ब्राजील की विश्व कांग्रेस में भारतीय ज्ञान परंपरा के आधार पर रखी एआई गवर्नेंस की रूपरेखा
मेरठ, 19 अक्टूबर। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के विधि अध्ययन संस्थान के अध्यक्ष डॉ. विवेक कुमार त्यागी ने ब्राज़ील के लोंड्रीना में आयोजित विश्व कांग्रेस में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के शासन और मौलिक अधिकारों की रक्षा पर अपने विचार प्रस्तुत किए। कांग्रेस का विषय “शासन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता: प्लेटफॉर्म, पूर्वानुमान विश्लेषण और मौलिक अधिकार” है। करीब 26 घंटे चलने वाले इस आयोजन में 24 देशों के 138 वक्ता भाग ले रहे हैं।
कांग्रेस की अध्यक्षता पेरू के डॉ. जॉर्ज आइज़ैक टोरेस मैनरीके की संस्था “प्रेमिनेंशिया यूस्तीशिया” (Praeeminentia Iustitia) के अंतर्विषयक मौलिक अधिकार विद्यालय ने की। कार्यक्रम का प्रसारण ब्राज़ील के फैकुलदादेस लोंड्रीना के विधि विद्यालय के माध्यम से यूट्यूब पर किया जा रहा है। भारत, ब्राज़ील, रूस, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, इटली, स्पेन और अर्जेंटीना के विश्वविद्यालय एवं संस्थान इसके सह-आयोजक हैं।
“जब राज्य कोड से निर्णय ले, तब अधिकारों की रक्षा कैसे हो?”
डॉ. त्यागी ने अपने शोध-पत्र “Where Code Meets Conscience: Governing Intelligence, Guarding Liberty” में कहा कि डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के माध्यम से अब कल्याणकारी योजनाओं, पहचान और न्याय से जुड़ी सेवाएँ लोगों तक पहुँचाई जा रही हैं। इसके साथ ही जोखिम-स्कोरिंग, लाभार्थियों का चयन, धोखाधड़ी की पहचान और पुलिसिंग में पूर्वानुमान जैसी प्रणालियों का उपयोग भी बढ़ रहा है।

उन्होंने कहा कि ऐसी प्रणालियाँ अतीत के आँकड़ों के आधार पर वर्तमान में लोगों के बारे में फैसले कर सकती हैं। यदि इन प्रणालियों की कार्यप्रणाली अपारदर्शी हो, आँकड़ों में पक्षपात हो या निर्णय का कारण स्पष्ट न किया जाए, तो लोगों को लाभों से वंचित किया जा सकता है और उनकी समानता, स्वतंत्रता तथा निजता प्रभावित हो सकती है। डॉ. त्यागी ने सवाल उठाया कि जब राज्य कोड के माध्यम से निर्णय लेता है, तब मौलिक अधिकार और धर्म-आधारित कर्तव्य उस निर्णय के साथ कैसे सुनिश्चित किए जाएँ।
भारतीय ज्ञान परंपरा के सात सूत्र
डॉ. त्यागी ने भारतीय ज्ञान परंपरा से एल्गोरिदमिक शासन के लिए सात प्रमुख सूत्र प्रस्तुत किए। राजधर्म, महाभारत और अर्थशास्त्र की परंपरा के अनुसार, सार्वजनिक सत्ता एक न्यास है और राज्य शासितों के प्रति जवाबदेह है। योगक्षेम का सिद्धांत कहता है कि कल्याणकारी प्लेटफॉर्म पात्र लोगों को योजनाओं से बाहर किए बिना उनकी भलाई सुनिश्चित करें।
उन्होंने दंड-नीति के संदर्भ में कहा कि राज्य का बल-प्रयोग संतुलित और आनुपातिक होना चाहिए तथा किसी पूर्वानुमान को अपने आप दंड का आधार नहीं बनना चाहिए। सत्य का सिद्धांत एआई प्रणालियों में पारदर्शिता और निर्णयों को समझाने की आवश्यकता पर जोर देता है, जबकि विवेक यह बताता है कि अंतिम निर्णय मनुष्य की जिम्मेदारी होनी चाहिए और स्वचालन पर अंध-निर्भरता से बचना चाहिए।
डॉ. त्यागी ने अशोक के शिलालेखों से सार्वजनिक सूचना और शिकायत-निवारण तक खुली पहुँच का महत्व बताया। वहीं, जैन, बौद्ध और गांधीवादी परंपराओं के अहिंसा सिद्धांत को तकनीकी प्रणालियों में हानि से बचाव और किसी समूह को बाहर न रखने की जिम्मेदारी से जोड़ा।
एआई के अनुमान को अंतिम निर्णय न माना जाए
न्याय-दर्शन के प्रमाणों का उल्लेख करते हुए डॉ. त्यागी ने कहा कि मॉडल का पूर्वानुमान अपने आप में प्रमाणित निर्णय नहीं होता। उनके अनुसार, प्रत्यक्ष के स्तर पर इनपुट डेटा की सत्यता और ऑडिट सुनिश्चित होना चाहिए। अनुमान से निकले पूर्वानुमान को संबंधित व्यक्ति को कारण और स्पष्टीकरण के साथ बताया जाना चाहिए। इसी तरह, विक्रेताओं और विशेषज्ञों के दावों की स्वतंत्र जाँच जरूरी है; केवल उनके कथन को पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
उन्होंने कहा कि भ्रामक सहसंबंध, पक्षपाती प्रॉक्सी और अप्रमाणित आधार अनुच्छेद 14 के तहत मनमाने या भेदभावपूर्ण तर्क बन सकते हैं। डॉ. त्यागी ने कहा, “भविष्यवाणी एक अनुमान है, वह निर्णय का मार्गदर्शन कर सकती है, पर विवेकपूर्ण न्याय का स्थान नहीं ले सकती।”
संविधान के आधार पर छह सुरक्षा सिद्धांत
डॉ. त्यागी ने संविधान के अनुच्छेद 14 और 21, पुट्टस्वामी फैसले तथा डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के संदर्भ में एआई प्रणालियों के लिए छह सुरक्षा सिद्धांतों का ढाँचा प्रस्तुत किया। इनमें सरकारी एआई के उपयोग के लिए वैध कानूनी आधार, आवश्यकता के अनुरूप और न्यूनतम हस्तक्षेप, प्रतिकूल निर्णयों के कारण बताना तथा जवाबदेह अधिकारी की मानवीय निगरानी शामिल हैं।
उन्होंने शिकायत और अपील की सुलभ व्यवस्था, डेटा संरक्षण बोर्ड तक पहुँच तथा सरकारी एआई प्रणालियों का सार्वजनिक प्रकटीकरण और ऑडिट भी जरूरी बताया। डॉ. त्यागी ने नीदरलैंड के SyRI, ऑस्ट्रेलिया के Robodebt, अमेरिका के Loomis, ब्रिटेन के Bridges और केन्या के Huduma Namba जैसे मामलों से मिली सीख का उल्लेख किया। उन्होंने भारत के आधार से जुड़े पुट्टस्वामी फैसले का भी संदर्भ दिया।
वैश्विक परंपराओं के साझा मूल्यों पर जोर
डॉ. त्यागी के अनुसार, भारतीय धर्म, अफ्रीकी उबंटू, कन्फ्यूशियस विचार, इस्लामी मक़ासिद अल-शरीया और मानवाधिकार परंपराएँ इस मूल विचार पर मिलती हैं कि प्रौद्योगिकी मानव गरिमा की सेवा करे और सत्ता उन लोगों के प्रति जवाबदेह रहे, जिनके जीवन पर उसके फैसलों का असर पड़ता है।
उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को यूरोपीय संघ के एआई अधिनियम और यूनेस्को तथा ओईसीडी जैसे वैश्विक ढाँचों के साथ जोड़कर भारत, वैश्विक दक्षिण के लिए एआई शासन का एक आदर्श प्रस्तुत कर सकता है।
भविष्य के लिए तीन सुझाव
डॉ. त्यागी ने सुझाव दिया कि सरकारी पूर्वानुमान प्रणालियाँ लागू करने से पहले उनके प्रभाव का मौलिक अधिकारों के संदर्भ में आकलन अनिवार्य किया जाए। स्वचालित निर्णयों के कारण जानने और मानवीय समीक्षा पाने का वैधानिक अधिकार दिया जाए। साथ ही, भारतीय ज्ञान परंपरा के धर्म-आधारित कर्तव्यों को एआई पाठ्यक्रम, सरकारी खरीद और निगरानी की प्रक्रियाओं में यूनेस्को, ओईसीडी तथा संयुक्त राष्ट्र के सिद्धांतों के साथ शामिल किया जाए।
“यतो धर्मस्ततो जयः” के साथ संबोधन का समापन
डॉ. त्यागी ने अपने संबोधन का समापन सर्वोच्च न्यायालय के ध्येय-वाक्य “यतो धर्मस्ततो जयः”—अर्थात जहाँ धर्म है, वहाँ विजय है—के उल्लेख के साथ किया। उन्होंने “धर्मो रक्षति रक्षितः” का स्मरण कराते हुए कहा कि न्यायपूर्ण और उत्तरदायी शासन में तकनीकी क्षमता के साथ विवेक तथा मानव गरिमा की रक्षा भी जरूरी है।