गोवंश अनुसंधान ने मनाया 40 वां स्थापना दिवस
मेरठ। #ANN भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के दिशा-निर्देशों के अनुरूप भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद–केन्द्रीय गोवंश अनुसंधान संस्थान, मेरठ ने मंगलवार, 3 नवंबर 2026 को अपना 40वां स्थापना दिवस मनाया। इस वर्ष समारोह की विषयवस्तु ‘सतत जैव-अर्थव्यवस्था के लिए स्वदेशी गोवंश के आनुवंशिक द्रव्य का उपयोग’ रही। कार्यक्रम में देश के वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, पशुपालन विशेषज्ञों, नीति-निर्माताओं और प्रगतिशील किसानों ने भाग लिया। वक्ताओं ने स्वदेशी नस्लों के संरक्षण, वैज्ञानिक प्रजनन, जलवायु-अनुकूल पशुपालन और गोवंश आधारित ग्रामीण उद्यमिता पर विचार साझा किए।

समारोह के मुख्य अतिथि बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, पटना के पूर्व कुलपति डॉ. रामेश्वर सिंह रहे। उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद, लखनऊ के महानिदेशक डॉ. संजय सिंह और राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो, करनाल के पूर्व निदेशक डॉ. बी.पी. मिश्रा सह-अध्यक्ष के रूप में शामिल हुए। संस्थान के निदेशक डॉ. अशोक कुमार मोहंती ने संस्थान की 40 वर्षों की यात्रा, पिछले वर्ष की प्रमुख उपलब्धियों और भविष्य की कार्ययोजना प्रस्तुत की।
किसानों का सम्मान और कौशल विकास के लिए सहायता
उत्कृष्ट गोपालन और पशुपालन प्रबंधन पद्धतियों के लिए 10 प्रगतिशील किसानों को सम्मानित किया गया। अनुसूचित जाति उपयोजना के अंतर्गत आरआईपी कॉलेज के 10 विद्यार्थियों और राजबाला दिव्यांग समेकित शिक्षा के 10 लाभार्थियों को कौशल विकास और स्वरोजगार में सहायता के लिए सिलाई मशीनें वितरित की गईं।
संस्थान ने किसानों और पशुपालकों के लिए सात प्रकाशनों का विमोचन भी किया। इनमें वैज्ञानिक गोवंश पालन से संबंधित पत्रक, पशुपालन की शब्दावली तथा सफल और सतत गोपालन की कार्य-पद्धतियों का संकलन शामिल रहा। समारोह में विभिन्न किसान उत्पादक संगठनों और स्वयं सहायता समूहों ने अपने उत्पादों की प्रदर्शनी लगाई और बिक्री की। इससे ग्रामीण उद्यमिता और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने का प्रयास किया गया।

स्वदेशी नस्लों के संरक्षण और वैज्ञानिक प्रजनन पर जोर
डॉ. बी.पी. मिश्रा ने भारत की स्वदेशी गोवंश नस्लों की विविधता, पारिस्थितिकी तंत्र में उनके योगदान और संरक्षण की जरूरत पर प्रकाश डाला। उन्होंने भारत की पहली संकर गोवंश नस्ल ‘फ्रीजवाल’ के विकास में संस्थान के योगदान की सराहना की और इसे राष्ट्रीय प्रजनन योजना में उचित स्थान देने की आवश्यकता बताई। उन्होंने नस्ल संरक्षण में पशुपालक समुदायों की भूमिका को अहम बताते हुए गोवंश आधारित चक्रीय जैव-अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने पर जोर दिया।
डॉ. संजय सिंह ने संस्थान के नए परिसर में अनुसंधान सुविधाओं को बेहतर बनाने की संभावनाओं का उल्लेख किया। उन्होंने स्थानीय कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल नस्लों की पहचान, गुणवत्तापूर्ण वीर्य की उपलब्धता और जलवायु-अनुकूल पशुपालन को प्राथमिकता देने की बात कही। उन्होंने प्रयोगशालाओं में विकसित तकनीकों को किसानों तक प्रभावी रूप से पहुंचाने पर भी विशेष जोर दिया।
मुख्य अतिथि डॉ. रामेश्वर सिंह ने दुग्ध और पशुधन क्षेत्र की बढ़ती आर्थिक भूमिका का उल्लेख करते हुए स्वदेशी नस्लों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक चयन, नियंत्रित प्रजनन और संतुलित पोषण को आवश्यक बताया। उन्होंने श्रेष्ठ बछड़ों की शुरुआती पहचान के लिए जीनोमिक चयन, लिंग-निर्धारित वीर्य और उन्नत प्रजनन तकनीकों को अपनाने का सुझाव दिया। किसानों को वर्षभर गुणवत्तापूर्ण चारा उपलब्ध कराने के लिए फसल चक्र और विविध चारा उत्पादन प्रणाली पर भी बल दिया।
तकनीकी सत्र में आनुवंशिक सुधार और उपयोग पर चर्चा
दोपहर में स्थापना दिवस की विषयवस्तु पर वैज्ञानिक तकनीकी सत्र आयोजित किया गया। गोवंश आनुवंशिकी एवं प्रजनन प्रभाग के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. उमेश सिंह ने मुख्य प्रस्तुति देते हुए स्वदेशी गोवंश के आनुवंशिक सुधार, संरक्षण और आर्थिक उपयोग से जुड़े प्रमुख विषयों को रेखांकित किया।
सत्र में डॉ. विनीट भसीन, डॉ. टी.वी. राजा, डॉ. अमित कुमार, डॉ. सुनील जाधव, डॉ. डी.के. सदाना, डॉ. संदीप द्विवेदी, संस्थान के पूर्व निदेशकगण और अन्य विशेषज्ञों ने विचार रखे। विशेषज्ञों ने गुणवत्तापूर्ण वीर्य और प्रजनन सेवाओं की उपलब्धता, जीनोमिक एवं दृश्यलक्षणीय चयन, नस्ल-विशिष्ट प्रजनन नीति तथा जलवायु-अनुकूल पोषण को महत्वपूर्ण बताया।

चर्चा में स्वदेशी दूध का मूल्य संवर्धन, गोबर और गोमूत्र आधारित उत्पाद, उद्योगों की भागीदारी और गोशालाओं को ग्रामीण उद्यमिता के केंद्र के रूप में विकसित करने जैसे विषय भी शामिल रहे। डॉ. सदाना ने स्वदेशी गोवंश की उपयोगिता को दुग्ध उत्पादन से आगे तक बताते हुए उसके बहुआयामी महत्व पर प्रकाश डाला। डॉ. बी.पी. मिश्रा ने प्रत्येक नस्ल के मूल प्रजनन क्षेत्र के अनुरूप कृषि-जलवायु आधारित मॉडल विकसित करने का सुझाव दिया। उन्होंने लद्दाखी गोवंश नस्ल सोसायटी की तर्ज पर अन्य नस्लों के लिए भी समुदाय आधारित संरक्षण प्रयासों को बढ़ावा देने की बात कही।
किसान-वैज्ञानिक संवाद में साझा किए अनुभव
समारोह के दौरान किसान-वैज्ञानिक संवाद सत्र भी आयोजित हुआ। इसमें वैज्ञानिकों और प्रगतिशील किसानों ने जलवायु परिवर्तन तथा अल नीनो के प्रभावों से पशुओं के स्वास्थ्य की सुरक्षा, प्रजनन एवं स्वास्थ्य प्रबंधन, औषधीय जड़ी-बूटियों के उपयोग और दुग्ध के मूल्य संवर्धन जैसे विषयों पर अनुभव और जानकारी साझा की।
समारोह में हुई चर्चाओं से नस्ल सुधार और संरक्षण, गुणवत्तापूर्ण प्रजनन संसाधनों की उपलब्धता, जलवायु-अनुकूल पशुपालन, उत्पादों के मूल्य संवर्धन और गोवंश आधारित उद्यमिता को प्रोत्साहित करने से जुड़े सुझाव सामने आए। संस्थान ने इस अवसर पर स्वदेशी गोवंश की आनुवंशिक विविधता के संरक्षण और वैज्ञानिक उपयोग के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। वक्ताओं के अनुसार, इन प्रयासों से किसानों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है तथा विकसित भारत–2047 के लक्ष्य में योगदान दिया जा सकता है।