़े स्तर पर अपनाया जा सके।
उन्होंने कहा कि खेत से उपभोक्ता तक कृषि उत्पाद पहुंचाने की प्रक्रिया में अनावश्यक लागत और नुकसान घटाना, उत्पाद की गुणवत्ता बनाए रखना और किसानों को उपयुक्त बाजारों से जोड़ना उद्यमिता के महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं। डिजिटल कृषि, कृषि-प्रौद्योगिकी और खाद्य-प्रौद्योगिकी के विकास से उत्पादों की निगरानी, मूल्य संवर्धन, विपणन और आपूर्ति शृंखला प्रबंधन में नई संभावनाएं पैदा हो रही हैं।
डॉ. सिंह ने राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत संचालित नवाचार एवं कृषि उद्यमिता विकास कार्यक्रम का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम में नॉलेज पार्टनर्स और आरकेवीवाई एग्रीबिजनेस इन्क्यूबेटर्स की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने प्रस्तुति में उल्लिखित सहायता प्रावधानों के अनुसार बताया कि योजना की लागू शर्तों के अधीन विचार अथवा प्री-सीड स्तर पर पांच लाख रुपये तक और सीड स्तर पर 25 लाख रुपये तक की वित्तीय सहायता उपलब्ध हो सकती है।
युवा उद्यमियों को संबोधित करते हुए उन्होंने तीन बातों पर विशेष जोर दिया—पहले वास्तविक समस्या की पहचान की जाए, फिर समाधान को बड़े स्तर पर ले जाने से पहले संभावित ग्राहकों से उसकी उपयोगिता और व्यावसायिक स्वीकार्यता जांची जाए, और उद्यम विकसित करते समय आर्थिक व्यवहार्यता के साथ सामाजिक लाभ तथा पर्यावरणीय स्थिरता का भी ध्यान रखा जाए। उन्होंने कहा कि स्टार्टअप की सफलता केवल नई तकनीक पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि वह ग्राहकों की जरूरतों को कितना पूरा करता है और लंबे समय तक कितना उपयोगी बना रहता है।
स्थानीय संसाधनों से कृषि समस्याओं के समाधान की जरूरत
कृषि विज्ञान केंद्र-द्वितीय, सीतापुर के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. दया शंकर श्रीवास्तव ने कृषि उद्यमिता और फसल सुरक्षा में नवाचार की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि उद्यमिता में व्यवसाय शुरू करने के साथ जोखिम उठाने, बाजार की मांग समझने, नेतृत्व क्षमता विकसित करने और कृषि उत्पादों में अतिरिक्त मूल्य जोड़ने की क्षमता भी शामिल है। उन्होंने गुणवत्ता के साथ ब्रांडिंग, प्रत्यक्ष विपणन और ग्राहकों तक पहुंच को भी सफल उद्यम के लिए जरूरी बताया।
डॉ. श्रीवास्तव ने पौधों और कवकों की विविध प्रजातियों के संरक्षण तथा भारत की जैव विविधता के महत्व पर चर्चा की। उन्होंने वन क्षेत्रों में कमी और नीलगायों के आबादी की ओर आने से फसलों को होने वाले नुकसान का उल्लेख करते हुए कहा कि स्थानीय समस्याओं के समाधान में पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय नवाचार उपयोगी हो सकते हैं।
उन्होंने प्रगतिशील किसान सुखदेव सिंह के सहयोग से स्थानीय स्तर पर विकसित और संशोधित एक उपकरण का उदाहरण साझा किया। वक्ता के अनुसार, इसमें घड़े से उत्पन्न विशिष्ट ध्वनि का उपयोग नीलगायों से फसलों की सुरक्षा के प्रयास में किया जाता है। उन्होंने कहा कि स्थानीय स्तर पर अपनाए गए ऐसे उपाय आसपास के अन्य किसानों के लिए भी उपयोगी हो सकते हैं। इस उदाहरण के जरिए उन्होंने किसानों के अनुभव, स्थानीय संसाधनों और व्यावहारिक नवाचारों को कृषि उद्यमिता से जोड़ने की बात कही।
श्री अन्न आधारित उद्यमों से महिला सशक्तिकरण की संभावनाएं
राष्ट्रीय कृषि विपणन संस्थान, जयपुर के सहायक प्रोफेसर डॉ. सुरेश चंद्र शर्मा ने “स्मार्ट मिलेट पारिस्थितिकी तंत्र: भारत में समावेशी महिला उद्यमिता और टिकाऊ कृषि व्यवसाय के लिए कृषि-तकनीकी नवाचारों का समन्वय” विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने शुष्क और वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों की चुनौतियों के साथ श्री अन्न (मिलेट्स) आधारित कारोबार की संभावनाओं पर चर्चा की।
डॉ. शर्मा ने कहा कि कृषि-तकनीक, आधुनिक प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन, प्रभावी विपणन और सामूहिक प्रयासों के जरिए श्री अन्न आधारित उद्यमों को आगे बढ़ाया जा सकता है। केवल उत्पादन ही नहीं, बल्कि सफाई, छंटाई, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और बाजार तक पहुंच भी जरूरी है। इन गतिविधियों से कृषि उत्पादों का मूल्य बढ़ाने और किसानों तथा ग्रामीण उद्यमियों के लिए आय के नए अवसर विकसित करने में मदद मिल सकती है।
उन्होंने स्लर्प फार्म (व्होलसम फूड्स प्राइवेट लिमिटेड), मिलेट बैंक, ओडिशा मिलेट्स मिशन के अंतर्गत कार्यरत महिला स्वयं सहायता समूहों, तमिलनाडु के थेनी स्थित मिलेट प्रसंस्करण उद्यम और टाटा सोलफुल जैसे उदाहरण दिए। उन्होंने कहा कि निजी उद्यमों, महिला समूहों, वित्तीय संस्थानों, सरकारी योजनाओं और शोध संस्थानों के बीच समन्वय से श्री अन्न आधारित कारोबार को गति मिल सकती है।
डॉ. शर्मा ने महिला स्वयं सहायता समूहों की भूमिका पर विशेष जोर दिया। उनके अनुसार, महिलाएं स्थानीय स्तर पर श्री अन्न से पौष्टिक खाद्य उत्पाद तैयार कर, उनका प्रसंस्करण और विपणन करके आर्थिक रूप से सशक्त हो सकती हैं। विद्यालयों, आंगनवाड़ी केंद्रों और पोषण कार्यक्रमों में ऐसे उत्पादों की संभावनाएं भी ग्रामीण महिलाओं के लिए नए व्यावसायिक अवसर खोल सकती हैं। उन्होंने कहा कि श्री अन्न आधारित व्यवसाय पोषण सुरक्षा, ग्रामीण रोजगार, महिला सशक्तिकरण और टिकाऊ कृषि विकास को एक साथ जोड़ सकता है।
विद्यार्थियों ने नौ समूहों में प्रस्तुत किए नवाचारी विचार
सम्मेलन का प्रमुख आकर्षण विद्यार्थियों के नौ समूहों की प्रस्तुतियां रहीं। पहले समूह के सिद्धार्थ सिरोही, हिमांशु पंवार, लविष सिरोही, हिमांशु, प्रशांत कुमार और पारस पंवार ने एआई आधारित कीट एवं पादप रोग पहचान तथा प्रबंधन पर विचार प्रस्तुत किए। उनके प्रस्ताव में कृत्रिम बुद्धिमत्ता से फसलों की समस्याओं की शुरुआती पहचान कर किसानों को प्रबंधन संबंधी जानकारी देने की संभावनाओं पर ध्यान दिया गया।
दूसरे समूह के मेहरवान, आकाश सिंह, चंद्रकांत मणि, वंश, पूजा चौहान और ज्योति जाखड़ ने एंटोमोपैथोजेनिक कवकों से जैव कीटनाशक विकसित करने पर प्रस्तुति दी। इस विचार में कीट नियंत्रण के लिए कवकों के उपयोग और जैव-आधारित उत्पादों के विकास की संभावनाएं शामिल रहीं।
तीसरे समूह के आदित्य दास, सुहानी सिंह, संगम, सुहानी आर्या, नेहा और खुशी चौहान ने टिकाऊ फसल रोग प्रबंधन के लिए नैनो-जैव कवकनाशक विषय पर विचार रखे। समूह ने नैनो तकनीक और जैविक घटकों के संयोजन से फसल रोगों के प्रबंधन के विकल्प तलाशने पर जोर दिया।
चौथे समूह की समृति, तमन्ना, ज्योति, शिवानी और सचिन ने जलवायु-स्मार्ट कृषि के लिए पादप रोगों की पूर्वानुमान एवं प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली प्रस्तुत की। इस विचार में मौसम और फसल स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी के आधार पर रोग के जोखिम का पहले से अनुमान लगाने और किसानों को समय पर सतर्क करने की संभावना पर चर्चा हुई।
पांचवें समूह के भवानी चौहान, ऋषभ सिंह, गगन राणा, अभिमन्यु चौहान, अनुराग सिंह और आदित्य कुमार ने डिजिटल पादप स्वास्थ्य परामर्श सेवाओं को रोग प्रबंधन के व्यावसायिक मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया। इस मॉडल में डिजिटल माध्यम से किसानों को पौधों के स्वास्थ्य, रोग पहचान और प्रबंधन संबंधी सलाह उपलब्ध कराने पर विचार किया गया।
छठे समूह के विशाल पाल, विनीत सैनी, वंश कुमार, विकास कुमार, आयुष और विनीत कुमार ने लाभकारी कीटों के बड़े पैमाने पर उत्पादन को कृषि उद्यमिता का संभावनाशील मॉडल बताया। प्रस्तुति में कृषि में कीट प्रबंधन और प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में सहायक जीवों के उत्पादन तथा किसानों तक उनकी उपलब्धता बढ़ाने की संभावनाओं पर ध्यान दिया गया।
सातवें समूह के अंश कुमार, अनमोल चौधरी, अंशुल शर्मा, भूपेश शर्मा और मुकेश कुमार भड़ाना ने लाभकारी सूक्ष्मजीवों के जैव-फॉर्मुलेशन पर विचार प्रस्तुत किए। उनका विषय पादप रोग प्रबंधन में सूक्ष्मजीव आधारित उत्पादों के विकास और उन्हें व्यावसायिक उपयोग तक पहुंचाने से जुड़ा था।
आठवें समूह के विश्वात्मन शुक्ला, सौम्या उपाध्याय, निशांत कुमार, प्रियांश और दीपिका ने ट्राइकोडर्मा आधारित जैव कवकनाशक को प्रयोगशाला के नवाचार से व्यावसायिक उद्यम तक ले जाने की संभावनाएं प्रस्तुत कीं। इसमें प्रयोगशाला में विकसित शोध को प्रभावी कृषि उत्पादों में बदलने पर जोर दिया गया।
नौवें समूह के जुनैद, कृष्ण कुमार, प्रशांत शर्मा, रविकांत और रेखा बाई ने कीटों की स्वचालित पहचान और निगरानी के लिए एआई तथा स्मार्ट ट्रैप का विचार रखा। प्रस्तुति में सेंसर और स्मार्ट ट्रैप के जरिए खेतों में कीटों की निगरानी कर समय पर प्रबंधन संबंधी निर्णय लेने की संभावनाओं पर चर्चा हुई।
शोध और व्यावहारिक समाधान के बीच सेतु बनाने पर जोर
सम्मेलन में प्रस्तुत विचारों ने कृषि उद्यमिता के व्यापक स्वरूप को सामने रखा। चर्चाओं में फसल रोगों और कीटों की पहचान, जैविक उत्पादों का विकास, डिजिटल सलाह सेवाएं, लाभकारी जीवों का उपयोग और स्मार्ट निगरानी प्रणालियों जैसे विषय शामिल रहे। विशेषज्ञों ने शोध को किसानों की जरूरतों और बाजार की मांग से जोड़ने, स्थानीय समस्याओं के व्यावहारिक समाधान विकसित करने और विद्यार्थियों को कृषि आधारित उद्यमिता के लिए तैयार करने पर बल दिया।
पादप संरक्षण विभाग की ओर से आयोजित इस सम्मेलन ने विद्यार्थियों को कृषि विज्ञान, तकनीक और उद्यमिता के मेल से नए समाधान विकसित करने का मंच दिया।