डॉ. विवेक त्यागी
मेरठ। भारतीय ज्ञान परंपरा, पर्यावरण कानून और जलवायु नैतिकता के समन्वय से ही सतत एवं न्यायसंगत विकास की दिशा में प्रभावी कदम बढ़ाया जा सकता है। यह विचार चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के विधि अध्ययन संस्थान के विभागाध्यक्ष एवं एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. विवेक कुमार त्यागी ने अंतर्राष्ट्रीय इंटर्नशिप विश्वविद्यालय (IIU Global) द्वारा आयोजित IIU Africa Training के अंतर्गत आयोजित अंतरराष्ट्रीय वर्चुअल सम्मेलन में व्यक्त किए। 21 अगस्त 2026 को आयोजित सम्मेलन का विषय “Human Impacts & Responsibility on Climate Change” रहा। कार्यक्रम की अध्यक्षता IIU के कुलपति Snr. Prof. General Charles Usiholo Ebhoria ने की।
जलवायु संकट केवल पर्यावरणीय नहीं, मानवीय उत्तरदायित्व का विषय
मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए डॉ. विवेक कुमार त्यागी ने कहा कि वर्तमान जलवायु संकट को केवल पर्यावरणीय अथवा वैज्ञानिक समस्या के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह मानव व्यवहार, नैतिकता, जीवनशैली और सामूहिक उत्तरदायित्व से जुड़ा वैश्विक विषय है। उन्होंने जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों की चर्चा करते हुए कहा कि इस चुनौती से निपटने के लिए तकनीकी उपायों और सरकारी नीतियों के साथ-साथ मानव व्यवहार में सकारात्मक एवं नैतिक परिवर्तन भी आवश्यक है।
बढ़ते तापमान और कार्बन उत्सर्जन पर चिंता
अपने व्याख्यान में डॉ. त्यागी ने वैश्विक तापमान में लगभग 1.45 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि तथा वायुमंडल में 413 से अधिक पीपीएम कार्बन डाइऑक्साइड सांद्रता का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जलवायु संकट के पीछे मानवीय गतिविधियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए समाज के प्रत्येक वर्ग को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।
भारतीय दर्शन में प्रकृति संरक्षण की अवधारणा
डॉ. त्यागी ने भारतीय ज्ञान परंपरा में प्रकृति और मानव के संबंध को रेखांकित करते हुए अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त के प्रसिद्ध वाक्य “माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः” का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन में पृथ्वी को माता और मनुष्य को उसका पुत्र माना गया है। यह अवधारणा प्रकृति के प्रति सम्मान, संरक्षण और जिम्मेदारी की भावना को मजबूत करती है।
उन्होंने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना का उल्लेख करते हुए कहा कि संपूर्ण विश्व को एक परिवार के रूप में देखने की भारतीय दृष्टि आज के जलवायु संकट के दौर में और अधिक प्रासंगिक हो गई है। प्रकृति संरक्षण को केवल कानून और सरकारी नीति तक सीमित रखने के बजाय इसे मानव के नैतिक कर्तव्य के रूप में भी स्वीकार किया जाना चाहिए।
संविधान में पर्यावरण संरक्षण को महत्वपूर्ण स्थान
व्याख्यान के दौरान डॉ. त्यागी ने भारतीय संविधान में पर्यावरण संरक्षण से संबंधित प्रावधानों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 21, अनुच्छेद 48A और अनुच्छेद 51A(g) का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में स्वच्छ एवं स्वस्थ पर्यावरण के महत्व को विशेष स्थान दिया गया है। राज्य के साथ-साथ नागरिकों की भी पर्यावरण संरक्षण के प्रति जिम्मेदारी निर्धारित की गई है।
उन्होंने कहा कि पर्यावरण कानून का प्रभावी क्रियान्वयन तभी संभव है जब संवैधानिक दायित्वों के साथ नागरिकों में पर्यावरणीय नैतिकता और जिम्मेदारी की भावना भी विकसित हो।
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘Ubuntu’ में समानता
अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में डॉ. त्यागी ने भारतीय दर्शन के ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और अफ्रीकी दर्शन के ‘Ubuntu – I am because we are’ के बीच नैतिक समानता को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि दोनों विचारधाराएं व्यक्ति और समाज के बीच परस्पर निर्भरता, सहयोग और सामूहिक उत्तरदायित्व पर जोर देती हैं।
उन्होंने कहा कि भारतीय और अफ्रीकी ज्ञान परंपराओं के इन मूल्यों को आधुनिक जलवायु नीति के साथ जोड़ा जा सकता है। विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए ऐसी जलवायु रणनीति आवश्यक है, जो पर्यावरण संरक्षण के साथ सामाजिक न्याय, समानता और समावेशिता को भी महत्व दे।
पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों से सीखने की जरूरत
डॉ. त्यागी ने भारत की पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों का उदाहरण देते हुए बावड़ी, जोहड़ और पवित्र उपवनों (Sacred Groves) जैसी व्यवस्थाओं के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि स्थानीय पारिस्थितिकी और पारंपरिक ज्ञान में ऐसे अनेक समाधान मौजूद हैं, जिन्हें आधुनिक परिस्थितियों के अनुरूप संरक्षित और पुनर्जीवित किया जा सकता है।
उन्होंने स्थानीय समुदायों के पारंपरिक पर्यावरणीय ज्ञान को जलवायु नीति और सतत विकास की रणनीति में शामिल करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
गांधीवादी विचारों और Mission LiFE का संबंध
व्याख्यान में महात्मा गांधी के ‘अपरिग्रह’ और ‘ट्रस्टीशिप’ के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए डॉ. त्यागी ने इन्हें आधुनिक Mission LiFE तथा संयुक्त राष्ट्र के Sustainable Development Goals (SDGs) के संदर्भ से जोड़ा। उन्होंने कहा कि सीमित संसाधनों का जिम्मेदारीपूर्वक उपयोग, उपभोग में संयम और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति उत्तरदायित्व आज सतत विकास की महत्वपूर्ण आवश्यकताएं हैं।
उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरागत ज्ञान और गांधीवादी विचार आधुनिक विज्ञान, पर्यावरण कानून और नीति-निर्माण के साथ मिलकर जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने में उपयोगी मार्गदर्शन प्रदान कर सकते हैं।
आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान के समन्वय पर जोर
डॉ. विवेक कुमार त्यागी ने सम्मेलन के समापन अवसर पर कहा कि जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौती का प्रभावी समाधान केवल किसी एक क्षेत्र के प्रयासों से संभव नहीं है। इसके लिए आधुनिक विज्ञान, पर्यावरण कानून, सार्वजनिक नीति, स्थानीय ज्ञान, नैतिक मूल्यों और वैश्विक सहयोग को एक साथ आगे बढ़ाना होगा।
उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा के नैतिक सिद्धांतों को पर्यावरण कानून, नीति-निर्माण और वैश्विक जलवायु कूटनीति में उचित स्थान दिए जाने का आह्वान किया। उनके अनुसार, विकास की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिसमें आर्थिक प्रगति के साथ पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक न्याय और आने वाली पीढ़ियों के हितों का भी ध्यान रखा जाए।
विभिन्न देशों के शिक्षाविदों और विशेषज्ञों ने लिया हिस्सा
अंतरराष्ट्रीय वर्चुअल सम्मेलन में विभिन्न देशों के शिक्षाविदों, विशेषज्ञों और प्रतिभागियों ने सहभागिता की। कार्यक्रम के दौरान जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय उत्तरदायित्व, सतत विकास, पर्यावरण कानून और वैश्विक जलवायु न्याय से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श किया गया।
सम्मेलन ने भारतीय और अफ्रीकी ज्ञान परंपराओं के बीच संवाद तथा जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौती के समाधान के लिए साझा नैतिक दृष्टिकोण विकसित करने की संभावनाओं को भी सामने रखा। कार्यक्रम के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि जलवायु संकट से निपटने के लिए वैज्ञानिक और कानूनी उपायों के साथ मानव व्यवहार, नैतिक जिम्मेदारी और सामूहिक वैश्विक प्रयासों को भी समान महत्व देना आवश्यक है।