राष्ट्रीय संगोष्ठी 25 विभूतियों को मिला समरसता सम्मान
मेरठ। गुरु गोरक्षनाथ जी महाराज की असीम अनुकंपा एवं राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ जी महाराज की पुण्य स्मृति में ब्लॉसम इंडिया फाउंडेशन द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी “सामाजिक समरसता में गोरक्षपीठ की भूमिका” का भव्य आयोजन रविवार को चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ स्थित नेताजी सुभाष चंद्र बोस प्रेक्षागृह में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए संत-महात्माओं, शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, युवाओं एवं बुद्धिजीवियों ने सहभागिता कर सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक चेतना पर अपने विचार व्यक्त किए।
प्रयागराज, लखनऊ, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, अम्बेडकर नगर, गाजियाबाद और जौनपुर में सफल आयोजनों के बाद मेरठ में आयोजित इस राष्ट्रीय संगोष्ठी ने समाज को जोड़ने और समरसता के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य को नई दिशा प्रदान की। कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने गोरक्षपीठ की ऐतिहासिक भूमिका, उसकी सेवा परंपरा तथा समाज के विभिन्न वर्गों को एक सूत्र में बांधने के प्रयासों को विस्तार से रेखांकित किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष ने की। अपने अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने कहा कि भारत की संत परंपरा सदैव समाज को जोड़ने वाली शक्ति रही है और गोरक्षपीठ ने सेवा, त्याग एवं सामाजिक समरसता के माध्यम से इस परंपरा को निरंतर जीवंत बनाए रखा है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रसंत महंत अवेद्यनाथ जी महाराज का संपूर्ण जीवन समाज के अंतिम व्यक्ति तक सम्मान, अवसर और न्याय पहुंचाने के लिए समर्पित रहा।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि आध्यात्मिक गुरु ने अपने उद्बोधन में कहा कि सनातन संस्कृति का मूल भाव समरसता और एकात्मता है। उन्होंने समाज को जातीय, क्षेत्रीय और वैचारिक विभाजनों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में एकजुट होने का आह्वान किया। स्वामी दीपांकर जी ने अपनी भिक्षा यात्रा के अनुभव साझा करते हुए कहा कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी सांस्कृतिक जड़ों और ग्रामीण जीवन में निहित है, जिसे पुनः जागृत करने की आवश्यकता है।
संगोष्ठी के अति विशिष्ट अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पश्चिमी उत्तर प्रदेश क्षेत्र प्रचार प्रमुख ने कहा कि सामाजिक समरसता केवल एक वैचारिक अवधारणा नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की आधारभूत आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि गोरक्षपीठ ने समाज के वंचित, उपेक्षित और अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को मुख्यधारा से जोड़ने का कार्य किया है, जो वर्तमान भारत के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण है।
वक्ताओं ने अपने संबोधन में गोरक्षपीठ के गौरवशाली इतिहास, महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज तथा राष्ट्रसंत महंत अवेद्यनाथ जी महाराज के सामाजिक योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय, समान अवसर, सेवा और सहयोग की भावना को मजबूत किए बिना एक सशक्त राष्ट्र की कल्पना नहीं की जा सकती। समाज में संवाद और सहयोग की संस्कृति को बढ़ावा देकर ही सामाजिक समरसता को व्यवहारिक रूप दिया जा सकता है।
ब्लॉसम इंडिया फाउंडेशन के संस्थापक एवं कार्यक्रम संयोजक शशि प्रकाश सिंह ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि “समरसता संवाद” केवल एक कार्यक्रम श्रृंखला नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने का व्यापक जनजागरण अभियान है। उन्होंने कहा कि गोरक्षपीठ ने सदियों से सेवा, समर्पण और राष्ट्रधर्म की जो परंपरा स्थापित की है, उसे समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचाना आज की आवश्यकता है।
उन्होंने बताया कि प्रयागराज से प्रारंभ हुई यह समरसता यात्रा उत्तर प्रदेश के अनेक जनपदों तक पहुंच चुकी है और इसे समाज के विभिन्न वर्गों का व्यापक समर्थन प्राप्त हो रहा है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि मेरठ का यह आयोजन सामाजिक समरसता के इस अभियान को और अधिक गति प्रदान करेगा तथा नई पीढ़ी को राष्ट्र निर्माण के कार्यों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
कार्यक्रम के दौरान सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक विरासत और सनातन मूल्यों पर आधारित विभिन्न विषयों पर संवाद एवं विचार-विमर्श हुआ। उपस्थित जनसमुदाय ने गोरक्षपीठ की सेवा परंपरा और समाज को जोड़ने के उसके प्रयासों की सराहना की।
संगोष्ठी का समापन राष्ट्रसंत महंत अवेद्यनाथ जी महाराज के आदर्शों को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने तथा सामाजिक समरसता के संदेश को जन-जन तक प्रसारित करने के सामूहिक संकल्प के साथ हुआ। इस अवसर पर समाज, शिक्षा, संस्कृति, सेवा, पत्रकारिता और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाली 25 विशिष्ट विभूतियों को “समरसता सम्मान” से सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में संत-महात्मा, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद, युवा, पत्रकार, बुद्धिजीवी एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। आयोजन का वातावरण राष्ट्रभक्ति, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक चेतना के भावों से ओत-प्रोत रहा।