विकास के नाम पर कब वोट मांगे जाएंगे?
मेरठ। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं, बल्कि जनता की आकांक्षाओं और उम्मीदों का उत्सव भी होते हैं। प्रत्येक चुनाव से पहले राजनीतिक दल अपने घोषणा पत्र जारी करते हैं, जिनमें विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, आधारभूत संरचना और जनकल्याण से जुड़े अनेक वादे किए जाते हैं। लेकिन जैसे जैसे चुनावी अभियान आगे बढ़ता है, इन मुद्दों की चर्चा पीछे छूटती जाती है और उनकी जगह आरोप-प्रत्यारोप, व्यक्तिगत हमले, जातीय और धार्मिक समीकरण, भावनात्मक मुद्दे तथा राजनीतिक कटाक्ष ले लेते हैं। ऐसे में एक बड़ा प्रश्न खड़ा होता है कि आखिर विकास के नाम पर वोट कब मांगे जाएंगे?
लोकतंत्र में चुनाव जनता के प्रति जवाबदेही तय करने का सबसे प्रभावी माध्यम माना जाता है। यदि कोई राजनीतिक दल पांच वर्षों तक सत्ता में रहा है तो उसे चुनाव के समय जनता के सामने अपने कार्यों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करना चाहिए। उसे बताना चाहिए कि उसने अपने पिछले वादों में से कितने पूरे किए, कितनी नई सड़कें बनी, कितने अस्पताल खुले, कितने युवाओं को रोजगार मिला, किसानों की आय में कितना सुधार हुआ और शिक्षा व्यवस्था में क्या परिवर्तन आया। लेकिन दुर्भाग्य से अधिकांश चुनावी रैलियों में इन विषयों की चर्चा अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है। आज की राजनीति में अक्सर यह देखा जाता है कि सत्ताधारी दल अपनी उपलब्धियों का लेख करने के साथ साथ विपक्ष की कमियों को उजागर करने में अधिक समय व्यतीत करता है। वहीं विपक्ष भी अपनी वैकल्पिक विकास योजनाओं को विस्तार से बताने के चजाय सरकार की विफलताओं को प्रमुखता से उठाता है। परिणाम स्वरूप चुनाव विकास की प्रतिस्पर्धा न बनकर आरोपों और प्रत्यारोपों का अखाड़ा बन जाते हैं।
इस स्थिति के पीछे कई कारण है। पहला कारण यह है कि विकास एक गंभीर और तथ्यात्मक विषय है, जबकि भावनात्मक मुद्दे लोगों का ध्यान जल्दी आकर्षित करते हैं। दूसरा कारण यह है कि चुनावी रणनीतिकार अक्सर मानते हैं कि जाति, धर्म, क्षेत्रीय पहचान और भावनात्मक मुद्दे मतदाताओं को अधिक प्रभावित करते हैं। तीसरा कारण यह है कि जनता का एक वर्ग भी विकास संबंधी आंकड़ों और नीतियों की तुलना में राजनीतिक बयानबाजी में अधिक संचि दिखाता है। जब तक मतदाता स्वयं विकास को प्राथमिक मुद्दा नहीं बनाएंगे, तब तक राजनीतिक दलों पर भी विकास केंद्रित राजनीति का दबाव नहीं बनेगा। हालांकि यह कहना भी उचित नहीं होगा कि विकास पूरी तरह से राजनीति से गायब हो गया है। पिछले कुछ वर्षों में सड़क, रेलवे, मेट्रो, डिजिटल सेवाएं, बिजली, जलापूर्ति, स्वास्थ्य सुविधाएं और विभित्र कल्याणकारी योजनाएं चुनावी विमर्श का हिस्सा बनी है। लेकिन समस्या यह है कि इन मुद्दों पर गंभीर बहस कम और राजनीतिक प्रचार अधिक दिखाई देता है। विकास को अक्सर एक नारे के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
जबकि उसे ठोस उपलब्धियों और भविष्य की योजनाओं के साथ जनता के सामने रखा जाना चाहिए। एक स्वस्थ लोकतंत्र में चुनावी प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिसमें सत्ताधारी दल अपने कार्यकाल का विस्तृत रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने रखे। यह बताए कि उसके वादों और उपलब्धियों में कितना अंतर है। दूसरी ओर विपक्ष अपनी आलोचना के साथ-साथ यह भी स्पष्ट करे कि वह सत्ता में आने पर क्या बेहतर करेगा। चुनावी मंचों पर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कृषि, पर्यावरण, महिलाओं की सुरक्षा और आर्थिक विकास जैसे विषयों पर खुली बहस होनी चाहिए। इससे मतदाताओं को बेहतर निर्णय लेने में सहायता मिलेगी।
दुनिया के कई विकसित लोकतंत्रों में चुनावी बहसें मुख्य रूप से नीतियों और विकास कार्यक्रमों पर केंद्रित होती हैं। वहां राजनीतिक दलों की सफलता का मूल्यांकन उनके कार्यों के आधार पर किया जाता है। भारत में भी धीरे-धीरे ऐसी राजनीतिक संस्कृति विकसित हो सकती है, बशर्ते जनता इसकी मांग करे। लोकतंत्र में राजनीतिक दल वही मुद्दे उठाते हैं जिन्हें जनता महत्वपूर्ण मानती है। यदि मतदाता अपने प्रतिनिधियों से विकास कार्यों का हिसाब मांगने लगें, तो राजनीतिक दलों को भी उसी दिशा में अपनी राजनीति केंद्रित करनी पड़ेगी।
- वास्तविक परिवर्तन तब आएगा जब चुनावी
- सभाओं में यह पूछा जाएगा कि कितने विद्यालय
- बने, कितने अस्पताल स्थापित हुए, कितनी
- नौकरियां सृजित हुई और किसानों तथा मजदूरों
- के जीवन स्तर में कितना सुधार हुआ। जब
- जनता नेताओं से उनके कार्यों का का मूल्यांकन
- मांगेगी और भावनात्मक मुद्दों से अधिक विकास
- को महत्व देगी, तब राजनीतिक दल भी अपने
- रिपोर्ट कार्ड के आधार पर बोट मांगने के लिए
- बाध्य होंगे। यह कहना कठिन है कि वह दिन
- कब आएगा, लेकिन यह निश्चित है कि लोकतंत्र
- की परिपक्कता उसी दिशा में आगे बढ़ती है। जिस
- दिन चुनावी मंचों पर आरोपों की जगह
- उपलब्धियां और वादों की जगह परिणाम चर्चा
- का विषय बनेंगे, उस दिन भारतीय लोकतंत्र और
- अधिक मजबूत होगा। उस दिन राजनीतिक दल
- जनता से यह नहीं कहेंगे कि दूसरे दल ने क्या
- गलत किया, बल्कि यह बताएंगे कि उन्होंने स्वयं
क्या अच्छा किया है और आगे क्या करने वाले हैं। विकास के नाम पर वोट मांगने की शुरुआत राजनीतिक दलों से कम और जनता से अधिक होगी। जब मतदाता विकास को अपना सबसे बड़ा मुद्दा बना लेंगे, तथ राजनीति भी विकास-केंद्रित हो जाएगी। लोकतंत्र में अंतिम शक्ति जनता के पास होती है, इसलिए विकास आधारित राजनीति का भविष्य भी जनता की प्राथमिकताओं पर ही निर्भर करता है। शायद वह दिन दूर नहीं, जब चुनावी नारों की जगह विकास का रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने होगा और योट केवल कार्यों के आधार पर मांगे जाएंगे।
मितेंद्र कुमार गुप्ता, सामाजिक चिंतक एवं स्वतंत्र लेखक